तैयार खड़े हैं

तोहमत लगाने की आदत
कब की छूट चुकी है
मैं गुलाम ही सही मुझे
सबकी आजादी की पड़ी है
मुक्त होती है रुह मरकर ही
मुझे मुक्त होना है जीते जी ही
इक बीज किसी फल का नहीं
कहीं यूं ही फेंकता हूं मैं कहीं
जमीन अपनी हो या परायी
हरियाली कि उम्मीद न छोड़ता हूं कहीं
पर्यावरण में सुधार के लिए ही
शायद मैं भविष्य में अगर जिंदा हूं
जिंदगी में बीत चुकी है जो गलतियां
उसके लिए तब तभी ही शर्मिंदा हूं
हर रोज बदल जाते हैं इंसान यहां
क्यूं पुरानी गलतियों के लिए कोसते हैं
बीते हुए कर्मों की सजा भोग रहें हैं
वर्तमान के कर्मों के लिए तैयार खड़े हैं

Comments

5 responses to “तैयार खड़े हैं”

  1. Amita Gupta

    जमीन अपनी हो या पराई ,हरियाली की उम्मीद ना छोड़ता हूं कहीं
    बहुत शानदार पंक्तियां👍🏻

  2. Ekta Gupta

    पर्यावरण में सुधार के लिए ही ।शायद भविष्य में मैं अगर जिंदा हूं ।सुंदर अभिव्यक्ति

  3. राकेश पाठक

    पर्यावरण संदेश

  4. पर्यावरण पर की बहुत ही सुंदर रचना

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