निशा की है शान निराली

नभ में तारे चमक रहे हैं,
चन्द्रमा भी दमक रहे हैं।
निशा की है शान निराली,
सुबह के गए घर लौट रहे हैं।
पंछी भी वापस नीड में आए,
निशा की गोद में चैन पाएं।
दिन भर की थकन से चूर जनों को,
निशा अपने आलिंगन में सुलाए।
निशा में नभ की छटा निराली,
निहार मुग्ध हो रही मैं तो आली।
अनगिन तारे देख आभास हो रहा,
मानो नभ मना रहा दीवाली॥
_____✍गीता

Comments

11 responses to “निशा की है शान निराली”

  1. Satish Pandey

    कवि गीता जी की यह कविता बहुत सुंदर शब्द चित्र का सृजन किये हुए है। कविता की भावप्रवणता लाजवाब है। वर्णनात्मक शिल्प से कविता की खूबसूरती में चार चांद लगे हैं।

    1. Geeta kumari

      इस उच्च स्तरीय समीक्षा हेतु आपका बहुत-बहुत धन्यवाद सतीश जी हार्दिक आभार सर

  2. बहुत बढ़िया रचना

    1. Geeta kumari

      बहुत-बहुत धन्यवाद सर

  3. vikash kumar

    अनगिन तारे देख आभास हो रहा,
    मानो नभ मना रहा दीवाली॥

    1. Geeta kumari

      धन्यवाद जय राम जी की

    1. Geeta kumari

      Thanks for your nice compliment Chandra ji

    1. Geeta kumari

      Thank you very much sir

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