यूँ खफा मत रहो
भुला दो बात बीती,
कब तलक गांठ मन में
आप बांधे रहोगे।
आप थोड़ा अधिक अच्छे
हम जरा सा बुरे
हैं तो इंसान ही
यूँ फर्क तुम कैसे करोगे।
अगर इंसान हैं तो
खूब कमियां भी रहेंगी
कमी की बात कर यूँ
कब तलक नफरत करोगे।
यूँ खफा मत रहो
Comments
11 responses to “यूँ खफा मत रहो”
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कवि सतीश जी की इस कविता में , किसी पुराने मित्र को मनाती हुई बहुत सुंदर पंक्तियां हैं । इंसान से गलतियां भी हो जाती है इस बात का भी ज़िक्र किया है और नफरत ना करने की गुजारिश भी की है। कोमल भावनाओं से सुसज्जित सुंदर रचना
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इस बेहतरीन समीक्षा और उत्साहवर्धन हेतु, आपका हार्दिक धन्यवाद गीता जी, आपने कविता के भाव का जिस खूबसूरती से विश्लेषण किया है वह अद्वितीय है।
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वाह सर वाह, ✍❤👌👌
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धन्यवाद ऋषि जी
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वाह वाह, बहुत खूब
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धन्यवाद जी
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Very very nice
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बहुत ही शानदार लिखा है सर
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अतिसुंदर भाव
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वाह वाह
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सुन्दर
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