hum intezaar mein baithe rahe unke…
magar unki parchaayi bhi na pahuch saki mujh tak,
na ja wo raste se bhatkk gaye….
yaa mujh se humesha k liye bichad gaye….
hum intezaar mein baithe rahe unke…
magar unki parchaayi bhi na pahuch saki mujh tak,
na ja wo raste se bhatkk gaye….
yaa mujh se humesha k liye bichad gaye….
wo kehte hai,
‘Tere har dard ka mujhe ehsaas hai’…..
or hum puchte hai,
‘Aisa bhi isme kya khaas hai’…
kya dil humare,
sach mein itne paas hai!!!…..
haar k baad, jeet aati hai…
or raat k baad, subh ho jaati hai…
jab khyaal aata hai tumse bichadne ka dil mein,
to shaayad kisi ki jaan nikal jaati hai…
isi tarah!
zindgi k baad, fir maut aa jaati hai…
zindgi junoon hai,
dil mein ek sukoon hai…
manzil bhot door hai,
magar rasta haseen hai…
chalo ab ise bhi aazma lete hai,
kismat ka mazaa thoda chakh lete hai…
kyonki kal kisne dekha hai…
abhi to fir bhi zinda hai…
उन्नति को लगी रहे आप से मिलने की लगन ….
इस नववर्ष , आपके यहाँ हो खुशियों का आगमन ….
सिलसिलेवार रहे चेहरे पर रौनक – ए – मुस्कराहट …..
रब की रहमत से सदा महकता रहे आपका घर आँगन….
पंकजोम ” प्रेम “
ღღ__दूर आप जा रहे हो ‘साहब’, या फिर ये दिसम्बर;
.
कोई भी दूर जाये हमसे, ये देखा नहीं जाता !!…….#अक्स
!!!!! SAGAR KE DIL SE !!!!!
apno ne hi loot liya yarro
shikayat karte bhi tau kis se
apno ne hi zakham diye yaaro
marham lagwate bhi tau kis se
chor kar aaye apne hi mujhe
masaan tak
gila aur shikwa karte bhi tau kis se
@@ SAGAR @@
21/12/15 :: 11:30 PM…. (642) … ©
!!!!! SAGAR KE DIL SE !!!!
bahut koshish karta hun
khushion ko paas bulane ki
par shayad gammo ka
pehra kuch jayada hi sakht hai
@@ SAGAR @@
30/12/15 :: 11:22 AM …. (___) …. ©
tu use mandir ya masjid me mt dhund.
usne mohabbat ki h
use meykhane me dhund..
!!!! SAGAR KE DIL SE !!!!!
Koi gair phir bhi de dega sahara tujhe
apno ke bharose reh kar kahin gir na jana
@@ SAGAR @@
22/12/15 :9:19 PM
ღღ__इक उम्र गुज़ारी है आशिक़ी में, तो जाना है;
.
कुछ नहीं मिलता, इसमें इक आवारगी के सिवा !!……..#अक्स
!!!! SAGAR KI KALAM SE !!!!!
itne mash’hoor ho gaye hum
nakam jo hue mohabat main
ki hum se hamari hi dastaan
bayaan kar gaya ik ajnabi
@@ SAGAR @@
24/12/15 :: 2:00 PM
pyaar sirf ek alfaaz hai humare liye…
jiski na koi surat hai, na hi koi murat hai…
par aapke alfaazon se andaaza lgate hai,
jo bhi ho,
par shaayad pyaar bhot hi khoobsurat hai….
chal pdii hu aise ek raste pr,
jiski manzil ka na koi pta hai….
khushiyaan dene ki koshish ki maine bhot,
yahi meri sabse bdii khta hai….
meri talaash mein mat nikalna yaaron,
dhund na paoge humein….
kyunki aaj hum khud k liye bhi laapta hai….
dil-o-jaan se chahte hain hum tumhein…
hakiqut mein milna shaayad ab naseeb mein nahi…
isliye jaldi palko ka milan aankhon se kra dete hai…
kyonki khwaabon k zariye hi tumse milna,
ab pasand hain humein…
थे क़रीब इक दूजे के ….
