Author: Ekta Gupta

  • कार्य पर सुरक्षा एवं विश्व स्वास्थ्य (२८ अप्रैल)

    है आज कार्य पर सुरक्षा एवं विश्व स्वास्थ्य दिवस
    श्रमिकों को भी खुश रखे ,ना करें उन्हें अब और विवश
    मजदूरों की स्वास्थ्य परेशानियों को हम दूर करें
    इन्हें जागरूक करें और मिटायें इनके जीवन का तमस्
    ——✍️—- एकता गुप्ता

  • कार्य पर सुरक्षा एवं विश्व स्वास्थ्य दिवस

    आज मनाते स्वास्थ्य दिवस एवं होती कार्य पर सुरक्षा
    आओ हम सब मिलकर करते हैं थोड़ी सी परिचर्चा
    दुनिया भर में काम के दौरान श्रमिकों के साथ हो जाता हादसा
    हादसो में श्रमिक गुजर जाते हैं ,बस रह जाती इन पर वार्ता
    इनकी क्षमताओं को जगाने में करनी हैं थोड़ी सी चर्चा
    इस दिवस का उद्देश्य स्वास्थ्य सुविधाएं इन्हें उपलब्ध कराना
    होती मजदूरों को जो परेशानियां उससे उन्हें अवगत कराना
    जागरूक कर मजदूरों को कर, हम कर सकते हैं इनकी रक्षा
    आओ हम सब मिलकर करते हैं थोड़ी सी परिचर्चा
    ——✍️—- एकता गुप्ता

  • मां बहन के नाम की गाली

    आज जब धरती मां सुला रही लोगों को अपनी गोद
    फिर भी रंजिशे मिट नहीं रही ,पुरानी बातें भी रहें खोद
    प्यार स्नेह तो बचा नहीं, गालियां देते एक दूजे को रोज
    मां बहन के नाम की गाली तो सब के मुंह में ऐसे रहे जैसे मोहनभोग
    भगवान के नाम से भी ज्यादा विख्यात हुई यें गालियां, है कुछ ऐसा संजोग
    बड़े बूढ़े तो देते फिरे खेलते समय बच्चे भी देते ,ना पातें खुद को रोक
    एक मां के जाए दो लाल यदि आपस में लड़े , अपनी मां को भी गाली देते हैं ताल ठोक
    गालियों से शुरू होता झगड़ा और हो जाते गोलियों से खोपड़ियों में छेद
    मिंन्टों समय बीत ना पाए, रुक जाती सांसें और खून हो जाता सफेद
    नहीं इस पर कोई रोकथाम क्या‌ है इसका भेद
    मां बहन के नाम की गंदी गालियां सुन होता मन को बड़ा खेद
    ——-✍️——एकता

  • समाज का विकृत रूप भाग(३)

    आज की शिक्षित समाज के लोगों को मैंने अनपढ़ पाया ,
    बेटी बनी बहू को भी एक पल में ठुकराया,
    मानवता तो बची नहीं जताते बड़ा अपना_ पराया ,
    मायका भी है ससुराल भी है गोद में एक मासूम सा बच्चा भी है , लोगों की भीड़ में उसने खुद को अकेला पाया ,
    ना जाने हम सब में ही छुपा कहां दानव बैठा ,
    जिसने स्त्री के अस्तित्व को मिटाने का नियम बनाया ,
    हे ईश्वर आपकी बनाई दुनिया ने स्त्री का क्यों मजाक बनाया ।।——✍️–एकता—-

  • समाज का विकृत रूप भाग(२)

    2 साल अभी बस बीते, पोते की खुशी में सब जीते ,
    अचानक पति की तबीयत बिगड़ी और वह सांस ना ले पाया,
    छोड़ दी उसने अपनी सांसे ऑक्सीजन उसे न मिल पाया ,
    बेटे की मौत हुई अभी दो दिन हुए नहीं बहू को भी ससुरालियों ने ठुकराया,
    जिस बेटी ने बन बहू, बीवी, सब का फर्ज निभाया ,
    पति की मौत जैसे हुई, क्यों सब ने उसका अस्तित्व मिटाया,
    ना मायके का साथ न ससुरालियों ने अपनाया ,
    मायके वाले भी सोचे हमने तो बेटी की शादी कर सारा फर्ज निभाया ।

