आँखों को खोल दे जो
ऐसी ही ताजगी हो
तुम तो सुबह की चाय सी
मीठी सी ताजगी हो।
बाहर निकल के देखा
पौधों में ओस सी हो,
तुम ही तो जिन्दगी में
सचमुच के जोश सी हो।
आनन्द है तुम्हीं से
जीवन सुखद तुम्हीं से,
प्राणों का धन तुम्हीं हो
एकत्र कोष सी हो।
खुशबू हो फूल की तुम
रवि का उजाला हो तुम
हो टेक जिंदगी की
आधार ठोस सी हो।
—– सतीश चंद्र पाण्डेय, चम्पावत, उत्तराखंड
मीठी सी ताजगी हो
Comments
7 responses to “मीठी सी ताजगी हो”
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बहुत खूब
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बहुत बहुत धन्यवाद
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वाह वाह
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सादर धन्यवाद
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Very nice
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बहुत बहुत धन्यवाद
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कविता में उच्चतम पकड़
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