सुनकर कांव कव्वे की

मुहल्ले में खड़े टावर में
सुनकर कांव कव्वे की,
सभी यह सोच कर खुश हैं
अब मेहमान आयेगा।
मगर वह पाहुना आयेगा
किसके घर किसी को भी
पता कुछ है नहीं
केवल भरोसा है कि आयेगा।
प्रियसी सोचती है आज उसका
प्रिय आएगा,
वृद्ध माँ सोचती है आज
उसका पुत्र आयेगा।
पत्नी सोचती है
दूर सीमा में डटा पति आज
डेढ़ महीने के लिए
छुट्टी में आयेगा।
बच्चे खुशी से सोचते हैं
जो भी आयेगा,
कुरकुरे, चॉकलेट और
चिप्स लायेगा।
मुहल्ले में खड़े टावर में
सुनकर कांव कव्वे की,
सभी यह सोच कर खुश हैं
कि कोई आज आयेगा।
– डॉ0 सतीश पाण्डेय, चम्पावत, उत्तराखंड।

Comments

7 responses to “सुनकर कांव कव्वे की”

  1. Rishi Kumar

    आज भी गांव में कौवे की आवाज सुनकर ऐसा अनुमान लगाते हैं की कोई मेहमान आने वाला है
    आपने डॉक्टर साहब बड़े ही अच्छे सुंदर शब्दों में रचना की

  2. बहुत सुंदर रचना डॉ पांडे जी👌👍

  3. Suraj Tiwari

    अद्भुत जँहा ना पहुचे रवि
    वंहा पंहुचे कवि…
    किसी शायर ने ठीक ही कहा है
    बहुत सुन्दर चाचा जी 💐💐

  4. harish pandey

    Very nice, very nice

  5. Geeta kumari

    बहुत ही सुन्दर और भाव पूर्ण रचना है ।सुनकर कांव कव्वे की,
    सभी यह सोच कर खुश हैं अब मेहमान आयेगा। कवि सतीश जी ने कव्वे की बोली से मेहमान आने की बात कही है जिससे सभी खुश है।गांव में ऐसी ही प्रथा होगी , सुंदर भावों की प्रधानता लिए हुए बहुत ही सौम्य, सरस रचना

  6. Harish Joshi

    क्या कहने जी आपकी लेखनी का। बहुत सुंदर रचना।

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