कुछ नहीं

हमें आता जाता कुछ भी नहीं,
सिर्फ शब्दों में खेल रहा हूं|
परिणाम का हमें कुछ पता नहीं,
मीठा खट्टा बोल रहा हूं|

शब्द आन मान शान हैं,
शब्द शब्द वेदी बाण है|
शब्द राजाओं की तलवार यदि,
भिखारियों की ढाल और पहचान है|

शब्द सिंहासन दे सकता है,
शब्द ही सब कुछ ले सकता है|
बनो गवार ज्ञानी चाहे,
शब्द ही जान ले दे सकता है|

मां के शब्दों में संस्कार भरा है,
पापा के शब्दों में प्यार भरा है|
बढ़ा हुआ जब लाल वहीं,
देखो बेटे के शब्दों में जहर भरा है|

करो निरीक्षण उन्नत खातिर,
मान प्रतिष्ठा वैभव खातिर|
कुल कुल की लज्जा,
शब्द सुधारों परिवार के खातिर|

ऋषि कुमार “प्रभाकर”

Comments

6 responses to “कुछ नहीं”

  1. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    बहुत सुंदर प्रस्तुति

  2. अतिसुंदर अभिव्यक्ति

  3. Satish Pandey

    मां के शब्दों में संस्कार भरा है,
    पापा के शब्दों में प्यार भरा है|
    बढ़ा हुआ जब लाल वहीं,
    देखो बेटे के शब्दों में जहर भरा है|
    बहुत ही सुंदर पंक्तियाँ है, बहुत अच्छा भाव है आपका, थोड़ा सा शुरुआत में हमें की जगह मैं आ जाता तो बहुत सुंदर तालमेल हो जाता। वैसे आपकी भाषा की लय और तारतम्यता अतिसुन्दर है।

    1. Tq🙏
      सुझाव के लिए दिल से धन्यवाद🙏

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