हड़बड़ी में कभी-कभी,
हो जाती है गड़बड़ी।
इसलिए जो भी करना है
सोच समझ कर करना है।
कोई हमें डराए तो,
नहीं किसी से डरना है।
सूझ-बूझ से काम करें हम,
आए रौशनी मिटेंगे सारे तम।।
____✍️गीता
सूझ-बूझ
Comments
6 responses to “सूझ-बूझ”
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बहुत शानदार व उच्चस्तरीय रचना। लेखनी बहुत शानदार गति से आगे बढ़ती है आपकी। सतत प्रवाह है इसमें।
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इतनी सुन्दर,प्रेरक और कविता लिखने वाले को उत्साह प्रदान करती हुई बहुत ही उच्च स्तरीय समीक्षा हेतु आपका हार्दिक धन्यवाद सतीश जी।
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Bahut sundar rachna
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बहुत-बहुत धन्यवाद सर
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बहुत ही सुन्दर रचना है आपकी काव्यात्मक क्षमता प्रखर है
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बहुत-बहुत धन्यवाद प्रज्ञा जी
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