दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:21

September 12, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

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किसी व्यक्ति के चित्त में जब हीनता की भावना आती है तब उसका मन उसके द्वारा किये गए उत्तम कार्यों को याद दिलाकर उसमें वीरता की पुनर्स्थापना करने की कोशिश करता है। कुछ इसी तरह की स्थिति में कृपाचार्य पड़े हुए थे। तब उनको युद्ध स्वयं द्वारा किया गया वो पराक्रम याद आने लगा जब उन्होंने अकेले हीं पांडव महारथियों भीम , युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव, द्रुपद, शिखंडी, धृष्टद्युम आदि से भिड़कर उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया था। इस तरह का पराक्रम प्रदर्शित करने के बाद भी वो अस्वत्थामा की तरह दुर्योधन का विश्वास जीत नहीं पाए थे। उनकी समझ में नहीं आ रहा था आखिर किस तरह का पराक्रम दुर्योधन के विश्वास को जीतने के लिए चाहिए था? प्रस्तुत है दीर्घ कविता “दुर्योधन कब मिट पाया” का इक्कीसवां भाग।
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शत्रुदल के जीवन हरते जब निजबाहु खडग विशाल,
तब जाके कहीं किसी वीर के उन्नत होते गर्वित भाल।
निज मुख निज प्रशंसा करना है वीरों का काम नहीं,
कर्म मुख्य परिचय योद्धा का उससे होता नाम कहीं।
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मैं भी तो निज को उस कोटि का हीं योद्धा कहता हूँ,
निज शस्त्रों को अरि रक्त से अक्सर धोता रहता हूँ।
खुद के रचे पराक्रम पर तब निश्चित संशय होता है,
जब अपना पुरुषार्थ उपेक्षित संचय अपक्षय होता है।
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विस्मृत हुआ दुर्योधन को हों भीमसेन या युधिष्ठिर,
किसको घायल ना करते मेरे विष वामन करते तीर।
भीमसेन के ध्वजा चाप का फलित हुआ था अवखंडन ,
अपने सत्तर वाणों से किया अति दर्प का परिखंडन।
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लुप्त हुआ स्मृति पटल से कब चाप की वो टंकार,
धृष्टद्युम्न को दंडित करते मेरे तरकश के प्रहार।
द्रुपद घटोत्कच शिखंडी ना जीत सके समरांगण में,
पांडव सैनिक कोष्ठबद्ध आ टूट पड़े रण प्रांगण में।
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पर शत्रु को सबक सिखाता एक अकेला जो योद्धा,
प्रतिरोध का मतलब क्या उनको बतलाता प्रतिरोद्धा।
हरि कृष्ण का वचन मान जब धारित करता दुर्लेखा,
दुख तो अतिशय होता हीं जब रह जाता वो अनदेखा।
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अति पीड़ा मन में होती ना कुरु कुंवर को याद रहा,
सबके मरने पर जिंदा कृतवर्मा भी ना ज्ञात रहा।
क्या ऐसा भी पौरुष कतिपय नाकाफी दुर्योधन को?
एक कृतवर्मा का भीड़ जाना नाकाफी दुर्योधन को?
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अजय अमिताभ सुमन :
सर्वाधिकार सुरक्षित

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:20

September 5, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

कृपाचार्य और कृतवर्मा के जीवित रहते हुए भी ,जब उन दोनों की उपेक्षा करके दुर्योधन ने अश्वत्थामा को सेनापतित्व का भार सौंपा , तब कृतवर्मा को लगा था कि कुरु कुंवर दुर्योधन उन दोनों का अपमान कर रहे हैं। फिर कृतवर्मा मानवोचित स्वभाव का प्रदर्शन करते हुए अपने चित्त में उठते हुए द्वंद्वात्मक तरंगों को दबाने के लिए विपरीत भाव का परिलक्षण करने लगते हैं। प्रस्तुत है दीर्घ कविता “दुर्योधन कब मिट पाया” का बीसवां भाग।

क्षोभ युक्त बोले कृत वर्मा नासमझी थी बात भला ,
प्रश्न उठे थे क्या दुर्योधन मुझसे थे से अज्ञात भला?
नाहक हीं मैंने माना दुर्योधन ने परिहास किया,
मुझे उपेक्षित करके अश्वत्थामा पे विश्वास किया?

सोच सोच के मन में संशय संचय हो कर आते थे,
दुर्योधन के प्रति निष्ठा में रंध्र क्षय कर जाते थे।
कभी मित्र अश्वत्थामा के प्रति प्रतिलक्षित द्वेष भाव,
कभी रोष चित्त में व्यापे कभी निज सम्मान अभाव।

सत्यभाष पे जब भी मानव देता रहता अतुलित जोर,
समझो मिथ्या हुई है हावी और हुआ है सच कमजोर।
अपरभाव प्रगाढ़ित चित्त पर जग लक्षित अनन्य भाव,
निजप्रवृत्ति का अनुचर बनता स्वामी है मानव स्वभाव।

और पुरुष के अंतर मन की जो करनी हो पहचान,
कर ज्ञापित उस नर कर्णों में कोई शक्ति महान।
संशय में हो प्राण मनुज के भयाकान्त हो वो अतिशय,
छद्म बल साहस का अक्सर देने लगता नर परिचय।

उर में नर के गर स्थापित गहन वेदना गूढ़ व्यथा,
होठ प्रदर्शित करने लगते मिथ्या मुस्कानों की गाथा।
मैं भी तो एक मानव हीं था मृत्य लोक वासी व्यवहार,
शंकित होता था मन मेरा जग लक्षित विपरीतअचार।

मुदित भाव का ज्ञान नहीं जो बेहतर था पद पाता था,
किंतु हीन चित्त मैं लेकर हीं अगन द्वेष फल पाता था।
किस भाँति भी मैं कर पाता अश्वत्थामा को स्वीकार,
अंतर में तो द्वंद्व फल रहे आंदोलित हो रहे विकार?

अजय अमिताभ सुमन : सर्वाधिकार सुरक्षित

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:19

August 30, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

कृपाचार्य दुर्योधन को बताते है कि हमारे पास दो विकल्प थे, या तो महाकाल से डरकर भाग जाते या उनसे लड़कर मृत्युवर के अधिकारी होते। कृपाचार्य अश्वत्थामा के मामा थे और उसके दु:साहसी प्रवृत्ति को बचपन से हीं जानते थे। अश्वत्थामा द्वारा पुरुषार्थ का मार्ग चुनना उसके दु:साहसी प्रवृत्ति के अनुकूल था, जो कि उसके सेनापतित्व को चरितार्थ हीं करता था। प्रस्तुत है दीर्घ कविता दुर्योधन कब मिट पाया का उन्नीसवां भाग।
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विकट विघ्न जब भी आता ,
या तो संबल आ जाता है ,
या जो सुप्त रहा मानव में ,
ओज प्रबल हो आता है।
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भयाक्रांत संतप्त धूमिल ,
होने लगते मानव के स्वर ,
या थर्र थर्र थर्र कम्पित होते ,
डग कुछ ऐसे होते नर ।
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विकट विघ्न अनुताप जला हो ,
क्षुधाग्नि संताप फला हो ,
अति दरिद्रता का जो मारा ,
कितने हीं आवेग सहा हो ।
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जिसकी माता श्वेत रंग के ,
आंटे में भर देती पानी,
दूध समझकर जो पी जाता ,
कैसी करता था नादानी ।
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गुरु द्रोण का पुत्र वही ,
जिसका जीवन बिता कुछ ऐसे ,
दुर्दिन से भिड़कर रहना हीं ,
जीवन यापन लगता जैसे।
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पिता द्रोण और द्रुपद मित्र के ,
देख देखकर जीवन गाथा,
अश्वत्थामा जान गया था ,
कैसी कमती जीवन व्यथा।
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यही जानकर सुदर्शन हर ,
लेगा ये अपलक्षण रखता ,
सक्षम न था तन उसका ,
पर मन में आकर्षण रखता ।
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गुरु द्रोण का पुत्र वोही क्या ,
विघ्न बाधा से डर जाता ,
दुर्योधन वो मित्र तुम्हारा ,
क्या भय से फिर भर जाता ?
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थोड़े रूककर कृपाचार्य फिर ,
हौले दुर्योधन से बोले ,
अश्वत्थामा के नयनों में ,
दहक रहे अग्नि के शोले ।
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घोर विघ्न को किंचित हीं ,
पुरुषार्थ हेतु अवसर माने ,
अश्वत्थामा द्रोण  पुत्र ,
ले चला शरासन तत्तपर ताने।
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अजय अमिताभ सुमन:
सर्वाधिकार सुरक्षित

