कठपुतली

कठपुतली तो देखी होगी ना….
हाँ, वही काठ की गुड़िया।
जिसकी डोर रहती है सूत्रधार के हाथों में,
वह अपनी उँगलियों से जैसे चाहे,
उसे नचाता है….
दर्शकों को भी आनन्द आता है।
लगता है कि उसमें जान है,
लेकिन, कहां….
वह तो बिल्कुल बेजान है।
नाचती रहती है सूत्रधार के इशारों पर केवल।
इशारों पर नाचोगे,
तो नचाएगा यह जमाना…
हे प्रभु, कभी किसी को किसी की कठपुतली न बनाना।।
_______✍️गीता

Comments

15 responses to “कठपुतली”

    1. Geeta kumari

      धन्यवाद सर 🙏

  1. Satish Pandey

    तो नचाएगा यह जमाना…
    हे प्रभु, कभी किसी को किसी की कठपुतली न बनाना।।
    —- कवि गीता जी की बहुत सुंदर रचना। बहुत सत्य कहा है आपने, उत्तम रचना

    1. Geeta kumari

      सुन्दर और लाजवाब समीक्षा के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद सतीश जी

  2. बहुत लाजवाब रचना

    1. आभार पीयूष जी

  3. श्रेष्ठ कवि हैं आप, वाह, बहुत खूब

    1. आपकी इस सराहना हेतु आपका हृदय तल से आभार कमला जी 🙏

  4. vikash kumar

    अपनी किरदार निभाने ही पड़ेंगे
    जो लिखा हैं वो होना ही हैं
    सब मौन ना हो सकते जहां में
    कुछ कोलाहल भी जरूरी हैं
    रचना विकास कुमार

    1. धन्यवाद विकास जी

    1. Geeta kumari

      धन्यवाद भाई जी🙏

  5. बहुत खबब कहा कवि गीता जी की बेहद शानदार रचना

Leave a Reply

New Report

Close