कविता : वंदे मातरम का ,फिर से अलख जगाना होगा

इधर चुनावों की हलचल है और कुर्सियों की टक्कर
उधर बुझ रहे माँ के दीपक ,जलते जलते सरहद पर
क्या होगा ऐसी कुर्सी का
जनता की मातमपुर्सी का
सत्ता के इन भूंखे प्यासों को
अब तो कुछ समझाना होगा
वंदे मातरम का ,फिर से अलख जगाना होगा ||
कितना कष्ट सहा घाटी ने
कितना खून बहा माटी में
कितनी मिटी मांग की लाली
कितनी गोद हो गयी खाली
हिमगिरि के हर कण कण को
ज्वालामुखी बनाना होगा
वंदे मातरम का ,फिर से अलख जगाना होगा ||
गाँधी के सपनों का भारत
झोपड़ियों में सिसक रहा है
मर्यादा ,विश्वास अहिंसा
सत्य दृगों में सिमट रहा है
मेहनतकश हाथों में अविरल
अब तो विश्वास जगाना होगा
वंदे मातरम का ,फिर से अलख जगाना होगा ||
‘प्रभात ‘ भ्रष्टाचार लोगों की ,अब नश नश में समाया है
बिन मेहनत किये घर में ,देखो कितना धन आया है
आज ,सड़क जाम और शोर शराबा
सब घटना के बाद हुआ है
बिक जाते हैं सारे प्यांदे
धन का यूँ उन्माद हुआ है
कितने भूंखे पेट से सोये
तंग हाल बेकार फिरे हैं
संसद में जिन्हे चुनकर भेजा
भ्रष्टाचारी कुछ उनमें निकले हैं
कैसे सुधरे देश हमारा
लोग सोंच रहे ,पर डरे डरे हैं
पश्चिम के रंग ढंग अपनाकर
पाल लिये विषधर काले हैं
रहबर की रहजन बनकर
ये वतन का सौदा करते हैं
मीर जाफर और जयचन्दों का
ये अनुसरण करते हैं
इनकी इन हरकतों का
अच्छा सबक सिखाना होगा
वंदे मातरम का ,फिर से अलख जगाना होगा ||

Comments

8 responses to “कविता : वंदे मातरम का ,फिर से अलख जगाना होगा”

  1. बहुत खूब, अतिसुन्दर प्रस्तुति

    1. Prabhat Pandey

      Thanks sir, jai hind

  2. बहुत ही मार्मिक और सोंचनीय रचना
    जय हिंद

    1. Prabhat Pandey

      Thanks ma’am, jai hind

    1. Prabhat Pandey

      Thanks sir

    1. Prabhat Pandey

      Thanks sir

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