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग:18

August 23, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

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इस दीर्घ कविता के पिछले भाग अर्थात् सोलहवें भाग में दिखाया गया जब कृपाचार्य , कृतवर्मा और अश्वत्थामा ने देखा कि पांडव पक्ष के योद्धाओं की रक्षा कोई और नहीं , अपितु कालों के काल साक्षात् महाकाल कर रहे हैं तब उनके मन में दुर्योधन को दिए गए अपने वचन के अपूर्ण रह जाने की आशंका होने लगी। कविता के वर्तमान भाग अर्थात अठारहवें भाग में देखिए इन विषम परिस्थितियों में भी अश्वत्थामा ने हार नहीं मानी और निरूत्साहित पड़े कृपाचार्य और कृतवर्मा को प्रोत्साहित करने का हर संभव प्रयास किया। प्रस्तुत है दीर्घ कविता दुर्योधन कब मिट पाया का अठारहवाँ भाग।
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अगर धर्म के अर्थ करें तो बात समझ ये आती है,
फिर मन के अंतरतम में कोई दुविधा रह ना पाती है।
भान हमें ना लक्ष्य हमारे कोई पुण्य विधायक ध्येय,
पर अधर्म की राह नहीं हम भी ना मन में है संदेह।
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बात सत्य है अटल तथ्य ये बाधा अतिशय भीषण है ,
दर्प होता योद्धा को जिस बल का पर एक परीक्षण है ।
यही समय है हे कृतवर्मा निज भुज बल के चित्रण का,
कैसी शिक्षा मिली हुई क्या असर हुआ है शिक्षण का।
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लक्ष्य समक्ष हो विकट विध्न तो झुक जाते हैं नर अक्सर,
है स्वयं सिद्ध करने को योद्धा चूको ना स्वर्णिम अवसर।
आजीवन जो भुज बल का जिह्वा से मात्र पदर्शन करते,
उचित सर्वथा भू अम्बर भी कुछ तो इनका दर्शन करते।
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भय करने का समय नहीं ना विकट विघ्न गुणगान का,
आज अपेक्षित योद्धा तुझसे कठिन लक्ष्य संधान का।
वचन दिया था जो हमने क्या महा देव से डर जाए?
रुद्रपति अवरोध बने हो तो क्या डर कर मर जाए?
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महाकाल के अति सुलभ दर्शन नर को ना ऐसे होते ,
जन्मों की हो अटल तपस्या तब जाकर अवसर मिलते।
डर कर मरने से श्रेयकर है टिक पाए हम इक क्षण को,
दाग नहीं लग पायेगा ना प्रति बद्ध थे निज प्रण को।
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जो भी वचन दिया मित्र को आमरण प्रयास किया,
लोग नहीं कह पाएंगे खुद पे नाहक विश्वास किया।
और शिव के हाथों मरकर भी क्या हम मर पाएंगे?
महाकाल के हाथों मर अमरत्व पूण्य वर पाएंगे।
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अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-17

August 14, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

इस दीर्घ कविता के पिछले भाग अर्थात् सोलहवें  भाग में दिखाया गया जब कृपाचार्य , कृतवर्मा और अश्वत्थामा पांडव पक्ष के बाकी  बचे हुए जीवित योद्धाओं का संहार करने का प्रण लेकर पांडवों के शिविर के पास पहुँचे तो वहाँ उन्हें एक विकराल पुरुष पांडव पक्ष के योद्धाओं की रक्षा करते हुए दिखाई पड़ा। उस महाकाल सदृश पुरुष की उपस्थिति मात्र हीं कृपाचार्य , कृतवर्मा और अश्वत्थामा के मन में भय का संचार उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त थी ।कविता के वर्तमान भाग अर्थात् सत्रहवें भाग में देखिए थोड़ी देर में उन तीनों योद्धाओं  को ये समझ आ गया कि पांडव पक्ष के योद्धाओं की रक्षा कोई और नहीं , अपितु कालों के काल साक्षात् महाकाल कर रहे थे । यह देखकर कृपाचार्य , कृतवर्मा और अश्वत्थामा के मन में दुर्योधन को दिए गए अपने वचन के अपूर्ण रह जाने के भाव मंडराने लगते हैं। परन्तु अश्वत्थामा न केवल स्वयं के डर पर विजय प्राप्त करता है अपितु सेंपतित्व के भार का बखूबी संवाहन करते हुए अपने मित्र कृपाचार्य और कृतवर्मा को प्रोत्साहित भी करता है। प्रस्तुत है दीर्घ कविता “दुर्योधन कब मिट पाया ” का सत्रहवाँ भाग।
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वक्त  लगा था अल्प बुद्धि  के कुछ तो जागृत होने में,
महादेव से  महा काल  से  कुछ  तो  परीचित होने में।
सोंच पड़े  थे  हम  सारे  उस  प्रण का रक्षण कैसे  हो ?
आन पड़ी थी विकट विघ्न उसका उपप्रेक्षण कैसे हो?
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मन में  शंका के बादल सब उमड़ घुमड़ के आते थे ,
साहस जो भी बचा हुआ था सब के सब खो जाते थे।
जिनके  रक्षक महादेव  रण में फिर  भंजन हो कैसे?
जयलक्ष्मी की नयनों का आखिर अभिरंजन हो कैसे?
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वचन दिए थे जो मित्र को निर्वाहन हो पाएगा क्या?
कृतवर्मा  अब तुम्हीं कहो हमसे ये हो पाएगा क्या?
किस बल से महा शिव  से लड़ने का  साहस लाएँ?
वचन दिया जो दुर्योधन को संरक्षण हम कर पाएं?
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मन  जो  भी  भाव निराशा के क्षण किंचित आये थे ,
कृतवर्मा  भी हुए निरुत्तर शिव संकट बन आये  थे।
अश्वत्थामा  हम  दोनों  से  युद्ध  मंत्रणा  करता  था ,
उस क्षण जैसे भी संभव था हममें साहस भरता था ।
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बोला  देखों  पर्वत  आये  तो चींटी  करती है क्या ?
छोटे छोटे  पग उसके पर वो पर्वत से डरती  क्या ?
जो  संभव  हो  सकता उससे वो पुरुषार्थ रचाती है ,
छोटे हीं  पग उसके  पर पर्वत मर्दन कर जाती है।
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अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-16

August 9, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

इस दीर्घ कविता के पिछले भाग अर्थात् पन्द्रहवें भाग में दिखाया गया जब अर्जुन के शिष्य सात्यकि और भूरिश्रवा के बीच युद्ध चल रहा था और युद्ध में भूरिश्रवा सात्यकि पर भारी पड़ रहा था तब अपने शिष्य सात्यकि की जान बचाने के लिए अर्जुन ने बिना कोई चेतावनी दिए युद्ध के नियमों की अवहेलना करते हुए अपने तीक्ष्ण वाणों से भूरिश्रवा के हाथ को काट डाला। कविता के वर्तमान भाग अर्थात् सोलहवें भाग में देखिए जब कृपाचार्य , कृतवर्मा और अश्वत्थामा पांडव पक्ष के सारे बचे हुए योद्धाओं का संहार करने हेतु पांडवों के शिविर के पास पहुँचे तो वहाँ उन्हें एक विकराल पुरुष उन योद्धाओं की रक्षा करते हुए दिखाई पड़ा। उस विकराल पुरुष की आखों से अग्नि समान ज्योति निकल रही थी। वो विकराल पुरुष कृपाचार्य , कृतवर्मा और अश्वत्थामा के लक्ष्य के बीच एक भीषण बाधा के रूप में उपस्थित हुआ था, जिसका समाधान उन्हें निकालना हीं था । प्रस्तुत है दीर्घ कविता “दुर्योधन कब मिट पाया ” का सोलहवाँ भाग।

हे  मित्र  पूर्ण करने को तेरे  मन की अंतिम  अभिलाषा,
हमसे कुछ  पुरुषार्थ फलित हो  ले उर  में ऐसी  आशा।
यही  सोच  चले थे  कृपाचार्य  कृतवर्मा पथ पे मेरे संग,
किसी विधी डाल सके अरिदल के रागरंग में थोड़े भंग।

जय के मद में पागल पांडव कुछ तो उनको भान कराएँ,
जो कुछ बित रहा था हमपे थोड़ा उनको ज्ञान कराएँ ?
ऐसा हमसे कृत्य रचित हो लिख पाएं कुछ ऐसी गाथा,
मित्र तुम्हारी मृत्यु लोक में कुछ तो कम हो पाए व्यथा।

मन में ऐसा भाव लिए था कठिन लक्ष्य पर वरने को ,
थे दृढ प्रतिज्ञ हम तीनों चलते प्रति पक्ष को हरने को।
जब पहुंचे खेमे अरिदल योद्धा रात्रि पक्ष में सोते थे ,
पर इससे दुर्भाग्य लिखे जो हमपे कम ना होते थे।

प्रतिपक्ष शिविर के आगे काल दीप्त एक दिखता था,
मानव जैसा ना दिखता यमलोक निवासी दिखता था।
भस्म लगा था पूरे तन पे सर्प नाग की पहने माला ,
चन्द्र सुशोभित सर पर जिसके नेत्रों में अग्निज्वाला।

कमर रक्त से सना हुआ था व्याघ्र चर्म से लिपटा तन,
रुद्राक्ष हथेली हाथों में आयुध नानादि तरकश घन।
निकले पैरों से अंगारे थे दिव्य पुरुष के अग्नि भाल,
हेदेव कौन रक्षण करता था प्रतिपक्ष का वो कराल?

