वो मेरा जीवनसाथी था….

मेरे सुंदर चेहरे और मीठी आवाज
पर टिका थे वो रिश्ते
जब आवाज घरघराने लगी
चेहरे पर झुर्रियां पड़ गईं
ढल गई जवानी
शाम-सी जब
दर्पण भी नजर चुराने लगा
तब टूट गये सारे रिश्ते
सब छोंड़ गये
मुझको मरते
तब दिया सहारा
जिन बाँहों ने
सहलाया जिसने हाँथों से
वह मेरा जीवनसाथी था
जो मेरे सुंदर चेहरे पर नहीं
सुंदर हृदय पर मरता था
उस समय समझ आया मुझको
ये जो सम्बंध होते हैं
वो सुंदर
हृदय और अटूट विश्वास पर
चलते हैं…..

Comments

9 responses to “वो मेरा जीवनसाथी था….”

  1. Rishi Kumar

    वाह जी वाह
    प्रज्ञा जी आपकी कविता हमें बहुत आनंदित करती है हर एक आप लिखती रहे हम सब पढ़ते रहे

    1. आपके इस कमेंट से पता चला मुझे कि आपको मेरी कविताए पसंद आती हैं
      बहुत शुक्रिया

  2. Satish Pandey

    वाह प्रज्ञा जी बहुत ही सुंदर कविता है। ये पंक्तियाँ और भी बेहतरीन हैं-
    जो सम्बंध होते हैं
    वो सुंदर
    हृदय और अटूट विश्वास पर
    चलते हैं…..

    1. जी, जीवन की सत्यता यही है अक्सर हम शारीरिक सुंदरता के प्रति आकर्षित होते हैं जबकि वह नश्वर होती है

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