बनूँ मैं जानकी तेरी..!!

तू मेरी नज्म़ बन जाए
मैं तेरी नज्म़ बन जाऊं
तू मेरा राग बन जाए मैं
तेरा राग बन जाऊं
कुछ इस तरह जुड़ जाएं
अलग ना कर सके कोई
तू मेरी रूह बन जाए
मैं तेरी रूह बन जाऊं
ना शबरी हूँ ना अहिल्या हूँ
ना शूर्पनखा-सी हूँ कामुक
बनूँ मैं जानकी तेरी
तू मेरा राम हो जाए…!!

Comments

16 responses to “बनूँ मैं जानकी तेरी..!!”

  1. Pratima chaudhary

    बहुत सुंदर भाव
    बहुत सुंदर पंक्तियां

    1. Pragya Shukla

      धन्यवाद प्रतिमा

  2. Geeta kumari

    बनूं मैं जानकी तेरी
    तू मेरा राम हो जाए।…
    बहुत ही उच्च स्तरीय लेखन है आपका। सदैव यूं ही आगे बढ़ती रहें। इस लेखन को सैल्यूट।

    1. बहुत आभार दी आपके आशीष के लिए

    2. आप जब हौसला बढ़ाती हैं
      मेरे मन में उतर जाती हैं

      1. Geeta kumari

        उम्र में मुझसे छोटी हो आशीष तो दूंगी ही।
        बस, दुआ करो कि ये दुआ कुबूल हो जाए..

  3. Satish Pandey

    पाठक के मानस पटल पर सीधे तौर पर अंकित हो सकने में सक्षम इस कविता में प्यार है, मनुहार है। और एक आदर्श स्थिति की स्थापना की गई है। कवि की जबरदस्त साहित्यिक क्षमता को प्रकट करती सुन्दर कविता है।

    1. इतनी सुन्दर समीक्षा का अन्दाजा भी नही कर सकती थी

  4. बहुत सुन्दर

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