बेटी

आज पिघली-पिघली है
देखो
पथ्थर की दीवार
बन्धु,सखा,माँ-बाप
सभी छूट रहे हैं
विडम्बना देखो समय की
कुछ बिछड़ रहे तो
कुछ रिश्ते जुड़ रहे हैं
जिस आँगन में खेली- कूदी
वही छोड़ कर जाती है
बेटी ही है जो सारे
कुल की लाज़ बचाती है
बेटों को फिर भी सब अपने
कुल का दीपक कहते हैं
जबकि वंश को सबके
एक बहू ही आगे
बढ़ाती है
सारे घर की दीवारें
रोती हैं बिलखती हैं
जिसने दहलीज़
कभी ना लांघी
आज घर को छोड़े जाती है
बेटी है प्राणों से प्यारी
सब परिजन बिलख-बिलख
कर रोते हैं
माँ-बाप का हाल ना पूँछो
कैसे खुद को समझाते हैं
भाई विदा कर अपनी
लाडली को
सुबक-सुबक कर रोते हैं

Comments

7 responses to “बेटी”

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  2. बहुत सुन्दर

  3. बहुत सुंदर पंक्तियां

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