  • समाज का विकृत रूप

    आज मन बड़ा द्रवित हुआ , सोचा सबको बतला दूं,
    समाज का एक ऐसा भी रूप सोचा सब को दिखला दूं,
    बड़ा परेशान पिता था बेटी की शादी के लिए ,
    ना जाने कितने लड़के आए उसकी बेटी को देखने के लिए,
    कोई सांवली कह देता, किसी ने नाटी कहकर ठुकराया,
    कोशिश जारी रही और एक रिश्ता नजर आया ,
    कर दी बेटी की शादी सुंदर सा था घर बसाया ,
    घर पहुंची बेटी बहू बनकर तो सब ने प्यार से अपनाया ,
    2 साल अभी बस बीते पोते की खुशी में सब जीते

  • ओ मां अंजना के लाल

    आज है जन्मदिवस तेरा ओ मां अंजना के लाल ,
    कलयुग के देवता कहां हो तुम ?
    आ जाओ करने फिर से हम सबकी देखभाल ,
    आप की बनाई दुनिया में महामारी के बादल छाए ,
    दिन पर दिन उठ रहे बच्चों पर से मां-बाप के साए ,
    स्थितियां दिन पर दिन हुई गंभीर ,
    लोगों की दशा देख मन हो जाता अधीर ,
    इस दुनिया के लोगों की सांसे ,बजरंगी फिर से दो संभाल ,
    कलयुग के देवता कहां हो तुम , आ जाओ करने देखभाल
    त्रेतायुग में आपने ही , लक्ष्मण भैया के प्राण बचाए थे ,
    लाए थे तुम संजीवन बूटी , झोपड़ी सहित सुषेण वैद्य भी लाए थे ,
    ऐसी ही कोई संजीवन बूटी फिर से ला दो,
    और लोगों की जिंदगी करो खुशहाल ,
    रखने आ जाओ बजरंगी हम बच्चों का फिर से खयाल ,
    मुबारक हो जन्मदिवस ओ मां अंजना के लाल ।

  • प्रार्थना (हनुमान जयंती )

    सोचा था आज है हनुमान जयंती, कराऊगीं सुंदर से भजन कीर्तन
    पर बड़ा द्रवित यह मन हो उठा, सुनकर चंहुओर क्रंदन
    करती हूं प्रार्थना बजरंगी, सुन लो अब मेरी विनती ।
    लोगों की पीड़ा हरो , ताकि स्वस्थ और खुशहाल हो सब जन
    ———-✍️———— एकता गुप्ता

  • बौद्धिक संपदा (दिवस)

    है अनमोल धरोहर ये अपनी बौद्धिक संपदा
    कर सकता इसे कोई इसे क्षीण नहीं ,रहती साथ में सर्वदा
    कोई नया काज करें , या कोई हो स्रजित् अविष्कार
    हो कोई कलात्मक कार्य , या हो विचारकों के विचार
    हो कोई नयी क्रति कलात्मक , या कोई संगीत आत्मक
    जिन्हे व्यक्ति करे स्वयं बौद्धिक श्रम से उत्पादित
    करके कुछ नया प्रतिपादित
    है उसे बौद्धिक संपदा का अधिकार
    लोगों की नयीं खोजे हो नवाचार ।
    इनका उपयोग कर बढा सकते हम अपनी धन संपदा !!
    क्यों रौब दिखाते हम पुरखों की विरासत पर
    कुछ लोग लडते रहते हैं झूठी सियासत पर
    इसे कोई भी छीन नहीं सकता आप की भी इजाजत पर
    आओ कुछ नया करें ,और नाज करें खुद की बनाई
    नयी विरासत पर
    अपनी बौद्धिक संपदा को अपनी विरासत बनाये।
    आओ बौद्धिक संपदा दिवस मनायें
    ——✍️—– एकता