लेकिन फिर भी दरम्यां हमारे , दुरी रह गयी ….
इबादत करते हुए , इक भी दर ना छोड़ा ख़ुदा का …
फिर भी कोई मज़बूरी रह गयी..
कह देते थे , महफ़िल – ए – यारों में ….
” वो हैं मेरी ” …
.
बस यही इक जिद्द अधूरी रह गयी …..
पंकजोम ” प्रेम “
मोहब्त का ले सहारा उन्हें पाने की सोची…..
ख़ुद ही बे – सहारा हो गए …..
जिनका अक्श कभी ओझल ना हुआ , नजरों से ….
वही आज इक धुंधला नजारा हो गए ….
जिन सागरों के किनारों पर रुक जाती थी ….
हमारी कश्ती – ए – चाहत ….
आज वहीँ सागर बे – किनारा हो गए …..
पंकजोम ” प्रेम “
क़ायनात ने क्या ख़ूब साज सजाया हैं ….
जिंदगी के बे- रंग रंगो ने क्या रंग दिखाया हैं….
ज़रा नज़रे उठा देख ए – फ़लक , मेरी और ….
मिलने मुझ से ” चाँद ” आया हैं….
पंकजोम ” प्रेम “
लफ्ज है ये या बेबस दिल है मेरा
धड़कन जिसकी किसी को सुनाई नहीं देती… अनु
महफ़िल – ए – यारोँ में , थोड़ा अलग दिखा देते हैँ …..
मुझे , मेरे अल्फ़ाज ……
फितरत बता देते हैं , मेरी ….
मेरे अल्फ़ाज …..
मैं इंसान हूँ तो जायज़ हैं , नफ़रत मैं भी कर लूँ …..
लेकिन हर मरतबा मोहब्त जता देते हैं …….
मेरे अल्फ़ाज …..
पंकजोम ” प्रेम “
तलब ऐसी उठी दिल से…..
की उन्हीं के तलबगार हो गए….
जमाने की जुबां पर ….
किस्से हमारी मुलाकातों के बार – बार हो गए….
पता कर चुके थे , हैँ उनकी तरकश में इक तीर – ए – मोहब्त …..
और उसी तीर के हम शिकार हो गए….
तलब – चाह
तलबगार -चाहने वाला
Jb mile the tumse,
to socha tumhe kbhi khone nahi deinge….
Dheere dheere Jana tumhe, fir soch Nek Ho tu….
Jb dekha guroor tumhara,
to faisla kiya tujh jaise ko kbhi jindgi me aane nhi deingee….
ღღ__कुछ इस तरह से लिक्खा है, उस ख़ुदा ने मेरा नसीब;
.
कि मैं तो सबका हो जाऊंगा “साहब”, कोई मेरा नहीं होगा !!…….#अक्स
साँसे चल रही हैँ , बिन उसके..
आने वाला , जीने में मज़ा क्या…
चाह लिया उसे , उसकी इजाज़त के बगैर …..
इसमें किया गुनाह क्या ….
मोहब्त हैं उनसे , तभी मांगती हैं निगाहें दीदार ….
वो ही आकर बताएं …
इसमें क़ुसूर – ए – निग़ाह क्या ..
पंकजोम ” प्रेम “
थोड़ा मायूस हूँ , थोड़ा तन्हा हूँ ..
कोई राह – ए – ख़ुशी बता दो….
ख़ुद की ख़ामोशी देख , ख़ामोश क़ायनात भी दिख रही हैँ …..
कोई मुस्कुराना सीखा दो ….
बे – रंग हो गयी हैं , चेहरे की रौनक ….
कोई ” वाह ” ” वाह ” करके थोड़ा और रंग जमा दो ….
