हरी दूब पर सुबह सवेरे,
किस के बिखर गए हैं मोती।
किस जौहरी का लुट गया है,
देखो सुबह-सुबह खजाना।
पुष्प और पल्लव सब मुस्काए,
ये किसने हीरे बिखराए।
देखो प्रकृति लुटा रही है,
प्रा:त काल में सुन्दर नज़राना।
स्वर्ण बरसा रही हैं देखो,
सुबह-सुबह सूरज की किरणें।
अभी तलक क्यों सो रहे हो,
उठो सवेरा हो गया है॥
______✍गीता
प्रा:त काल में सुन्दर नज़राना
Comments
12 responses to “प्रा:त काल में सुन्दर नज़राना”
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बहुत सुन्दर रचना
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हार्दिक धन्यवाद कमला जी
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अतिसुंदर भाव पूर्ण रचना
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सादर धन्यवाद भाई जी🙏
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कवि गीता जी की बहुत सुंदर रचना
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हार्दिक धन्यवाद चंदा जी
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स्वर्ण बरसा रही हैं देखो,
सुबह-सुबह सूरज की किरणें।
अभी तलक क्यों सो रहे हो,
उठो सवेरा हो गया है॥
—— बहुत ही शानदार लेखनी है। अत्यंत निर्मल भाव हैं। वाह वाह-
इस उत्साहवर्धक समीक्षा के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद सतीश जी, हार्दिक आभार सर
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बहुत सुंदर कविता
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हृदय से आभार कमला जी🙏
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स्वर्ण बरसा रही हैं देखो,
सुबह-सुबह सूरज की किरणें।…… सुबह का बहुत सुंदर वर्णन और अनुप्रास अलंकार से सजी बहुत लाजवाब कविता -

वाह अति सुंदर
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