रहने को बहुत बड़ा है लेकिन रहने में क्यों डर लगता है एक अपने ही घर में क्यों बोलो, तुमको सब कुछ खलता है। कहने को तो सब चलता है सूरज रोज निकलता है एक […]

रहने को बहुत बड़ा है लेकिन रहने में क्यों डर लगता है अपने ही घर में क्यों बेटी भला तेरा ये मन खलता है। कहने को तो सब चलता है सूरज रोज निकलता है एक […]

बीती रात कमल दल फूले, हम उनके सपनों में फूले, उनकी रंग भरी बातों में, हम भूली बिसरी यादें भूले, आँख खुली तब हमने देखा, हम भ्रम की बाहों में झूला झूले, वो बन्द कली […]

जंग लड़ी थी गहरे जख्म पुराने थे, रंग लगे थे चेहरे पे गरम छुड़ाने थे, घाव लगे थे दिल पर सब बेमाने थे, महबूबा के प्रेम में चरम दीवाने थे, धुंधले थे पर चेहरे सब […]

धरती बिछा कर आस्मां ओढ़ कर सो जाते हैं, ये गरीब हैं अपना रस्ता छोड़ कर सो जाते हैं, मिलती नहीं जो रौशनी की किरण उनसे आके, जलाके माचिस की तीली मोड़ कर सो जाते […]

है कौन जो तुम्हारी यहां फिकर कर रहा है, हर लम्हा जो एक तुम्हारा जिकर कर रहा है, हर एक कश के साथ जो जला रही है जिगर, वो सिगरट तुम्हारे सफर को बेअसर कर […]

कमरा तो कोई दिखता नहीं इस दिल में मगर, हम फिर भी मेहमाँ कई इसमें बिठाये फिरते हैं, क्यों देखने पर भी कुछ नज़र नहीं आता हमको, आढ़ धर्म की लेकर हम खुदको छिपाये फिरते […]

राज़ ए दिल को दिल में छुपाने से क्या फायदा, बात दिल की दिल में ही दबाने से क्या फायदा, मोहब्बत की राहों में यूँ भटकने से क्या फायदा, लिखा पत्र भेजा नहीं उसे गुमाने […]

रौशन आज मिलकर सब अपने घर कर लेंगे, और मासूम परिंदे अपने भीतर पर कर लेंगे, पूरा आसमां जगमगाऐगा बिना तारों के ऐसे, के सितारे ज़मी को मानो अपने सर कर लेंगे, कोना – कोना […]

जिंदगी एक पहेली है तो सुलझाओ न तुम, मैं पहले ही उलझा हूँ और न उलझाओ तुम, हर कदम पर जानता हूँ अनसुलझे सवाल हैं, कोई तो हल होगा न हमें बतलाओ न तुम, अरे […]

अब लोगों में वो पहले जैसी बात कहाँ है, दिल है पर वो पहले जैसे जज़्बात कहाँ है, आखिर है कौन यहाँ जो गुनेहगार नहीं है, सच में सच वो पहले जैसे पहरेदार कहाँ है, […]

आखिर कौन किसको देखने छत पर आया करता है, चाँद इस ज़मीं पे या उस आसमान पे छाया करता है, इंतज़ार कौन और किसका बड़ी बेसबरी से करता है, पहले अंधेरा या रौशनी कौन किसको […]

के तेरे दर पे मैं खुल कर के सब कुछ अर्ज़ करता हूँ, तुझको पाने की खातिर मैं खुद को यूँ खर्च करता हूँ, गर तू समझे मेरी खामोशी तो मुझे अच्छा लगता है, जो […]

दिल और दिमाग के बीच सन्तुलन बैठाना मुश्किल था, पहली बार देखा था उसे अमलन छुपाना मुश्किल था, अकेले ही काटी थी यूँही राहों पर उम्र भर जो जिंदगी, मिला जो उनसे तो ठहरी अंजुमन […]

आसुओं के पानी से जितना धुलता जाता हूँ मैं, लोग जितना रुलाते हैं उतना खुलता जाता हूँ मैं, देखने में सबको बेशक बड़ा नज़र आता हूँ मैं, सच ये के हर पल बचपन में मुड़ता […]

कौन कह रहा है समन्दर में राज़ नहीं होते, ज़मी पर रहने वालों के सर ताज नहीं होते, पहन लेते हैं आज वो जो जैसा मिल जाये, ये सच है उनकी कमीज़ में काज़ नहीं […]

मैंने सोंचा न था के वो इस कदर बदल जायेगा, पानी पर लिखा हुआ उसका नाम जल जायेगा, मैं बनाता ही रह जाऊंगा तरह – तरह के ढाँचे, और वो मासूम यूँ वक्त के सांचे […]

तुमको सुलाने की खातर कितनी रात मेरी काली रही, मुझे ठीक से याद नहीं के देखकर तुम्हें बेखयाली रही, बातें करती रहीं तुम मुझसे यूँही सपनों की दुनियां में, सुबह जब तुमने मुझे देखा आँखें […]