कौन आग सा जलता था ये देख भाव मन फलता था,
गर पांडव रक्षित उस नर से ध्येय असंभव दिखता था।
प्रतिलक्षित था चित्तमें मनमें शंका भाव था दृष्टित भय,
कभी आँकते निजबल को और कभी विकराल अभय।

अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित

दुर्योधन कब मिट पाया-15

August 1, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

इस दीर्घ कविता के पिछले भाग अर्थात् चौदहवें भाग में दिखाया गया कि प्रतिशोध की भावना से ग्रस्त होकर अर्जुन द्वारा जयद्रथ का वध इस तरह से किया गया कि उसका सर धड़ से अलग होकर उसके तपस्वी पिता की गोद में गिरा और उसके तपस्या में लीन पिता का सर टुकड़ों में विभक्त हो गया कविता के वर्तमान प्रकरण अर्थात् पन्द्रहवें भाग में देखिए महाभारत युद्ध नियमानुसार अगर दो योद्धा आपस में लड़ रहे हो तो कोई तीसरा योद्धा हस्तक्षेप नहीं कर सकता था। जब अर्जुन के शिष्य सात्यकि और भूरिश्रवा के बीच युद्ध चल रहा था और युद्ध में भूरिश्रवा सात्यकि पर भारी पड़ रहा था तब अपने शिष्य सात्यकि की जान बचाने के लिए अर्जुन ने बिना कोई चेतावनी दिए अपने तीक्ष्ण बाण से भूरिश्रवा के हाथ को काट डाला। तत्पश्चात सात्यकि ने भूरिश्रवा का सर धड़ से अलग कर दिया। अगर शिष्य मोह में अर्जुन द्वारा युद्ध के नियमों का उल्लंघन करने को पांडव अनुचित नहीं मानते तो धृतराष्ट्र द्वारा पुत्रमोह में किये गए कुकर्म अनुचित कैसे हो सकते थे ? प्रस्तुत है दीर्घ कविता “दुर्योधन कब मिट पाया ” का पंद्रहवां भाग।
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महा युद्ध होने से पहले कतिपय नियम बने पड़े थे,
हरि भीष्म ने खिंची रेखा उसमें योद्धा युद्ध लड़े थे।
एक योद्धा योद्धा से लड़ता हो प्रतिपक्ष पे गर अड़ता हो,
हस्तक्षेप वर्जित था बेशक निजपक्ष का योद्धा मरता हो।
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पर स्वार्थ सिद्धि की बात चले स्व प्रज्ञा चित्त बाहिर था,
निरपराध का वध करने में पार्थ निपुण जग जाहिर था।
सव्यसाची का शिष्य सात्यकि एक योद्धा से लड़ता था,
भूरिश्रवा प्रतिपक्ष प्रहर्ता उसपे हावी पड़ता था।
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भूरिश्रवा यौधेय विकट था पार्थ शिष्य शीर्ष हरने को,
दुर्भाग्य प्रतीति परिलक्षित थी पार्थ शिष्य था मरने को।
बिना चेताए उस योधक पर अर्जुन ने प्रहार किया,
युद्ध में नियमचार बचे जो उनका सर्व संहार किया।
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रण के नियमों का उल्लंघन कर अर्जुन ने प्राण लिया ,
हाथ काटकर उद्भट का कैसा अनुचित दुष्काम किया।
अर्जुन से दुष्कर्म फलाकर उभयहस्त से हस्त गवांकर,
बैठ गया था भू पर रण में एक हस्त योद्धा पछताकर।
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पछताता था नियमों का नाहक उसने सम्मान किया ,
पछतावा कुछ और बढ़ा जब सात्यकि ने दुष्काम किया।
जो कुछ बचा हुआ अर्जुन से वो दुष्कर्म रचाया था,
शस्त्रहीन हस्तहीन योद्धा के सर तलवार चलाया था ।
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कटा सिर शूर का भू पर विस्मय में था वो पड़ा हुआ,
ये कैसा दुष्कर्म फला था धर्म पतित हो गड़ा हुआ?
शिष्य मोह में गर अर्जुन का रचा कर्म ना कलुसित था,
पुत्र मोह में धृतराष्ट्र का अंधापन कब अनुचित था?
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कविता के अगले भाग अर्थात् सोलहवें भाग में देखिए अश्वत्थामा ने पांडव पक्ष के योद्धाओं की रक्षा कर रहे महादेव को कैसे प्रसन्न कर प्ररिपक्ष के बचे हुए सारे सैनिकों और योद्धाओं का विनाश किया ।
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अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-14

July 26, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

​इस दीर्घ कविता के पिछले भाग अर्थात् तेरहवें भाग में अभिमन्यु के गलत तरीके से किये गए वध में जयद्रथ द्वारा निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका और तदुपरांत केशव और अर्जुन द्वारा अभिमन्यु की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए रचे गए प्रपंच के बारे में चर्चा की गई थी। कविता के वर्तमान प्रकरण अर्थात् चौदहवें भाग में देखिए कैसे प्रतिशोध की भावना से वशीभूत होकर अर्जुन ने जयद्रथ का वध इस तरह से किया कि उसका सर धड़ से अलग होकर उसके तपस्वी पिता की गोद में गिरा और उसके पिता का सर टुकड़ों में विभक्त हो गया। प्रतिशोध की भवना से ग्रस्त होकर अगर अर्जुन जयद्रथ के निर्दोष तपस्वी पिता का वध करने में कोई भी संकोच नहीं करता , तो फिर प्रतिशोध की उसी अग्नि में दहकते हुए अश्वत्थामा से जो कुछ भी दुष्कृत्य रचे गए , भला वो अधर्म कैसे हो सकते थे? प्रस्तुत है दीर्घ कविता “दुर्योधन कब मिट पाया ” का चौदहवाँ भाग। 
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निरपराध थे पिता जयद्रथ के पर  वाण चलाता था,
ध्यान मग्न थे परम तपस्वी पर संधान लगाता था।
प्रभुलीन के चरणों में गिरा कटा हुआ जयद्रथ का सिर ,
देख पुत्र का शीर्ष विक्षेपण पिता हुए थे अति अधीर।
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और भाग्य का खेला ऐसा मस्तक फटा तात का ऐसे,
खरबूजे का फल हाथ से भू पर गिरा हुआ हो जैसे।
छाल प्रपंच जग जाहिर अर्जुन केशव से बल पाता था , 
पूर्ण हुआ प्रतिशोध मान कर चित में मान सजाता था।
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गर भ्राता का ह्रदय फाड़ना कृत्य नहीं बुरा होता, 
नरपशु भीम का प्रति शोध रक्त पीकर हीं पूरा होता।
चिर प्रतिशोध की अग्नि जो पांचाली में थी धधक रही ,
रक्त पिपासु चित उसका था शोला बनके भड़क रही। 
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ऐसी ज्वाला भड़क रही जबतक ना चीत्कार हुआ, 
दु:शासन का रक्त लगाकर जबतक ना श्रृंगार हुआ।
तबतक केश खुले रखकर शोला बनकर जलती थी ,
यदि धर्म था अगन चित में ले करके जो फलती थी।
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दु:शासन उर रक्त हरने में, जयद्रथ जनक के वधने में ,
केशव अर्जुन ना कुकर्मी गर छल प्रपंच के रचने में।
तो  कैसा  अधर्म  रचा  मैंने वो धर्म स्वीकार किया। ,  
प्रतिशोध की वो अग्नि हीं निज चित्त अंगीकार किया?
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गर प्रतिशोध हीं ले लेने का मतलब धर्म विजय होता ,
चाहे कैसे भी ले लो पर धर्म पुण्य ना क्षय होता। 
गर वैसा दुष्कर्म रचाकर पांडव विजयी कहलाते,
तो किस मुँह से कपटी सारे मुझको कपटी कह पाते?
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कविता के अगले भाग अर्थात् पन्द्रहवें भाग में देखिए अश्वत्थामा आगे बताता है कि अर्जुन ने अपने शिष्य सात्यकि के प्राण बचाने के लिए भूरिश्रवा का वध कैसे बिना चेतावनी दिए कर दिया।
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अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-13

July 17, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

इस दीर्घ रचना के पिछले भाग अर्थात् बारहवें  भाग में आपने देखा अश्वत्थामा ने दुर्योधन को पाँच कटे हुए नर कंकाल  समर्पित करते हुए क्या कहा। आगे देखिए वो कैसे अपने पिता गुरु द्रोणाचार्य के अनुचित तरीके के किये गए वध के बारे में दुर्योधन ,कृतवर्मा और कृपाचार्य को याद दिलाता है। फिर तर्क प्रस्तुत करता है कि उल्लू  दिन में  अपने शत्रु को हरा नहीं सकता इसीलिए वो रात में हीं  घात लगाकर अपने शिकार पर प्रहार करता है। पांडव के पक्ष में अभी भी पाँचों पांडव , श्रीकृष्ण , शिखंडी , ध्रीष्टदयुम्न आदि और अनगिनत सैनिक मौजूद थे जिनसे दिन में लड़कर अश्वत्थामा जीत नहीं सकता था । इसीलिए उसने  उल्लू से सबक सीखकर रात में हीं घात लगाकर पड़ाव पक्ष पे प्रहार कर नरसंहार रचाया। और देखिए अभिमन्यु के गलत तरीके से किये गए वध में जयद्रथ द्वारा निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका और तदुपरांत केशव और अर्जुन द्वारा अभिमन्यु की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए रचे गए प्रपंच। प्रस्तुत है दीर्घ कविता “दुर्योधन कब मिट पाया ” का  तेरहवां भाग।

पिता मेरे गुरु द्रोणाचार्य थे चक्रव्हयू के  अद्भुत ज्ञाता,
शास्त्र शस्त्र गूढ़ ज्ञान के ज्ञानी रणशिल्प के परिज्ञाता।
धर्मराज ना टिक पाते थे भीम नाकुलादि पांडव भ्राता ,
पार्थ  कृष्ण को अभिज्ञान था वो  कैसे संग्राम   विज्ञाता।
  
इसीलिए  तो  यदुनंदन  ने कुत्सित  मनोव्यापार  किया ,
संग युधिष्ठिर कपट रचा कर प्राणों पे अधिकार किया।
अस्वत्थामा  मृत  हुआ  है   गज  या  नर  कर  उच्चारण,
किस मुँह धर्म का दंभ भरें वो   दे   सत्य  पर सम्भाषण।

धर्मराज का धर्म लुप्त  जब गुरु ने असत्य स्वीकारा था,
और  कहाँ  था  धर्म ज्ञान  जब छल से शीश उतारा था ।
एक  निहथ्थे   गुरु   द्रोण   पर  पापी  करता  था  प्रहार ,
धृष्टद्युम्न  के  अप्कर्मों  पर  हुआ   कौन  सा  धर्माचार ?