  • एक बूढ़ी अम्मा का आग्रह

    एक बूढ़ी अम्मा का घर आना हुआ,
    बातों का सिलसिला जब शुरू हुआ,
    अम्मा कहती जब से ई मोबाइल आया,
    वयस्कों संग बच्चा भी हमसे बात करने से कतराया,
    जैसे ही सुबह हुई बच्चों ने बस मोबाइल चलाया,
    गलती केवल बच्चों की ही नाहीं ,
    मोबाइल तो मां-बाप ने ही बच्चों को पकड़ाया
    ई मोबाइल के चक्कर में बच्चा भी सारे संस्कार भुलाया,
    जहां हंसी ठिठोली होती थी वहां अब सन्नाटा छाया,
    हमका भी कुछो अब याद नहीं, न जाने कब हमने था
    बच्चन का कहानियां सुनाया,
    कहती अम्मा जब था कीपैड फोन आया,
    बड़ा खुश हुआ मेरा मन ,घर बैठे जब सब से बात कर पाया
    पर सूना हुआ मेरा आंगन, जब से ई एंड्राइड फोन आया
    अम्मा भी चाहें हंसना और बच्चों के संग बतियाना,
    हम जानित हैं मोबाइल भी है जरूरी
    पर थोड़ा समय साथ में हमहूं चाही बिताना,
    अपने बुजुर्गों के संग थोड़ा समय व्यतीत करें
    ताकि हम बुजुर्ग भी खुशहाल रहें,
    बस बूढी अम्मा ने आप सबको यही संदेशा भिजवाया है।
    _____✍️____ एकता गुप्ता

  • वसुधा को हरा-भरा बनाए हम

    जब सांसे हो रही है कम ,आओ फिर से वृक्ष लगाएं हम,
    आओ नमन करे हम वसुधा, को जो मिटाती है हम सबकी क्षुधा को,
    जो बिना भेदभाव हम सबको पाले,वह भी चाहे पेड़ों की बहुधा को,
    नये पेड़ों को फिर से रोपकर, इसे फिर बनाए रत्नगर्भा हम,
    आओ फिर से वृक्ष लगाएं हम।
    एक अकेले से कुछ ना होगा,हमें चाहिए सबका साथ,
    पृथ्वी मां की रक्षा को फिर से बढ़ाओ अपने हाथ,
    फिर कमी न कुछ जीवन में होगी,होगी तरक्की दिन और रात,
    खुद जागें औरों को भी जगाए हम,
    आओ फिर से वृक्ष लगाएं हम।
    मानो तो माटी है मानो तो यह है चंदन,
    हम सब मां को मनाएंगे और करेंगे फिर से वंदन,
    पृथ्वी को हरा-भरा करने को निछावर कर दें अपना तन मन,
    पृथ्वी मां जब मुस्काएगी तब दूर होंगे सारे गम,
    आओ फिर से वृक्ष लगाएं हम।
    ऑक्सीजन की कमी यूं बनी हुई,सांसे यूं सबकी थमी हुई,
    लोगों का बिछड़ना शुरू हुआ,आंखों में फिर से नमी हुई,
    ऑक्सीजन की कमी को दूर करें यूं हम,
    आओ फिर से वृक्ष लगाएं हम।
    जब धरती मां मुस्काएगी,परेशानियां स्वयं दूर हो जाएंगी,
    एक दिन की तो यह बात नहीं,होगी यदि इनकी देखभाल जीवन में खुशियां आएंगी,
    एक दिन के पृथ्वी दिवस से क्या होगा,आओ रोज पृथ्वी दिवस मनाएं हम।
    आओ फिर से वृक्ष लगाएं हम।।
    (पृथ्वी दिवस पर रचित मेरी कविता का संपूर्ण अंश प्रेषित ना होने के कारण मैं यह कविता आज पुनः प्रेषित कर रही हूं।)