मुझको यूँ कुचलने पर तुम्हें वो समन्दर नहीं मिलेगा, तुम्हारी आँखों को जो चाहोगे वो मंज़र नहीं मिलेगा, बड़ी बेरहमी से मुझे रास्तों पर छोड़कर जाने वालों, तुम्हें ढूंढने से भी इस जहां में कोई […]

गुनाह तो कोई ज़रूर बहुत ही बड़ा कर रहा हूँ मैं, सबकी नज़रों से होकर पल- पल गुज़र रहा हूँ मैं, रास्ते ठहरे हैं मगर जाने क्यों चलते नज़र आते हैं, जिस पल से ज़िन्दगी […]

जलाकर रख दिए ख़त मगर यादों को अग्नि दगा दे गई, मुट्ठी में दबाकर रखी थी मगर खुशबू को हवा उड़ा ले गई, बेबाक यूँही नशे में गुज़र रही थी लडखड़ाती हुई ज़िन्दगी, आई एक […]

जिनको देनी हैं वो हमको दुआयें देंगे, बेवफाई के बदले भी हमको वफायें देंगे, हम गुनाह कुबूल कर बैठेंगे उनके आगे, पर वो जब भी देंगे हमको सजायें देंगे, घुप्प अँधेरे में दूर तक नहीं […]

न चाह कर भी बहुत कुछ कह जाना पड़ता है, हो रूठना तो पहले किसी को मनाना पड़ता है, मुस्कुराते सबको नज़र आते हैं क्या कहें वो, जिन फूलों को काँटों संग रह जाना पड़ता […]

जिनके एक आवाहन पर सबने अपने हाथ उठाये थे, कदम-कदम पर अंग्रेजी शासन के छक्के साथ छुड़ाए थे, जिनके कहने पर अस्त्र वस्त्र सब मिलकर साथ जलाये थे, सत्य-अहिंसा के अचूक तब शस्त्र सशक्त उठाये […]

गलतियाँ बहुत कर लीं चलो एक दो सुधारी जाएँ, रस्मों रिवाजों की चादर सर से पूरी उतारी जाएँ, जाये कहाँ, अब है कौन हमारा इस नए ज़माने में, चलो यादें पुरानी उकेर कर रखी थीं […]

अपने दिल को दिमाग से लड़ाना ज़रूरी था, उसने बुलाया था उसके पास जाना जरूरी था, रौशनदान बहुत थे चाहरदिवारी में पर फिरभी, मुझको अंधरे से भी तो काम कराना ज़रूरी था, थक हार कर […]

भीड़ बहुत है भागदौड़ भी बहुत इस ज़माने में, बस यही वो डर है मैं उसे आप सबसे छुपाता हूँ, हर तरफ शोर मचा है सबको रौशनी से परहेज है, इसी एतराज़ के चलते मैं […]

गुनाह साबित भी न हुआ, गुनहगार कहलाया गया मैं। सीने से लगाया भी गया, फिर बार बार ठुकराया गया मैं। कई बार तोड़ा फिर जोड़ा गया, फिर जोड़ कर बनाया गया मैं। कभी जुगुनू आँखों […]

बहुत बुलाया मगर वो मेरी कही सुनी सब टाल गया, प्रेमपत्र जो पढ़े लिखे थे वो आँगन में सब डाल गया, कौन घड़ी में जाने कब आके घर में दीपक बाल गया, सूनी मन पुस्तक […]

ये जिस्म है, ये जिस्म ही न पिघल जाये कहीं, किसी चराग की शरारत से न जल जाये कहीं, मैं चमकता रहा हूँ उसीकी गर्म रौशनी से यारों, मुझको मेरा ही ये भरम न निगल […]

दिल से दिल तक अपना रस्ता बना लेती है, ये हिंदी ही हम सबको अपना बना लेती है।। हो जाए गर नाराज़गी तो मस्का लगा देती है, बातों हो बातों में साथी से रब्ता बना […]

जो बढ़ रहा है हाथ नापाक उसे तोड़ना होगा, हाथ मिलाया था जो बेशक उसे छोड़ना होगा, रच लिए बखूबी प्रपंच और चढ़ लिए ढेरों मंच, अब उतर कर जंग में इनका सर फोड़ना होगा, […]

कौन कहता है के मेरे होने से एक शहर बस्ता है, जहाँ निकल जाऊं मुझे मिलता एक बन्द रस्ता है, सांस मुझे आती नहीं या हवाओं ने रुख बदला है, महसूस करो तो ज़रा सच […]

कौन कहता है के मेरे होने से एक शहर बस्ता है, जहाँ निकल जाऊं मुझे मिलता एक बन्द रस्ता है, सांस मुझे आती नहीं या हवाओं ने रुख बदला है, महसूस करो तो ज़रा सच […]

दिल से दिल तक अपना रस्ता बना लेती है, ये हिंदी ही हम सबको अपना बना लेती है।। हो जाए गर नाराज़गी तो मस्का लगा देती है, साथी हो या मांझी सबको रस्ता बता देती […]