अधर्म राह का करके पालन और असत्य का उच्चारण ,
धर्मराज  से  धर्म  लुप्त था  और  कृष्ण  से  सत्य   हरण। 
निज  स्वार्थ   सिद्धि   हेतु पांडव  से जो कुछ  कर्म  हुआ ,
हे कृपाचार्य गुरु द्रोणाचार्य को छलने में क्या धर्म हुआ ?

बगुलाभक्तों के चित में क्या छिपी हुई होती है आशा,
छलिया बुझे जाने  माने किचित छल प्रपंच  की भाषा।
युद्ध  जभी कोई  होता है  एक  विजेता  एक  मरता  है ,
विजय पक्ष की आंकी जाती समर कोई कैसे लड़ता है?

हे  कृपाचार्य  हे  कृतवर्मा  ना  सोंचे  कैसा काम  हुआ ?
हे  दुर्योधन ना अब   देखो ना  युद्धोचित  अंजाम हुआ?
हे  कृतवर्मा  धर्म   रक्षण की    बात हुई  है आज वृथा ,
धर्म न्याय का क्षरण हुआ  है रुदन करती आज पृथा।

गज कोई क्या मगरमच्छ से जल में लड़ सकता है क्या?
जो जल का है चपल खिलाड़ी उनपे अड़ सकता है क्या?
शत्रु  प्रबल  हो   आगे  से  लड़ने  में  ना  बुद्धि का काम , 
रात्रि प्रहर में हीं उल्लू अरिदल का करते काम तमाम।

उल्लूक सा  दौर्वृत्य  रचाकर  ना  मन  में  शर्माता   हूँ , 
कायराणा  कृत्य  हमारा  पर मन हीं मन  मुस्काता हूँ ।  
ये बात सही है छुप छुप के हीं रातों को संहार किया ,
कोई  योद्धा जगा नहीं  था बच  बच के प्रहार किया।

फ़िक्र  नहीं  है  इस  बात की ना  योद्धा  कहलाऊँगा,
दाग  रहेगा  गुरु पुत्र  पे   कायर   सा  फल  पाऊँगा।
इस दुष्कृत्य  को बाद हमारे समय  भला कह पायेगा?
अश्वत्थामा  के चरित्र  को  काल  भला  सह  पायेगा?

जब भी कोई नर या नारी प्रतिशोध का करता  निश्चय ,
बुद्धि लुप्त हो हीं  जाती  है और ज्ञान का होता है क्षय। 
मुझको  याद  करेगा  कोई  कैसे    इस का ज्ञान नहीं ,
प्रतिशोध  तो  ले  हीं  डाला बचा हुआ बस भान यहीं ।

गुरु  द्रोण  ने पांडव को हरने हेतु जब चक्र रचा,
चक्रव्यहू के पहले वृत्त में जयद्रथ ने कुचक्र रचा।
कुचक्र  रचा  था  ऐसा  कि  पांडव  पार ना पाते थे ,
गर  ना  होता जयद्रथ  अभिमन्यु  मार ना पाते थे।  

भीम युधिष्ठिर जयद्रथ पे उस दिन अड़ न पाते थे ,
पार्थ कहीं थे फंसे नहीं सहदेव नकुल लड़ पाते थे।  
अभिमन्यु तो चला गया फंसा हुआ उसके अन्दर ,
वध फला अभिमन्यु का बना जयद्रथ काल कंदर।   

अगर पुत्र के मरने पर अर्जुन को क्रोध हुआ अतिशय,
चित्त में अग्नि प्रतिघात की फलित हुई थी क्षोभ प्रलय।
अभिमन्यु  का  वध अगर ना युद्ध नियामानुसार हुआ ,
तो जयद्रध को हरने में वो कौन युद्ध का नियम फला?

जयद्रथ  तो  अभिमन्यु  के  वध  में  मात्र  सहायक था ,
छल  से वध रचने वालों में  योद्धा था  अधिनायक था।
जयद्रथ  को  छल  से  मारा  तथ्य  समझ में आता  हैं ,
पर  पिता  को वधने में क्या पुण्य समझ ना आता है।   

सुदूर किसी गिरी केअंतर और किसी तरुवर के नीचे,
तात जयद्रथ परम तपस्वी चित्त में परम ब्रह्म को सींचे।
मन में तन में ईश जगा के मुख में बस प्रभु की वाणी ,
कहीं  तपस्या  लीन  मगन  थे  पर पार्थ वो अभिमानी।

कविता के अगले भाग अर्थात् चौदहवें भाग में देखिए कैसे अश्वत्थामा बताता है कि महाभारत होने का मूल कारण द्रौपदी , भीम , अर्जुन आदि के चित्त में छिपी अहंकार और प्रतिशोध की भावना हीं थी।   ये वही प्रतिशोध की भावना थी जिसके वशीभूत होकर उससे भी दुष्कर्म फलित हो गए।

अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-12

July 10, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

इस दीर्घ रचना के पिछले भाग अर्थात् ग्यारहवें भाग में आपने देखा कि युद्ध के अंत में भीम द्वारा जंघा तोड़ दिए जाने के बाद दुर्योधन मरणासन्न अवस्था में  हिंसक जानवरों के बीच पड़ा हुआ था। आगे देखिए जंगली शिकारी पशु बड़े धैर्य के साथ दुर्योधन की मृत्यु का इन्तेजार कर रहे थे और उनके बीच फंसे हुए दुर्योधन को मृत्यु की आहट को देखते रहने के अलावा कोई चारा नहीं था। परंतु होनी को तो कुछ और हीं मंजूर थी । उसी समय हाथों में  पांच कटे हुए  नर कपाल लिए अश्वत्थामा का आगमन हुआ  और दुर्योधन की मृत्यु का इन्तेजार कर रहे वन पशुओं की ईक्छाएँ धरी की धरी रह गई। आइये देखते हैं अश्वत्थामा ने दुर्योधन को पाँच कटे हुए नर कंकाल  समर्पित करते हुए क्या कहा?  प्रस्तुत है दीर्घ कविता “दुर्योधन कब मिट पाया ” का  बारहवां भाग।

आश्वस्त रहा सिंहों की भाँति  गज सा मस्त रहा जीवन में,
तन चींटी  से  बचा रहा था आज वो ही योद्धा उस क्षण में।
पड़ा   हुआ  था  दुर्योधन  होकर  वन   पशुओं  से  लाचार,
कभी शिकारी बन वन फिरता  आज बना था वो शिकार।

मरना   तो   सबको   होता एक दिन वो  बेशक मर जाता,
योद्धा   था  ये   बेहतर    होता   रण   क्षेत्र   में अड़  जाता।
या  मस्तक  कटता  उस  रण  में और देह को देता त्याग ,
या झुलसाता शीश अरि का निकल रही जो उससे आग।

पर  वीरोचित एक   योद्धा  का उसको  ना  सम्मान मिला ,
कुकर्म रहा  फलने  को बाकी नहीं शीघ्र परित्राण मिला।
टूट  पड़ी थी  जंघा   उसकी   उसने    बेबस  कर   डाला,
मिलना  था अपकर्ष फलित  सम्मान रहित मृत्यु प्याला।

जंगल  के  पशु  जंगल के घातक   नियमों से  चलते  है,
उन्हें ज्ञात  क्या  धैर्य प्रतीक्षा  गुण  जो मानव  बसते  हैं।
पर जाने क्या पाठ पढ़ाया मानव के उस मांसल तन ने ,
हिंसक  सारे बैठ पड़े थे दमन  भूख  का करके मन में।

सोच  रहे  सब  वन  देवी   कब निज  पहचान कराएगी?
नर  के  मांसल भोजन का कब तक  रसपान कराएगी?
कब  तक कैसे इस नर का हम सब  भक्षण कर पाएंगे?
कब  तक  चोटिल   घायल  बाहु नर   रक्षण कर पाएंगे?

पैर हिलाना मुश्किल था अति उठ बैठ ना चल पाता था ,
हाथ  उठाना  था  मुश्किल  जो  बोया था  फल पाता था।
घुप्प अँधेरा नीरव  रात्रि में  सरक सरक  के चलते सांप ,
हौले  आहट  त्वरित  हो रहे  यम के वो  मद्धम पदचाप।

पर  दुर्योधन  के  जीवन  में  कुछ  पल  अभी बचे   होंगे ,
या    गिद्ध,  शृगालों   के  कति पय   दुर्भाग्य   रहे   होंगे।
गिद्ध, श्वान  की  ना होनी थी  विचलित रह  गया व्याधा,
चाह  अभी   ना   फलित हुई   ना फलित   रहा  इरादा।

उल्लू  के सम  कृत रचा  कर महादेव की कृपा पाकर,
कौन आ रहा सन्मुख  उसके देखा जख्मी  घबड़ाकर?
धर्म   पुण्य   का    संहारक   अधर्म   अतुलित  अगाधा ,
दक्षिण   से अवतरित हो रहा  था  अश्वत्थामा  विराधा।

एक  हाथ   में  शस्त्र सजा के  दूजे  कर नर मुंड लिए,
दिख  रहा  था   अश्वत्थामा   जैसे  नर्तक  तुण्ड  जिए।
बोला  मित्र  दुर्योधन   तूझको  कैसे  गर्वित  करता हूँ,
पांडव कपाल सहर्ष तेरे चरणों को अर्पित करता हूँ।

भीम , युधिष्ठिर धर्मयुद्ध ना करते बस  छल हीं करते थे ,
नकुल और सहदेव विधर्मी छल से हीं बच कर रहते थे।
जिस  पार्थ ने भीष्म  पितामह का अनुचित संहार किया,
कर्ण मित्र जब विवश हुए छलसे  कैसे वो प्रहार किया।

वध  करना  हीं  था दु:शासन का  भीम  तो  कर देता,
केश  रक्त  के   प्यासे   पांचाली  चरणों   में धर देता।
कृपाचार्य क्या बात हुई दु:शासन का रक्त पी पीकर,
पशुवत कृत्य रचाकर निजको कैसे कहता है वो नर।

कविता के अगले भाग , अर्थात् तेरहवें भाग में देखिए कैसे अश्वत्थामा ने अपने द्वारा रात्रि में छल से किये गए हत्याओं , दुष्कर्मों को  उचित ठहराने के लिए दुर्योधन , कृपाचार्य और कृतवर्मा के सामने कैसे कैसे तर्क प्रस्तुत किए?

अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-11

July 3, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

इस दीर्घ कविता के दसवें भाग में दुर्योधन  द्वारा श्रीकृष्ण को हरने का असफल प्रयास और उस असफल प्रयास के प्रतिउत्तर में श्रीकृष्ण वासुदेव द्वारा स्वयं के  विभूतियों के प्रदर्शन का वर्णन किया गया है।अर्जुन सरल था तो उसके प्रति कृष्ण मित्रवत व्यवहार रखते थे, वहीं कपटी दुर्योधन के लिए वो महा कुटिल थे। इस भाग में देखिए , युद्ध के अंत में भीम द्वारा जंघा तोड़ दिए जाने के बाद मरणासन्न अवस्था में दुर्योधन  हिंसक जानवरों के बीच पड़ा हुआ था। जानवर की वृत्ति रखने वाला योद्धा स्वयं को जानवरों के बीच असहाय महसूस कर रहा था । अधर्म का आचरण करने वाले व्यक्ति का अंजाम जैसा होना चाहिए , कुछ इसी तरह का अंजाम दुर्योधन का हुआ था। प्रस्तुत है दीर्घ कविता “दुर्योधन कब मिट पाया ” का  ग्यारहवां भाग।

छल प्रपंच  का अर्जन करके कपटी  दुर्योधन फलता,
तिनका तिनका अनल दबाकर सीने में जलता रहता।
धृतराष्ट्र  सुत  कलुसित मन लेकर जीता था जीवन में,
ज्यों नागों का राजा सीधा फन करके चलता हो वन में।

बाल्य काल में जो भ्राता  को विष का पान कराता था,
लाक्षा  गृह  में पांडव सब मर जाए जाल बिछाता था।
श्यामा  ने  तो  खेल खेल  में थोड़ा सा परिहास किया ,
ना  कोई  था  कपट  रचा ना वहमी  ने विश्वास किया।

वो  हास ना  समझ  सका  था  परिहास का ज्ञान नहीं ,
भाभी  के  परिहासों से चोटिल होता  अभिमान कहीं?
जो श्यामा के हंसने को समझा था अवसर अड़ने को ,
हँसना तो  मात्र बहाना था वो  था हीं तत्पर लड़ने को।

भला  खेल में   भी  कोई  क्या  घन  षड्यंत्र रचाता   है?
था खेल  युद्ध ना  आडम्बर   मिथ्या प्रपंच    चलाता है?
भरी सभा में पांचाली  का कर सकता जो   वस्त्र हरण,
आखिर वोहीं तो सोच सके कैसे हरि का हो तेजहरण।

चिंगारी  तो  लहक  रही थी बस एक तिनका काफी था ,
ना  सवाल  था संधि का  कोई ना सवाल था माफ़ी का।
जो जलता हो क्रोध अनल में आखिर जग को क्या देता?
वो  तो  काँटों  का  था  पौधा  यदु नंदन   को क्या  देता ?

भीष्म द्रोण  जब साथ खड़े थे उसको भय कैसे होता?
और मित्र  हो अंग राज  तब  जग में  क्षय कैसे  होता?
कोई  होता और  समक्ष   दुर्योधन  को  फलना हीं था,
पर  हरि  हो  जाएं विपक्ष  तब अहंकार हरना  हीं था।

भीष्म, द्रोण और कर्ण का रक्षण काम न कोई आया ,
छल के पासे  फेंक फेंक कर  शकुनी  तब पछताया ।
काम ना आई ममता माँ की कपट काम ना आता था ,
जब   भीम  ने छल  से  जंघा  तोड़ी    तब   गुर्राता   था।

आज वोही कपटी अभिमानी भू पे पड़ा हुआ था  ऐसे,
धुल धूसरित हो जाती हो  दूब  धरा पर  सड़ के जैसे।
अति भयावह दृश्य गजब था उस काले अंधियारे का,
ना कोई ज्योति गोचित ना परिचय था उजियारे का।

उल्लू  सारे  वृक्ष  पर बैठे  आस  लगाए  थे  भक्षण  को,
जिह्वा उनकी आग उगलती ना आता कोई रक्षण को।
निशा  अंधेरी  तिमिर  गहन और  कुत्ते घात लगाते थे,
गिद्ध  शृगाल  थे  प्रतिद्वंदी  सब लड़ते थे चिल्लाते  थे।

जो जीवन भर जंगल के पशुओं जैसा करता व्यवहार,
घात लगा कर शत्रु की गर्दन   पे रखता था   तलवार।
लोमड़  जैसी  आंखे  जिसकी और गिद्धों से थे आचार,
वो हीं दुर्योधन पड़ा हुआ था गिद्धों   के आगे  लाचार।

कविता के अगले भाग में देखिए , कैसे जंगली शिकारी पशु मानवोचित गुण के साथ बड़े धैर्य  से दुर्योधन की मृत्यु का इन्तेजार कर रहे थे और कैसे एक योद्धा के आगमन ने उन वन पशुओं के मंसूबों पर पानी फेर दिया ?

अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-10

June 26, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

दीर्घ कविता के इस भाग में दुर्योधन के बचपन के कुसंस्कारों का संछिप्त परिचय  , दुर्योधन  द्वारा श्रीकृष्ण को हरने का असफल प्रयास और उस असफल प्रयास के प्रतिउत्तर में श्रीकृष्ण वासुदेव द्वारा स्वयं के  विभूतियों के प्रदर्शन का वर्णन किया है। श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व एक दर्पण की भांति है, जिसमे पात्र को वो वैसे  हीं दिखाई पड़ते हैं  , जैसा कि वो स्वयं है। दुर्योधन जैसे कुकर्मी और कपटी व्यक्ति के लिए वो छलिया है जबकि अर्जुन जैसे सरल ह्रदय व्यक्ति के लिए एक सखा ।  युद्ध शुरू होने से पहले जब अर्जुन और दुर्योधन दोनों गिरिधर की सहायता प्राप्त करने हेतु उनके पास पहुँचते हैं तो यदुनंदन दुर्योधन के साथ छल करने में नहीं हिचकते। प्रस्तुत है दीर्घ कविता “दुर्योधन कब मिट पाया ” का दसवाँ भाग।

किसी मनुज में अकारण अभिमान यूँ हीं न जलता है ,
तुम जैसा वृक्ष लगाते हो वैसा हीं तो फल फलता है ।  
कभी चमेली की कलियों  पे मिर्ची ना तीखी आती है  ,
सुगंध चमेली का  गहना वो इसका हीं फल पाती है।

जो बाल्यकाल में भ्राता को विष देने का साहस करता,
कि लाक्षागृह में धर्म राज जल जाएं दु:साहस करता।
जो हास न समझ सके और   परिहास का ज्ञान नहीं ,
भाभी के परिहासों से चोटिल होता  अभिमान कहीं?

दुर्योधन की मति मारी थी  न इतना भी विश्वास किया,
वो हर लेगा गिरधारी को असफल किंतु प्रयास किया।
ये बात सत्य है  श्रीकृष्ण  को कोई हर सकता था क्या?
पर  बात तथ्य है दु:साहस ये दुर्योधन  कर सकता था।

कहीं उपस्थित वसु देव और कहीं उपस्थित देव यक्ष,
सुर असुर भी  नर  पिशाच  भी माधव  में होते  प्रत्यक्ष।
एक भुजा में पार्थ उपस्थित  दूजे  में सुशोभित हलधर ,
भीम ,नकुल,सहदेव,युधिष्ठिर नानादि आयुध गदा धर।

रिपु भंजक  की  उष्ण नासिका से उद्भट सी श्वांस चले,
अति कुपित हो अति वेग से माधव मुख अट्टहास फले।
उनमें  स्थित  थे   महादेव  ब्रह्मा  विष्णु क्षीर सागर भी ,
क्या सलिला क्या जलधि जलधर चंद्रदेव दिवाकर भी।

देदीप्यमान उन हाथों  में शारंग शरासन,  गदा , शंख ,
चक्र खडग नंदक चमके जैसे विषधर का तीक्ष्ण डंक।
रुद्र  प्रचंड  थे   केशव  में,  केशव में दृष्टित  नाग पाल ,
आदित्य सूर्य और इन्द्रदेव भी  दृष्टित  सारे लोकपाल।

परिषद कम्पित थर्रथर्रथर्र नभतक जो कुछ दिखता था ,
अस्त्र वस्त्र या शाश्त्र शस्त्र हो ना केशव से छिपता था।
धूमकेतु   भी   ग्रह   नक्षत्र और   सूरज  तारे   रचते   थे,
जल थल सकल चपल अचल भी यदुनन्दन में बसते थे।

कहीं प्रतिष्ठित  सूर्य  पुत्र  अश्विनी  अश्व  धारण  करके,
दीखते  ऐसे  कृष्ण  मुरारी  सकल विश्व  हारण करते।
रोम  कूप से बिजली कड़के गर्जन करता विष  भुजंग,
दुर्योधन  ना सह पाता था   देख  रूप गिरिधर  प्रचंड ?