  • विश्व मलेरिया दिवस (25 अप्रैल)

    आज 25 अप्रैल को विश्व मलेरिया दिवस मनाते हैं,
    इसी मलेरिया के कारण हजारों लोग अपनी जान गंवाते हैं,
    इलाज से बेहतर होता स्वयं का बचाव करना,
    कोशिश करें फुल कपड़े पहनने की, घर में पानी का ना जमाव करना,
    घर में रखे साफ सफाई यही सुझाव हम बताते हैं।
    आज 25 अप्रैल को विश्व मलेरिया दिवस मनाते हैं।
    जब आसपास कूड़ा करकट ना होगा,
    घर और वातावरण दोनों स्वच्छ होगा,
    जब एनाफिलीज ना पनपेगा कोई भी ना संक्रमित होगा,
    अपना कर थोड़े से नियम आओ सब को स्वस्थ बनाते हैं।
    आज 25 अप्रैल को विश्व मलेरिया दिवस मनाते हैं।
    मच्छरों के आतंक से बचने को आओ बर्ते हम सावधानी,
    इसके लिए पीते रहे हम स्वच्छ पर्याप्त पानी,
    और सोते समय अवश्य प्रयोग करें मच्छरदानी,
    स्वयं का भी ख्याल रखें आओ यही नियम अपनाते हैं।
    आज 25 अप्रैल को विश्व मलेरिया दिवस मनाते हैं।।

  • समाज की वास्तविक रूप रेखा(भाग_5))

    घर की दहलीज जब लागी तो ऐसा मंजर देखा
    जिन्होंने अपनों को खोया उनके लिए कोरोना महामारी
    जो इससे बचकर घर वापस आए उनके लिए ये बीमारी
    अभी भी सड़कों पर खुला तुम क्यूं घूम रहे
    कब समझोगे अपनी जिम्मेदारी
    कुछ अभी भी समझते मजाक इसे
    कुछ की सांसे थमते देखा
    यह आंखों देखी सच्चाई ,नहीं कोई रूपरेखा
    गलियों में नजर आई लाशें,लगता जैसे हो रहे हो खेल तमाशे
    ना जाने कैसा कहर यह आया है, थम गई ना जाने कितनी अनगिनत सांसे
    गंगा मैया के घाट पर लाशों को एक क्रम से अनगिनत जलते देखा ।
    आज समाज की ऐसी ही हो गई वास्तविक रूप रेखा

  • समाज की वास्तविक रूप रेखा(भाग_4))

    घर की दहलीज जब लाघीं तो ऐसा मंजर देखा
    जो भाई आपस में प्यार से रहते थे , परिवार में खुशियां लुटाते थे
    आज भाइयों के बीच बंटवारे हुऐ ,जो कभी एक थाली में साथ में खाते थे
    रत्ती भर जमीन के टुकड़े के खातिर उन भाइयों को आपस में लड़ते देखा
    यह आंखों देखी सच्चाई ,नहीं कोई रूपरेखा
    दास प्रथा तो खत्म हुई पर आज भी क्या यह ऐसा है
    जब लहू का रंग सबका समान तो ये भेदभाव फिर कैसा है
    आज अमीरी को फिर गरीबी पर भारी पड़ते देखा
    यह आंखों देखी सच्चाई, नहीं कोई रूपरेखा

  • समाज की वास्तविक रूप रेखा(भाग_३))

    घर की दहलीज जब लाघीं तो ऐसा मंजर देखा
    कहीं हो रही पार्टियां, कहीं हो रही शादियां
    कुछ लोग ठाठ से जीते ,कुछ बच्चे होते दिखे गाड़ियां
    भूखे प्यासे बच्चों को रोटी के लिए तरसते देखा
    यह आंखों देखी सच्चाई ,नहीं कोई रूपरेखा
    जिस बेटे की खातिर मन्नत मांगी खुद को दर-दर भटकाया
    बेटे के लिए ही सपने संजोए
    खूब पढ़ा लिखा उसे अफसर बनाया
    उस बेटे ने मां बाप की कदर करी नहीं
    मां-बाप को वृद्धाश्रम भेजते देखा
    यह आंखों देखी सच्चाई ,नहीं कोई रूपरेखा

