बेरोजगारी

आईने तू इस तरह से
मत दिखा तो शक्ल मेरी
इन दिनों यौवन में हूँ
चिंताएं मेरी लाजमी हैं।
सोचता था मैं, कड़ी
मेहनत से तारे तोड़ लाऊं।
लेकिन यहां तो सारे पथ
हैं बन्द कैसे लक्ष्य पाऊं।
हर तरफ छाया अंधेरा
कल की चिंताओं ने घेरा,
घेर कर बेरोजगारी
तोड़ती उत्साह मेरा।
अब बता तू ही कि कैसे,
मैं चमक जीवित रखूं
कुछ नहीं कर पा रहा हूं,
किस तरह आगे बढूं।

Comments

20 responses to “बेरोजगारी”

  1. अति सुन्दर, बहुत खूब

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

  2. बहुत सच लिखा है, वाह जी

    1. Satish Pandey

      Thank you

  3. Geeta kumari

    एक तो कोरोना की महामारी, उपर से बेरोज़गारी , कैसे कोई ख़ुश रहे
    देश दुनिया पे जैसे आफत सी आ गई है ।बेरोज़गारी युवा वर्ग की चिंता का विषय बना हुआ है ।
    बेरोज़गारी की समस्या पर प्रकाश डालती हुई बहुत शानदार रचना ।

    1. Satish Pandey

      आपकी लेखनी से निकली समीक्षा उत्साहवर्धक है। भाव को समझने व विश्लेषण करने हेतु सादर अभिवादन।

  4. अतिसुंदर रचना शतप्रतिशत यथार्थ

    1. Satish Pandey

      सादर धन्यवाद जी

  5. आपकी रचना समकालीन यथार्थ पर आधारित है ।
    जो हो रहा उस हुबहू शब्दों के माध्यम से वयक्तकिया है ।
    सराहनीय

    1. Satish Pandey

      आपके द्वारा की गई इस बेहतरीन समीक्षा हेतु आभार व्यक्त करता हूँ।

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

  6. बहुत ही बढ़िया

    1. Satish Pandey

      धन्यवाद

  7. बहुत ही सुन्दर

    1. Satish Pandey

      Thank you

  8. Isha Pandey

    Nice, true lines

    1. Satish Pandey

      Thanks ji

  9. Kamal Pandey

    Very true fact

    1. Satish Pandey

      Thank You

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