पंकजोम ” प्रेम “
चुनौती ज़िन्दगी का,
कहता हैं, हूँ मैं हर मोड पर,
लेकिन हम भी कुछ कम नहीं,
इन्हीं चुनौतियों के सात जीना सीख लिया हैं,
की कभी कबार लगता हैं की इनके बिना ज़िन्दगी अधूरी हैं.
चुनौतियाँ एक नाम देती हैं ज़िन्दगी को,
एक मुकाम तक पोहोंचने के लिए सहारा बनती हैं वो,
हमारी इम्तिहान लेती हैं ऐ,
और हमें पहले से भी एक बेहतर इन्सान हैं बनाती,
चुनातियाँ देती हैं दो रास्ते,
चुनाव हमारे हात मे,
जो हमारा कल बतायेगा,
हमारी ज़िन्दगी हैं हमारी हातों में,
तो भई सुनलो हमारी बात,
कभी न भागना चुनौतियों से,
सफ़र सुहाना होता हैं चुनौतियों के साथ ….
कफ़स दिल में कुछ जज़्बात .. आबो संग बीता जाता हूँ , ” मैँ “…..
पुष्प हूँ , खिलनें के लिए बना हूँ ….
फ़िर भी ना जाने क्यों , मुरझा जाता हूँ , ” मैँ “….
ज़रा कर इक निग़ाह मेरी और , ए – मेहरबान …..
रंज में रहता हूँ , फिर भी अपनों पर ख़ुशियां लूटा जाता हूँ , ” मैं ”
पंकजोम ” प्रेम “
ज़रा इक निग़ाह डाल देखों सावन पर ” पंकजोम ” प्रेम ” ” ….
ख़ामोश अल्फ़ाज़ मेरे ,सबसे बतियाते बतियाते दिखेंगे …..
पंकजोम ” प्रेम “
उसने कहा बहुत अमीर हूँ ” मैं ” ,
दिल से….
लेकिन चाहत का इक भी टका ,
वो मुझ पर खर्च ना कर सकी..
अपनी पूरी कमाई तूने मय पर लूटा दी…..
ए – ग़ालिब….
जरा मुझे ये बता…
उस दो घूंट में , जिंदगी जीने का स्वाद कितना है….
पंकजोम ” प्रेम “
ღღ__वो तो लालच है उनके ख्वाबों का, जो हमें सुला देता है “साहब”;
.
वरना नींदें तो उनकी यादों ने, एक अरसे से उड़ा रक्खी हैं !!…….#अक्स
m kb tanha hui
“jnab”
meri to masrufiyat hi tumse h???
rojj mera katal hota h
roj m smbhal jati hu..
jiddi tum bhut ho..
jiddi km hum b nhi
कुछ ऐसा लिखूँ , की पढ़ने वाले को लगे …
मेरा एक – एक अल्फ़ाज , गहरा हैँ …
खों जाये वो मेरे अल्फाज़ो की महफ़िल में ..
लगे उसे , मानो आज वक़्त , ठहरा हैं..
यादगार हों जाये उसके लिए , मेरी हर इक सुखनवरी ….
एहसास हो , जैसे…..
रौनक के पहरे से रोशन उसका , चेहरा हैं ..
पंकजोम ” प्रेम “
दिल बेचैन हुआ , तो उसके दीदार का दिया दिलासा हैं …..
जाने वाले कल चले गए ,
लेकिन आज भी उनके लौट आने की ….
छोटी सी आशा हैं …..
अब कोई तो बने सुराही – ए – मोहब्त ….
क्योंकि ये सुख़नवर बहुत , प्यासा हैं ….
पंकजोम ” प्रेम “
वक़्त लगता हैं यहाँ , इंसान को इंसान समझने में …….
वक़्त लगता हैं यहाँ , पत्थर को भगवान समझने में ……
आधी उम्र बीत जाती हैँ सोचने सोचने में ..
क्योंकि वक़्त लगता हैं यहाँ , जीने के अरमान समझने में …..
पंकजोम ” प्रेम “
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