  • समाज की वास्तविक‌ रूप रेखा(भाग_२))

    घर की दहलीज जब लाघीं तो ऐसा मंजर देखा
    पानी जब बिकना शुरू हुआ
    तब हमे ये मजाक लगा
    बीस रूपये लीटर पानी की बोतल
    पानी का भी अकाल पड़ा
    ऑक्सीजन की जब कमी हुई
    हवा को भी बिकते देखा
    यहां आंखों देखी सच्चाई,नहीं कोई रूपरेखा
    अमेजॉन पर शॉपिंग कर रहे
    मॉल में जाकर खरीदारी कर रहे
    हजारों लाखों की खरीदारी करते
    फिक्स रेट पर पेमेंट करते
    ठेले पर सब्जी फल वालों से
    दो़़दो पॉच रुपए का मोल भाव करते देखा।
    उन गरीब ठेले वालों पर लोगो का रौब

  • समाज की वास्तविक रूप रेखा(भाग_१)

    घर की दहलीज जब लाघीं ‌तो ऐसा मंजर देखा‌
    यह आंखों देखी सच्चाई ,नहीं कोई रूपरेखा
    मैं पहले बताती हूं परिवहन का किस्सा
    क्योंकि मैं भी शामिल थी इसमें बन हिस्सा
    खुद को महामारी से बचाने को
    कुछ लोगों ने था कपड़ा लिपटा
    कुछ लोगों ने मास्क लगाया था
    कुछ को स्टाइल में जाते देखा
    यह आंखों देखी सच्चाई ,नहीं कोई रूपरेखा
    कहने को बहुत सी गौशाला है
    गायों को सरकारों ने यूं पाला है
    गायें तो सड़कों पर अनगिनत भटक रही
    लगता गौशाला में भी लगा सिर्फ ताला है
    गायें भूखी प्यासी गाड़ियों और रेलगाड़ियों से टकराती

  • आखिर मैं भी तो जग का हिस्सा हूं

    कोई मेरी व्यथा क्यों समझता नहीं,
    मैं भी प्यासा हूं,मेरे लिए कोई पानी रखता नहीं।
    बढ़ रही उमस इतनी,और धूप कितनी तेज है,
    पानी के लिए मैं तरसता,इसका मुझको खेद है,
    सब जानते हैं बिन पानी जीवित कोई बचता नहीं,
    मैं भी प्यासा हूं मेरे लिए कोई पानी क्यूं रखता नहीं,
    पानी व्यर्थ बहाते सब मेरे लिए पानी नहीं,
    सदियों से चला आ रहा,यह कोई नई कहानी नहीं,
    उड़ता रहता हूं गगन में ,पर पानी मुझे दिखता नहीं,
    मैं भी प्यासा हूं मेरे लिए कोई पानी क्यों रखता नहीं।
    मैं कोई और नहीं मैं हूं चिड़िया पक्षी खग हूं,
    जब तक सांसे मेरी तब तक मैं हूं,
    मैं भी तो इस जग का हिस्सा,
    मानवता के नाते क्या आप से कोई रिश्ता नहीं,
    मैं भी प्यासा हूं मेरे लिए कोई पानी रखता नहीं।
    दिन भर उड़ता फिरता मै रहता हूं,
    कभी इस डाल पर कभी उस डाल विचरण करता हूं,
    थक हार जब आप की छतों पर आता,
    थोड़ा सा पानी चाहिए, चाहिए पूरा मटका नहीं,
    मैं भी प्यासा हूं मेरे लिए कोई पानी रखता नहीं।
    आप सब से मेरा विनम्र निवेदन,
    मेरा आग्रह पहुंचाओ जन- जन,
    अपनी-अपनी छतों पर मेरे लिए पानी रखो,
    जिसकी मुझे आवश्यकता बड़ी,
    पानी मिलेगा मुझे भी प्यास मेरी भी मिटेगी,और तृप्त हो जाऊंगा वहीं,
    मैं भी प्यासा हूं मेरे लिए कोई पानी रखता नहीं।

