भोर

भोर होती है
हर रोज
बहुल के लिए
आशा की
एक किरण लेकर
नऐ विचार
नई ख्वाहिशें
नई चाह
नई भूख
जो होती है
पद-प्रतिष्ठा
धन- दौलत
वस्तुओं
संबंधों
को समेटने की…

बहुल के होती है भोर
बस वही प्राचीन
एक चिर-परिचित
भूख लिए
रोटी की…..

Comments

10 responses to “भोर”

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    सुंदर

    1. Anu Singla

      बहुत बहुत धन्यवाद जी

  2. बहुत सुन्दर रचना

    1. Anu Singla

      बहुत बहुत धन्यवाद जी

  3. Geeta kumari

    भोर होती है हर रोज
    बहुल के लिए ,आशा की
    एक किरण लेकर….
    ________ प्रत्येक भोर आशा की किरण लेकर आती है,इसी सुंदर सत्य को परिलक्षित करती हुई कवियित्री अनु सिंगला जी की एक बेहतरीन रचना

    1. Anu Singla

      प्रोत्साहन के लिए सह्रदय धन्यवाद

  4. भोर होती है
    हर रोज
    बहुल के लिए
    आशा की
    एक किरण लेकर
    नऐ विचार
    नई ख्वाहिशें
    नई चाह….
    वाह अनु,
    सुबह का सुंदर वर्णन तथा आधुनिक विधा में सिमटी कविता है आपकी…

    1. Anu Singla

      बहुत बहुत धन्यवाद जी

  5. vikash kumar

    Great

    1. Anu Singla

      Thank you

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