कभी  ब्रज  वल्लभ के हाथों से  अभिनुतन सृष्टि रचती,
कभी प्रेम पुष्प की वर्षा होती बागों में कलियां खिलती।
कहीं आनन  से अग्नि वर्षा  फलित  हो  रहा था संहार,
कहीं हृदय  से सृजन करते थे इस जग  के पालन हार।

जब वक्र दॄष्टि कर देते थे संसार उधर जल पड़ता था,
वो अक्र  वृष्टि कर देते थे संहार उधर फल पड़ता था।
स्वासों का आना जाना सब जीवन प्राणों का आधार,
सबमें व्याप्त दिखे केशव हरिकी हीं लीलामय संसार।

परिषद कम्पित थर्रथर्रथर्र नभतक जो कुछ दिखता था ,
अस्त्र वस्त्र या शाश्त्र शस्त्र हो ना केशव से छिपता था।
धूमकेतु   भी   ग्रह   नक्षत्र  भी  सूरज  तारे   रचते   थे,
जल थल सकल चपल अचल भी यदुनन्दन में बसते थे।

सृजन तांडव का नृत्य दृश्य  माधव  में हीं सबने देखा,
क्या  सृष्टि का  जन्म चक्र क्या मृत्यु का लेखा जोखा।
हरि में दृष्टित थी पृथा हरी हरि ने खुद में आकाश लिया,
जो दिखता था था स्वप्नवत पर सबने हीं विश्वास किया।

देख विश्वरूप श्री कृष्ण का किंचित क्षण को घबराए,
पर वो भी क्या दुर्योधन जो नीति धर्म युक्त हो पाए।
लौट  चले  फिर  श्री कृष्ण करके दुर्योधन सावधान,
जो लिखा भाग्य में होने को ये युद्ध हरेगा महा प्राण।

बंदी  करने  को  इक्छुक था हरि पर क्या  निर्देश फले ?
जो   दुनिया  को   रचते  रहते  उनपे क्या  आदेश फले ?
ये  बात  सत्य   है  प्रभु  कृष्ण  दुर्योधन  से  छल करते थे,
षडयंत्र  रचा  करता  आजीवन  वैसा  हीं  फल रचते  थे।

ऐसा कौन सा पापी था जिसको हरि ने था छला नहीं,
और कौन था पूण्य जीव जो श्री हरि से था फला नहीं।
शीश पास जब पार्थ पड़े था दुर्योधन नयनों के आगे  ,
श्रीकृष्ण ने बदली करवट छल से पड़े पार्थ के आगे।

अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-9

June 19, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

दुर्योधन भले हीं खलनायक था ,पर कमजोर नहीं । श्रीकृष्ण का रौद्र रूप देखने के बाद भी  उनसे भिड़ने से नहीं कतराता । तो जरूरत पड़ने पर कृष्ण से सहायता मांगने भी पहुँच जाता है , हालाँकि कृष्ण द्वारा छला गया , ये और बात है । उसकी कुटनीतिक समझ पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं लगा सकता । युद्ध के अंत में जब अश्वत्थामा उसको पांडव पुत्रों के कटे हुए सर लाता है तो दुर्योधन पछताता है ,परन्तु अश्वत्थामा खुश हीं होता है ।अश्वत्थामा इस बात से खुश होता है कि अच्छा हीं हुआ कि उसका बदला पूर्ण हुआ । जैसे वो अपने पिता के हत्या का बोझ सिर पे लिए जीता है , ठीक वैसे हीं पांडव भी जीते जी पुत्रों के वध की आग में जियेंगे । खुश दोनों हैं , पर दुर्योधन खुश होने के और महाभारत युद्ध लड़ने के अपने कारण बताता है । प्रस्तुत है दीर्घ कविता दुर्योधन कब मिट पाया , दीर्घ कविता का नौवां भाग ।

रिपु भंजक  की  उष्ण नासिका से उद्भट सी श्वांस चले,
अति कुपित हो अति वेग से माधव मुख अट्टहास फले।
उनमें  स्थित  थे   महादेव  ब्रह्मा  विष्णु क्षीर सागर भी ,
क्या सलिला क्या जलधि जलधर चंद्रदेव दिवाकर भी।

देदीप्यमान उन हाथों  में शारंग शरासन,  गदा , शंख ,
चक्र खडग नंदक चमके जैसे विषधर का तीक्ष्ण डंक।
रुद्र प्रचंड थे  केशव में,  केशव में यक्ष वसु नाग पाल ,
आदित्य अश्विनी इन्द्रदेव और दृष्टित  सारे लोकपाल।

एक भुजा में पार्थ उपस्थित  दूजे  में सुशोभित हलधर ,
भीम ,नकुल,सहदेव,युधिष्ठिर नानादि आयुध गदा धर।
रोम  कूप से बिजली कड़के गर्जन करता विष  भुजंग,
क्या दुर्योधन में शक्ति  थी जो दे सकता  हरि  को दंड?

परिषद कम्पित थर्रथर्रथर्र नभतक जो कुछ दिखता था ,
अस्त्र वस्त्र या शाश्त्र शस्त्र हो ना केशव से छिपता था।
धूमकेतु   भी   ग्रह   नक्षत्र  भी  सूरज  तारे   रचते   थे,
जल थल सकल चपल अचल भी यदुनन्दन में बसते थे।

कभी  ब्रज  वल्लभ के हाथों से  अभिनुतन सृष्टि रचती,
कभी प्रेम पुष्प की वर्षा होती बागों में कलियां खिलती।
कहीं आनन  से अग्नि वर्षा  फलित  हो  रहा था संहार,
कहीं हृदय  से सृजन करते थे इस जग  के पालन हार।

जब वक्र दॄष्टि कर देते थे संसार उधर जल पड़ता था,
वो अक्र  वृष्टि कर देते थे संहार उधर फल पड़ता था।
स्वासों का आना जाना सब जीवन प्राणों का आधार,
सबमें व्याप्त दिखे केशव हरिकी हीं लीलामय संसार।

सृजन तांडव का नृत्य दृश्य  माधव  में हीं सबने देखा,
क्या  सृष्टि का  जन्म चक्र क्या मृत्यु का लेखा जोखा।
हरि में दृष्टित थी पृथा हरी हरि ने खुद में आकाश लिया,
जो दिखता था था स्वप्नवत पर सबने हीं विश्वास किया।

देख विश्वरूप श्री कृष्ण का किंचित क्षण को घबराए,
पर वो भी क्या दुर्योधन जो नीति धर्म युक्त हो पाए।
लौट  चले  फिर  श्री कृष्ण करके दुर्योधन सावधान,
जो लिखा भाग्य में होने को ये युद्ध हरेगा महा प्राण।

दुर्योधन की मति मारी थी  न इतना भी विश्वास किया,
वो हर लेगा गिरधारी को असफल किंतु प्रयास किया।
ये बात सत्य है  श्रीकृष्ण  को कोई हर सकता था क्या?
पर  बात तथ्य है दु:साहस ये दुर्योधन  कर सकता था।

बंदी  करने  को  इक्छुक था हरि पर क्या  निर्देश फले ?
जो   दुनिया  को   रचते  रहते  उनपे क्या  आदेश फले ?
ये  बात  सत्य   है  प्रभु  कृष्ण  दुर्योधन  से  छल करते थे,
षडयंत्र  रचा  करता  आजीवन  वैसा  हीं  फल रचते  थे।

ऐसा कौन सा पापी था जिसको हरि ने था छला नहीं,
और कौन था पूण्य जीव जो श्री हरि से था फला नहीं।
शीश पास जब पार्थ पड़े था दुर्योधन नयनों के आगे  ,
श्रीकृष्ण ने बदली करवट छल से पड़े पार्थ के आगे।

किसी मनुज में अकारण अभिमान यूँ हीं न जलता है ,
तुम जैसा वृक्ष लगाते हो वैसा हीं तो फल फलता है ।
कभी चमेली की कलियों  पे मिर्ची ना तीखी आती है  ,
सुगंध चमेली का  गहना वो इसका हीं फल पाती है।

जो बाल्यकाल में भ्राता को विष देने का साहस करता,
कि लाक्षागृह में धर्म राज जल जाएं दु:साहस करता।
जो हास न समझ सके और परिहास का ज्ञान नहीं ,
भाभी के परिहासों से चोटिल होता अभिमान कहीं?

