ख़ामोशी की तह में,
छिपा कर रखते हैं हम,
अपने सारे ग़म।
क्योंकि कर के कोलाहल,
दिखाकर दुःख दर्द अपने
नहीं मिटेंगे अन्धेरे ज़िन्दगी के।
पीना ही पड़ता है,
ख़ामोशी का हलाहल
ज़िन्दगी के कुछ उजालों के लिए ।।
_____✍️गीता
ख़ामोशी का हलाहल
Comments
11 responses to “ख़ामोशी का हलाहल”
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पीना ही पड़ता है,
ख़ामोशी का हलाहल
बहुत सुंदर रचना-
बहुत बहुत धन्यवाद सर
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पीना ही पड़ता है,
ख़ामोशी का हलाहल
ज़िन्दगी के कुछ उजालों के लिए,
—- शानदार लेखनी, बहुत सुंदर भाव, अत्यंत गहराई लिए हुए भाव।-
उत्साह वर्धक और प्रेरक समीक्षा हेतु आपका हार्दिक धन्यवाद सतीश जी
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बहुत खूब वाह
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धन्यवाद पीयूष जी
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बहुत अच्छी रचना
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बहुत-बहुत धन्यवाद सर
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अतिसुंदर रचना
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सादर धन्यवाद भाई जी 🙏
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ख़ामोशी की तह में,
छिपा कर रखते हैं हम,
अपने सारे ग़म।
क्योंकि कर के कोलाहल,
दिखाकर दुःख दर्द अपने
नहीं मिटेंगे अन्धेरे ज़िन्दगी के।
पीना ही पड़ता है,
ख़ामोशी का हलाहल
ज़िन्दगी के कुछ उजालों के लिए ।।जीवन की सच्चाइयों को पेश करती हुई रचना
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