जब से अलग लिखनें लगे..

जब से अलग लिखने लगे
हम सस्ते में बिकने लगे

मौजें अलग होने लगीं
पंख भी गिरने लगे

बहरूपिया मन मोहकर
बन बैठा है मेरा पिया

हिय को अलग ना कर सके
सपनें जुदा होने लगे

स्पर्श जब उनका मिला
एक पुष्प-सा मन में खिला

ना रह गए हम पहले से
बस कुछ अलग दिखने लगे

कल्पना की चाबियां
खो गईं हमसे अभी

पैर भी टिकते नहीं
अब हाथ भी हिलने लगे

यहीं तक सफर था अपना
जा रही हूँ लौटकर

पहले दुःखता था हृदय
अब छाले भी दुःखने लगे !!

Comments

17 responses to “जब से अलग लिखनें लगे..”

  1. अतिसुंदर रचना

  2. Geeta kumari

    “ना रह गए हम पहले से, बस कुछ अलग दिखने लगे ”
    वाह, दिल को छू गई कविता….. बहुत सुंदर कविता है प्रज्ञा जी ।

    1. धन्यवाद समीक्षा हेतु

      1. Geeta kumari

        स्वागत है

  3. Pratima chaudhary

    “पहले दुःखता था हृदय
    अब छाले भी दुःखने लगे !!”
    बहुत सुंदर पंक्तियां
    बहुत सुंदर कविता

  4. मोहन सिंह मानुष Avatar

    अतिसुंदर प्रस्तुति
    अन्त की पंक्तियां और भी सुन्दर

  5. Satish Pandey

    कल्पना की चाबियां
    खो गईं हमसे अभी
    वाह क्या बात है, बहुत सुंदर

  6. Praduman Amit

    सरल शब्दों से निर्मित आपकी कविता तारीफ़ के काबिल है।

    1. Pragya Shukla

      Thanks

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