जो श्यामा के हंसने को समझा था अवसर अड़ने को ,
हँसना तो मात्र बहाना था वो  था हीं तत्पर लड़ने को।
भरी सभा में कुलबधू का कर सकता जो वस्त्र हरण,
वो हीं तो ऐसा सोच सके  कैसे हरि का हो तेज हरण।

आज वो ही दम्भी अभिमानी भू पे पड़ा हुआ था  ऐसे,
धुल धूसरित हो जाती हो  दूब  धरा पर  सड़ के जैसे।
अति भयावह दृश्य गजब था उस काले अंधियारे का,
ना कोई ज्योति गोचित ना परिचय था उजियारे का।

उल्लू सारे थे छिपे हुए से आस  लगाए थे भक्षण को,
कि छुप छुप के घात लगाते ना कोई आता रक्षण को।
निशा अंधेरी तिमिर गहन और  कुत्ते घात लगाते थे,
गिद्ध शृगाल थे प्रतिद्वंदी सब लड़ते थे खिसियाते थे।

आखिर भूख की देवी कब खुद की पहचान कराएगी?
नर के मांसल भोजन का कबतक  रसपान कराएगी?
कब तक कैसे इस नर का हम सब  भक्षण कर पाएंगे?
कबतक चोटिल घायल बाहु नर का रक्षण कर पाएंगे?

जो जंगल के हिंसक पशुओं के जैसा करता व्यवहार,
घात लगा कर उचित वक्त पे धरता  शत्रु पे  तलवार।
लोमड़ जैसी आंखे थी और गिद्धों जैसे थे आचार,
वो दुर्योधन पड़ा हुआ था गिद्धों  के सम हो लाचार।

पर दुर्योधन के जीवन में कुछ पल अभी बचे   होंगे ,
या श्वान, गिद्ध,  शृगालों के दुर्भाग्य कर्म  रहे   होंगे ।
गिद्ध,श्वान की ना होनी थी  विचलित रह गया व्याधा,
चाहत   वो  अपूर्ण   रह   गयी   बाकी  रहा  इरादा।

उल्लू के सम कृत रचा कर महादेव की कृपा पाकर,
कौन आ रहा सन्मुख मेरे सोचा दुर्योधन घबड़ाकर?
धर्म   पुण्य  का   संहारक   अधर्म अतुलित अगाधा ,
था दक्षिण  से अवतरित हो रहा अश्वत्थामा विराधा।

एक हाथ में शस्त्र सजा के दूजे कर नर मुंड लिए,
दिख रहा था अश्वत्थामा जैसे नर्तक  तुण्ड जिए।
बोला मित्र दुर्योधन  देखो कैसे  मैं गर्वित करता हूँ,
पांच मुंड ये पांडव के है मैं तुमको अर्पित करता हूँ।

सुन अश्वत्थामा की बातें अधरों में मुस्कान फली,
शायद इसी दृश्य के हेतु दुर्योधन में जान बची।
फिर उसने जैसे तैसे करके निज  हाथ बढ़ाया,
पाँच कटे हुए नर सर थे  उनको हाथ दबाया।

कि पीपल के पत्तों जैसे ऐसे फुट पड़े थे वो,
पांडव के सर ना है ऐसे कैसे टूट पड़े थे जो ।
दीर्घ स्वांस लेकर दुर्योधन ने हौले से ये बोला,
अश्वत्थामा मित्र हितैषी तूने ये कैसा कर डाला।

इतने कोमल सर तो पांडव के कैसे हो सकते हैं?
उनके पुत्रों के हीं सर हैं  ये हीं ऐसे  हो सकते हैं।
ये जानकर अश्वत्थामा उछल पड़ा था भूपर ऐसे ,
जैसे बिजली आन पड़ी हो उसके हीं मस्तक पर जैसे।

पल को तो हताश हुआ था पर संभला था एक पल में ,
जिसकी आस नहीं थी उसको प्राप्त हुआ था फल में।
जिस कृत्य से धर्म राज ने गुरु द्रोण संहार किया ,
सही हुआ सब जिन्दे हैं ना सरल मृत्यु उपहार दिया।

अब जिस पीड़ा को हृदय लिए अश्वत्थामा चलता है ,
ये देख  तुष्टि हो जाएगी वो पांडव में भी फलता है ।
पितृ घात के पितृ ऋण से कुछ तो पीड़ा कम होगी ,
धर्म राज से अश्रु नयन से हृदय अग्नि कुछ नम होगी।

अति पीड़ा होती थी उसको पर मन में हर्षाता था,
हार गया था पांडव से पर दुर्योधन मुस्काता  था।
हे अश्वत्थामा मेरे उर को भी कुछ ठंडक आती है ,
टूट गया है तन मन मेरा पर दर्पोंनत्त छाती है।

तुमने जो पुरुषार्थ किया निश्चित गर्वित होता हूँ,
पर जिस कारण तू होता न उस कारण होता हूँ।
तू हँसता तेरे कारण से मेरे निज पर कारण हैं ,
जैसे हर नर भिन्न भिन्न जैसे अक्षर उच्चारण है।

कदा कदा हीं पूण्य भाव किंचित जो मन में आते थे,
सोच पितृ संग अन्याय हुए ना सिंचित हीं हो पाते थे।
जब माता के नेत्र दृष्टि गोचित उर में ईर्षा होती,
तन में मन में तपन घोर अंगारों की वर्षा होती।

बचपन से मैंने पांडव को कभी नहीं भ्राता माना,
शकुनि मामा से अक्सर हीं सहता रहता था ताना।
जिसको  हठधर्मी कह कहकर आजीवन अपमान दिया,
उर में भर इर्ष्या की ज्वाला और मन में  अभिमान  दिया।

जो जीवन भर भीष्म ताप से दग्ध  आग को सहता था,
पाप पुण्य की बात भला  बालक में कैसे  फलता था?
ये तथ्य सत्य  है दुर्योधन  ने अनगिनत अनाचार सहे,
धर्म पूण्य की बात वृथा  कैसे उससे धर्माचार फले ?

हाँ  पिता रहे आजन्म अंध ना न्याय युक्त फल पाते थे ,
कहने को आतुर सकल रहे पर ना कुछ भी कह पाते थे।
ना कुछ  सहना  ना कुछ  कहना  ये कैसी  लाचारी थी ,
वो विदुर  नीति आड़े आती अक्सर वो विपदा  भारी थी।

वो जरासंध जिससे डरकर कान्हा मथुरा रण छोड़ चले,
वो कर्ण सम्मुख था नतमस्तक सोचो कैसा वो वीर अहे।
ऐसे वीर से जीवन भर जाति का ज्ञान बताते थे,
ना कर्म क्षत्रिय का करते नाहक़ अभिमान सजाते थे।

जो जीवन भर हाय हाय जाति से ही पछताता था,
उस कर्ण मित्र के साये में पूण्य कहाँ फल पाता था।
पास एक था कर्ण मित्र भी न्याय नहीं मिल पाता था?
पिता दृश थी विवशता ना सह पाता कह पाता था  ।

ऐसों के बीच रहा जो भी उससे क्या धर्म विजय होगा,
जो आग के साए में जीता तो न्याय पूण्य का क्षय होगा।
दुर्बुधि दुर्मुख कहके जिसका सबने उपहास किया ,
अग्न आप्त हो जाए किंचित बस थोड़ा प्रयास किया।

अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-8 

June 12, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

शठ शकुनि से कुटिल मंत्रणा करके हरने को तैयार,
दुर्योधन समझा था उनको एक अकेला नर  लाचार।
उसकी नजरों में ब्रज नंदन  राज दंड  के अधिकारी,
भीष्म नहीं कुछ कह पाते थे उनकी अपनी लाचारी।

धृतराष्ट्र विदुर जो समझाते थे उनका अविश्वास किया,
दु:शासन का मन भयकम्पित उसको यूँ विश्वास दिया।
जिन  हाथों  संसार  फला था  उन  हाथों  को हरने को,
दुर्योधन  ने  सोच  लिया था ब्रज नन्दन  को  धरने को।

नभपे लिखने को लकीर कोई लिखना चाहे क्या होगा?
हरि पे  धरने  को जंजीर कोई रखना  चाहे  क्या होगा?
दीप्ति जीत  हीं  जाती है वन चाहे कितना भी घन हो,
शक्ति विजय हीं होता है चाहे कितना भी घन तम हो।

दुर्योधन जड़ बुद्धि हरि से लड़ कर अब पछताता था,
रौद्र कृष्ण का रूप देखकर लोमड़  सा भरमाता था।
राज कक्ष में कृष्ण  खड़े जैसे कोई पर्वत अड़ा हुआ,
दुर्योधन का व्यूहबद्ध  दल बल अत्यधिक डरा हुआ।

देहओज से अनल फला आँखों से ज्योति विकट चली,
जल  जाते सारे शूर कक्ष में ऐसी  द्युति   निकट जली।
प्रत्यक्ष हो गए अन्धक  तत्क्षण वृशिवंश के सारे  वीर,
वसुगण सारे उर उपस्थित ले निज बाहू  तरकश तीर।

अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-6

June 5, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

ऐसे शक्ति पुंज कृष्ण जब शिशुपाल मस्तक हरते थे,
जितने सारे वीर सभा में थे सब चुप कुछ ना कहते थे।
राज सभा में द्रोण, भीष्म थे कर्ण तनय अंशु माली,
एक तथ्य था निर्विवादित श्याम श्रेष्ठ सर्व बल शाली।

वो व्याप्त है नभ में जल में चल में थल में भूतल में,
बीत गया जो पल आज जो आने वाले उस कल में।
उनसे हीं बनता है जग ये वो हीं तो बसते हैं जग में,
जग के डग डग में शामिल हैं शामिल जग के रग रग में।

कंस आदि जो नरा धम थे कैसे क्षण में प्राण लिए,
जान रहा था दुर्योधन पर मन में था अभि मान लिए।
निज दर्प में पागल था उस क्षण क्या कहता था ज्ञान नही,
दुर्योधन ना कहता कुछ भी कहता था अभिमान कहीं।

