अब ना ढूंढना कभी
मुझे मन के उजालों में
अंधकार की ओर
बस एक कदम बढ़ा लेना
बिखरें हों जहाँ
कंटक बेशुमार
बस वही पर मेरा निशान मिलेगा…
अब ना ढूंढना कभी
मोतियों की चादर में
धूप की लड़ियों में
याद आए तो
खोज लेना…
स्वप्न में आऊंगी तुम्हारे
तुम्हारी पलकों के द्वार
खट-खटा कर कहूँगी तुमसे
अब ना ढूंढना कभी…………!!
अब ना ढूंढना कभी……..!!
Comments
6 responses to “अब ना ढूंढना कभी……..!!”
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बहुत खूब
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धन्यवाद😊😊😊
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अब ना ढूंढना कभी
मुझे मन के उजालों में
अंधकार की ओर
बस एक कदम बढ़ा लेना
बिखरें हों जहाँ
कंटक बेशुमार
बस वही पर मेरा निशान मिलेगावाह वाह ह्रदयविदारक
भाव
अति श्रेष्ठ रचना प्रज्ञा जी
हमें अनुग्रहीत करने और साहित्य से सराबोर करने वाली
ऐसी ही रचना की तलाश थी
बहुत ही सुंदर रुबाई लिखी है आपने…
मुझे आपकी कविता पढ़कर अमृता प्रीतम जी की रचना याद आ गई…
” मैं तुम्हें फिर मिलूंगी”
वैसी ही कल्पना की सजीवता वैसा ही जीवंत एहसास..-

धन्यवाद आपका
मुझे एक सुंदर समीक्षा वा सुंदर विषय प्रदान करने हेतु..
मेरी कविता मैं तुम्हें फिर मिलूंगी लिखी जा चुकी है..
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सब एक हैं
Great poem -
अब ना ढूंढना कभी
मुझे मन के उजालों में
अंधकार की ओर
बस एक कदम बढ़ा लेना
बिखरें हों जहाँ
कंटक बेशुमार
बस वही पर मेरा निशान मिलेगा…नवीन शब्दकोश तथा सुंदर भाव प्रगढ़ता।
जो कवि की साहित्य साधना को प्रदर्शित करता है
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