हथेली से रेत की तरह पल पल सरकती जिंदगी,
फिर भी जाने क्यों आग की तरह भड़कती जिंदगी।
मुकाम मौत ही तो है इसका,
लाख पहरा दो उसी ओर बढ़ती जिंदगी।
पर खुद को सदा के लिए मान,
कुछ जिंदगी को रौंदती जिंदगी।
ये दुनिया तो बस तमाशा है,
जहां कभी बंदर कभी मदारी बनती जिंदगी।
Ghazal
Comments
16 responses to “Ghazal”
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बहुत खूब
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धन्यवाद
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वाह बहुत सुंदर
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धन्यवाद
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धन्यवाद
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सुंदर रचना
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Thank you sir
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Dsunder
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Thank you
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Very nice
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Thank you di
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Wah
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धन्यवाद
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Iajabab
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Thank you di
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🤔🤔
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