कविता- डॉक्टर साहब
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देखिए डॉक्टर साहब जी,
बेटा क्यों अब रोता हैं|
रात अंधेरी काले बादल,
रिमझिम बरसा पानी था,
हाय पिताजी प्रेम तुम्हारा,
कितना अद्भुत अच्छा था,
देखा हमकों रोतें जैसे,
रख कंधे पर दौड़े चले,
दवा कराने कई कोश चले तुम,
रात अंधेरी काट चले,
इतनी जल्दी पापा तुमको,
नंगे पाव ही दौड़ दिए ,
ठेश सहें पग पग पर,
दर्द कभी ना सहने दिए,
हर जन्म में आपका ही मिलना,
‘ऋषि’ बिनती ऐसा करता हैं,
जन्म2 सेवा करके भी,
ना ऋण से मुक्ति पा सकते हैं, देखिये…….
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**✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’
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