मन बना पाहन

मन बना पाहन
न कारण है पता,
तोय के धोए से
केवल धुल गया।
फिर मरुत से भाप
बनकर उड़ गया,
राज भीतर का वो
भीतर रह गया।
यामिनी भीतर ही
बैठी रह गयी,
दामिनी बाहर
चमकती दिख रही।
अब जलधि का
कौन मंथन कर सके
उस अमिय की आस
केवल रह गयी।
हाँ, नहीं विष की
कमी है दोस्तों,
व्याल चारों ओर
काफी उग गये।
खुद के भीतर भी
फणी प्रवृति आ,
और पर मन विष
उगलता रह गया।
मैं स्वयं वनराज
खुद को मानकर
पाशविक कृत्यों को
करता रह गया।

Comments

4 responses to “मन बना पाहन”

  1. बहुत खूब सर

  2. वाह सर बहुत सुंदर रचना

  3. Geeta kumari

    अब जलधि का
    कौन मंथन कर सके
    उस अमिय की आस
    केवल रह गयी।
    ________ समुंद्र मंथन में जिस प्रकार विष मिला था और अमृत भी उसी प्रकार जीवन के सागर में कवि सतीश जी ने विष और अमृत दोनों के ही मिलने की बात कही है सागर जितनी अथाह गहराई लिए हुए बहुत श्रेष्ठ रचना, सुंदर शिल्प और उच्च स्तरीय लेखन

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