  • जीवन के लिए आवश्यक (जागरूकता)

    आओ कथा सुनाएं तुम्हें पारिस्थितिकी पारितंत्र की,
    खतरे में आज है स्थिति अपने मानव तंत्र की।
    दिन-रात खनन हो रहा है चहुंओर हरियाली का,
    आधुनिक मशीनें बन गई कारण जीवन की खुशहाली का,
    है आवश्यकता फिर से पृथ्वी को हरा-भरा करने के इस मंत्र की,
    खतरे में आज है स्थिति अपने मानव तंत्र की।
    क्यों फैल रही हैं बीमारियां क्या कभी किसी ने सोचा है,
    हम ही कारण बने हैं इसके जो पृथ्वी मां के आंचल को यूं नोचा है,
    करो खुलासा इन सबका मत चलो कोई चालें षड्यंत्र की,
    खतरे में आज है स्थिति अपने मानव तंत्र की।
    चारों तरफ लाशों के ढेर लगे हर आंख से बहता पानी है,
    है जीवन की कड़वी सच्चाई मत मानो इसे सिर्फएक कहानी है,
    कोई रोग होने ना पाए अब कोई रोने ना पाए,करो व्यवस्था ऐसे यंत्र की,
    खतरे में आज है स्थिति अपने मानव तंत्र की।
    लाखों लोग इन दिनों कर रहे अपने जीवन से संघर्ष,
    घर परिवार के भी लोग ना करते एक दूजे को स्पर्श,
    दो गज दूरी मास्क जरूरी यह सोच होनी चाहिए खुद व्यक्ति स्वतंत्र की,
    खतरे में आज है स्थिति अपने मानव तंत्र की।
    क्या हुआ जो जिस वातावरण में अब तक जीते आए वह हवा भी अब जहरीली हुई,
    कहीं इसका कारण हम सब ही हैं जो क्षीण अब हरियाली हुई,
    करो ऐसी व्यवस्था आज अपने पारिस्थितिकी पारितंत्र की,
    हो जिससे सुरक्षा अपने मानव तंत्र की।।

  • राम नवमी

    आज है राम जन्म करो सब मिल जय- जय कार,
    फैली विश्व में महामारी को मिटाने के लिए,फिर ले लो प्रभु अवतार।
    त्राहि त्राहि कर रहा है जग यह,
    चहुंओर मची चीत्कार,
    आकर संभालो प्रभु जी अब तुम, बिखर रहा परिवार।
    हे प्रभु जी ले लो अब अवतार।।
    आज की नई तरक्की कर मानव खुद को समझ बैठा भगवान,
    आई विपदा सिर पर जब यह,कर रहा तेरा गुणगान,
    मेरे तारणहारे प्रभु जी अब आप बचाओ संसार,
    प्रभु जी ले लो अब अवतार।।

  • पृथ्वी दिवस

    कहने को हम भी कहते हैं धरा को धरती माता,
    है कितनी पीड़ा धरती मां को,यह कोई क्यों ना समझ पाता।
    करते हम अपने कृत्यों से,धरती मां को यूं गंदा
    पर्यावरण को दूषित करने में ,ना घबराता कोई बंदा
    जीव जंतुओं की निर्मम हत्या कर ,फैलाते हैं गोरखधंधा
    पूजते हम इन दानवों को और देते अपना कंधा
    इन काले गोरखधंधो से धरती मां का सीना छलनी हो जाता।
    है कितनी पीड़ा धरती मां को यह कोई क्यों ना समझ पाता।।
    पहले कुंओ, बावड़ियों से हम सीमित पानी लेते थे
    और आज के नए फैशन में कितना पानी यूं व्यर्थ बहा देते हैं,
    हे लगे हुए घरों में

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