कोमल आभा बिखर रही है ( चौपाई छन्द)

चमक रही है नयी सुबह
सूरज की किरणें फैली हैं,
बन्द रात भर थी जो आंखें,
उनमें नई उमंग खिली है।
गमलों के पौधों में देखो,
नई ताजगी निखर रही है,
फूलों में कलियों में प्यारी
कोमल आभा बिखर रही है।
आँखें मलते गुड़िया आयी,
सुप्रभात कहने को सब से,
शुभाशीष लेकर वह सबका
प्रार्थना करती है रब से।
बिजली के तारों में बैठी
चिड़ियाओं की बातचीत सुन,
ऐसा लगता है दिन भर के
रोजगार की है उधेड़बुन।
राही थे आराम कर रहे
अपनी-अपनी शालाओं में
वे सब फिर से निकल चुके हैं
सुबह सुबह की वेलाओं में।
काव्यगत सौंदर्य – चौपाई छन्द में प्रकृति वर्णन का छोटा सा प्रयास।

Comments

14 responses to “कोमल आभा बिखर रही है ( चौपाई छन्द)”

  1. बहुत ही सुन्दर कविता, वाह

  2. Geeta kumari

    प्रातः काल के प्राकृतिक सौंदर्य पर छटा बिखेरती हुई कवि सतीश जी की अत्यंत खूबसूरत कविता

    1. बहुत बहुत धन्यवाद, आपकी टिप्पणी बहुत प्रेरणादायक है।

  3. Arvind Kumar

    प्राकृतिक सौंदर्य पर बहुत सुंदर और उच्च स्तरीय कविता

    1. बहुत बहुत धन्यवाद, उत्साहवर्धन हेतु हार्दिक आभार

  4. अतिसुंदर रचना

    1. सादर धन्यवाद शास्त्री जी

  5. अति सुंदर रचना

    1. बहुत बहुत धन्यवाद

  6. बहुत बेहतरीन रचना

    1. बहुत बहुत धन्यवाद

  7. Deepa Sharma

    सुबह की सुंदरता पर बहुत ही सुंदर कविता

    1. सादर धन्यवाद

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