कहां आ गए हैं हम,
जहां खामोश-सी शामें हैं।
और चुप-सा सूरज उगता है।
ना बांटता है मुस्कान,
ना रौनकें फैलाता है।
कहां आ गए हैं हम।
Comments
14 responses to “कहां आ गए हैं हम।”
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सुंदर
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धन्यवाद जी
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गमगीन रचना
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धन्यवाद जी
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हाँ सब कुछ बदल गया है
फिर भी कहाँ गिला है-

धन्यवाद जी
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Aayhay…
लाजवाब, जबरदस्त, बहुत खूब और कितनी तारीफ करूं बस इतना ही आता है…-

🙏🙏🙏 धन्यवाद जी
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शानदार
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🙏
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मुश्किलों के दौर में थोड़ा संभल कर चलो,
अनुभवों से सीख लो और निखर कर चलो।
कठिनाइयाँ तो आएंगी और चली जाएंगी,
सजग होकर इसी तरह नए सफ़र पर चलो।-

बहुत खूब
हार्दिक धन्यवाद
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बहुत उम्दा
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धन्यवाद
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