“आखिर दीवाली उनकी भी तो है”

चाइनीज झालर नहीं
दीये जलाओ
किसी गरीब के घर रोशनी करके
दीपावली मनाओ
झुग्गी, झोपड़ी वालों के भी अरमान होते हैं
किसी एक के घर में प्रकाश तुम फैलाओ
यूं तो अरबों की बारूद में
तुम आग लगा देते हो
किसी के घर का इस बार
अंधकार तुम मिटाओ
पटाखे जलाने से भी ज्यादा
सुख मिलेगा तुम्हें
एक बार किसी गरीब की
भूख तुम मिटाओ
हमेशा मनाते हो तुम दीवाली
शानों शौहकत से
इस बार दीपावली
साधारण तरीके से मनाओ
चाइनीज शो-पीस से नहीं
इस बार दीप और मोमबत्ती
जलाकर दीपावली मनाओ
यकीन मानो
जब तुम दीये किसी गरीब से
खरीदोगे
बड़ा चैन आयेगा
एक बार दीपावली
कुछ ऐसे ही मनाओ
“आखिर दीवाली उनकी भी तो है”
इस बार किसी गरीब की मुस्कान बन जाओ…

Comments

14 responses to ““आखिर दीवाली उनकी भी तो है””

  1. Geeta kumari

    अति सुन्दर भाव और चीन की वस्तुओं के विरोध में बहुत सुंदर कविता

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  4. Satish Pandey

    “किसी के घर का इस बार
    अंधकार तुम मिटाओ
    पटाखे जलाने से भी ज्यादा
    सुख मिलेगा तुम्हें
    एक बार किसी गरीब की
    भूख तुम मिटाओ”
    बहुत ही लाजवाब और सुन्दर अभिव्यक्ति

    1. धन्यवाद भाई

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