तुम भले ही मुंह फुला दो
मुस्कुराना छोड़ना मत,
गीत गायें हम कभी तो
गुनगुनाना छोड़ना मत।
यदि बताएं बात दिल की
बीच में ही टोकना मत,
जो कदम आएं हमारी ओर
उनको रोकना मत।
जब कभी इजहार करना हो
तुम्हें चाहत का अपनी
बोल देना खुल के सब कुछ
क्या कहूँ यह सोचना मत।
गर रही सच्ची मुहोब्बत
वो झुका देगी अकड़
दूसरा पत्थर का हो तो
तुम स्वयं को कोसना मत।
– डॉ0 सतीश पाण्डेय, चम्पावत
मुस्कुराना छोड़ना मत
Comments
11 responses to “मुस्कुराना छोड़ना मत”
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वाह सर वाह, क्या कहने, बहुत लाजवाब
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वाह बहुत खूब
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बहुत बहुत धन्यवाद
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तुफानो से डरना नहीं,
गिरि बनकर अड़े रहना,
जब हिम्मत न हो पहाड़ बनने कि,
चिराग बनकर बूझ जाना|
पहाड़ से टकराकर तुफान भी,
वापस चला जाएगा,
रहा गर दीपक मे तेल
कोई जलाने चला आएगा|
——————————-बहुत सुन्दर रचना
(1) तुम भले ही मुह फुला दो
मुस्कुराना छोड़ना मत,
——-बहुत ही सुन्दर संदेश 👌
(2) जब कभी इजहार करना हो
तुम्हें चाहत का अपनी,
बोल देना खुल के सब कुछ,
क्या कहूं यह सोचना मत,
——- स्वतंत्रता का संदेश👌
हर एक पंक्ति में बहुत खूबसूरत यथार्थ परख रचना-
बहुत बहुत धन्यवाद
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अतिसुंदर
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सादर धन्यवाद
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बहुत खूबसूरती से आपने भावाभिव्यक्ति की है उम्दा रचना
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धन्यवाद प्रज्ञा जी
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बहुत ही शानदार प्रस्तुति और ख़ूबसूरत भावाभिव्यक्ति ।
सुन्दर शिल्प और वही चिर परिचित लय बद्ध शैली ।
बहुत सुंदर कविता है सर..-
इस बेहतरीन समीक्षात्मक टिप्पणी हेतु आपको बहुत बहुत धन्यवाद गीता जी।
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