9 Comments

  1. बदल रही है ज़िंदगी, बदल रही हूँ मैं..!
    तुम इश्क हो तुम्ही में ढल रही हूँ मैं!!

    नरमी तुम्हारे हाथों की ओढ़े हुए हैं धूप..!
    तपिश में इसकी बर्फ़ सी पिघल रही हूँ मैं!!

    उपर्युक्त चार पंक्तियां पढ़कर बड़ा
    आनन्द प्राप्त हुआ
    एक प्रोफेशनल कवि
    की भांति आपने अपनी
    कविता से हृदय को छू लिया है
    परिपक्व शिल्प सौंदर्य👌👌👌👏

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