गिरिधर में अतुलित शक्ति थी दुर्योधन ये जान रहा,
ज्ञात कृष्ण से लड़ने पर क्या पूतना का परिणाम रहा?
श्रीकृष्ण से जो भिड़ता था होता उसका त्राण नहीं ,
पर दुर्योधन पर मद भारी था लेता संज्ञान नहीं।

है तथ्य विदित ये क्रोध अगन उर में लेकर हीं जलता था ,
दुर्योधन के अव चेतन में सुविचार कब फलता था।
पर निज स्वार्थ सिद्धि को तत्तपर रहता कौरव कुमार,
वक्त पड़े तो कुटिल बुद्धि युक्त करता था व्यापार।

अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-5

June 4, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

ऐसे शक्ति पुंज कृष्ण जब शिशुपाल मस्तक हरते थे,
जितने सारे वीर सभा में थे सब चुप कुछ ना कहते थे।
राज सभा में द्रोण, भीष्म थे कर्ण तनय अंशु माली,
एक तथ्य था निर्विवादित श्याम श्रेष्ठ सर्व बल शाली।

वो व्याप्त है नभ में जल में चल में थल में भूतल में,
बीत गया जो पल आज जो आने वाले उस कल में।
उनसे हीं बनता है जग ये वो हीं तो बसते हैं जग में,
जग के डग डग में शामिल हैं शामिल जग के रग रग में।

कंस आदि जो नरा धम थे कैसे क्षण में प्राण लिए,
जान रहा था दुर्योधन पर मन में था अभि मान लिए।
निज दर्प में पागल था उस क्षण क्या कहता था ज्ञान नही,
दुर्योधन ना कहता कुछ भी कहता था अभिमान कहीं।

गिरिधर में अतुलित शक्ति थी दुर्योधन ये जान रहा,
ज्ञात कृष्ण से लड़ने पर क्या पूतना का परिणाम रहा?
श्रीकृष्ण से जो भिड़ता था होता उसका त्राण नहीं ,
पर दुर्योधन पर मद भारी था लेता संज्ञान नहीं।

है तथ्य विदित ये क्रोध अगन उर में लेकर हीं जलता था ,
दुर्योधन के अव चेतन में सुविचार कब फलता था।
पर निज स्वार्थ सिद्धि को तत्तपर रहता कौरव कुमार,
वक्त पड़े तो कुटिल बुद्धि युक्त करता था व्यापार।

अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-5

May 30, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

जब  कान्हा के होठों पे  मुरली  गैया  मुस्काती थीं,
गोपी सारी लाज वाज तज कर दौड़े आ जाती थीं।
किया  प्रेम  इतना  राधा  से कहलाये थे राधेश्याम,
पर भव  सागर तारण हेतू त्याग  चले थे राधे धाम।

पूतना , शकटासुर ,तृणावर्त असुर अति अभिचारी ,
कंस आदि  के  मर्दन कर्ता  कृष्ण अति बलशाली।
वो कान्हा थे योगि राज पर भोगी बनकर नृत्य करें,
जरासंध जब रण को तत्पर भागे रण से कृत्य रचे।

सारंग  धारी   कृष्ण  हरि  ने वत्सासुर संहार किया ,
बकासुर और अघासुर के प्राणों का व्यापार किया।
मात्र  तर्जनी  से हीं तो  गिरि धर ने गिरि उठाया था,
कभी देवाधि पति इंद्र   को घुटनों तले झुकाया था।

जब पापी  कुचक्र  रचे  तब  हीं  वो चक्र चलाते हैं,
कुटिल  दर्प सर्वत्र  फले  तब  दृष्टि  वक्र  उठाते हैं।
उरग जिनसे थर्र थर्र काँपे पर्वत जिनके हाथों नाचे,
इन्द्रदेव भी कंपित होते हैं नतमस्तक जिनके आगे।

एक  हाथ में चक्र हैं  जिनके मुरली मधुर बजाते हैं,
गोवर्धन  धारी डर  कर  भगने  का खेल दिखातें है।
जैसे  गज  शिशु से  कोई  डरने का  खेल रचाता है,
कारक बन कर कर्ता  का कारण से मेल कराता है।

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-4

May 23, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

जिस प्रकार अंगद ने रावण के पास जाकर अपने स्वामी मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम चन्द्र के संधि का प्रस्ताव प्रस्तुत किया था , ठीक वैसे हीं भगवान श्रीकृष्ण भी महाभारत युद्ध शुरू होने से पहले कौरव कुमार दुर्योधन के पास पांडवों की तरफ से शांति प्रस्ताव लेकर गए थे। एक दूत के रूप में अंगद और श्रीकृष्ण की भूमिका एक सी हीं प्रतीत होती है । परन्तु वस्तुत: श्रीकृष्ण और अंगद के व्यक्तित्व में जमीन और आसमान का फर्क है । श्रीराम और अंगद के बीच तो अधिपति और प्रतिनिधि का सम्बन्ध था । अंगद तो मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के संदेशवाहक मात्र थे । परन्तु महाभारत के परिप्रेक्ष्य में श्रीकृष्ण पांडवों के सखा , गुरु , स्वामी , पथ प्रदर्शक आदि सबकुछ थे । किस तरह का व्यक्तित्व दुर्योधन को समझाने हेतु प्रस्तुत हुआ था , इसके लिए कृष्ण के चरित्र और लीलाओं का वर्णन समीचीन होगा । कविता के इस भाग में कृष्ण का अवतरण और बाल सुलभ लीलाओं का वर्णन किया गया है । प्रस्तुत है दीर्घ कविता “दुर्योधन कब मिट पाया” का चतुर्थ भाग।

कार्य दूत का जो होता है अंगद ने अंजाम दिया ,
अपने स्वामी रामचंद्र के शक्ति का प्रमाण दिया।
कार्य दूत का वही कृष्ण ले दुर्योधन के पास गए,
जैसे कोई अर्णव उदधि खुद प्यासे अन्यास गए।

जब रावण ने अंगद को वानर जैसा उपहास किया,
तब कैसे वानर ने बल से रावण का परिहास किया।
ज्ञानी रावण के विवेक पर दुर्बुद्धि अति भारी थी,
दुर्योधन भी ज्ञान शून्य था सुबुद्धि मति मारी थी।

ऐसा न था श्री कृष्ण की शक्ति अजय का ज्ञान नहीं ,
अभिमानी था मुर्ख नहीं कि हरि से था अंजान नहीं।
कंस कहानी ज्ञात उसे भी मामा ने क्या काम किया,
शिशुओं का हन्ता पापी उसने कैसा दुष्काम किया।

जब पापों का संचय होता धर्म खड़ा होकर रोता था,
मामा कंस का जय होता सत्य पुण्य क्षय खोता था।
कृष्ण पक्ष के कृष्ण रात्रि में कृष्ण अति अँधियारे थे ,
तब विधर्मी कंस संहारक गिरिधर वहीं पधारे थे।

जग के तारण हार श्याम को माता कैसे बचाती थी ,
आँखों में काजल का टीका धर आशीष दिलाती थी।
और कान्हा भी लुकके छिपके माखन दही छुपाते थे ,
मिटटी को मुख में रखकर संपूर्ण ब्रह्मांड दिखाते थे।

कभी गोपी के वस्त्र चुराकर मर्यादा के पाठ पढ़ाए,
पांचाली के वस्त्र बढ़ाकर चीर हरण से उसे बचाए।
इस जग को रचने वाले कभी कहलाये थे माखनचोर,
कभी गोवर्धन पर्वत धारी कभी युद्ध तजते रणछोड़।

अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-4

May 23, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

जिस प्रकार अंगद ने रावण के पास जाकर अपने स्वामी मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम चन्द्र के संधि का प्रस्ताव प्रस्तुत किया था , ठीक वैसे हीं भगवान श्रीकृष्ण भी महाभारत युद्ध शुरू होने से पहले कौरव कुमार दुर्योधन के पास पांडवों की तरफ से शांति प्रस्ताव लेकर गए थे। एक दूत के रूप में अंगद और श्रीकृष्ण की भूमिका एक सी हीं प्रतीत होती है । परन्तु वस्तुत: श्रीकृष्ण और अंगद के व्यक्तित्व में जमीन और आसमान का फर्क है । श्रीराम और अंगद के बीच तो अधिपति और प्रतिनिधि का सम्बन्ध था । अंगद तो मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के संदेशवाहक मात्र थे । परन्तु महाभारत के परिप्रेक्ष्य में श्रीकृष्ण पांडवों के सखा , गुरु , स्वामी , पथ प्रदर्शक आदि सबकुछ थे । किस तरह का व्यक्तित्व दुर्योधन को समझाने हेतु प्रस्तुत हुआ था , इसके लिए कृष्ण के चरित्र और लीलाओं का वर्णन समीचीन होगा । कविता के इस भाग में कृष्ण का अवतरण और बाल सुलभ लीलाओं का वर्णन किया गया है । प्रस्तुत है दीर्घ कविता “दुर्योधन कब मिट पाया” का चतुर्थ भाग।

कार्य दूत का जो होता है अंगद ने अंजाम दिया ,
अपने स्वामी रामचंद्र के शक्ति का प्रमाण दिया।
कार्य दूत का वही कृष्ण ले दुर्योधन के पास गए,
जैसे कोई अर्णव उदधि खुद प्यासे अन्यास गए।

जब रावण ने अंगद को वानर जैसा उपहास किया,
तब कैसे वानर ने बल से रावण का परिहास किया।
ज्ञानी रावण के विवेक पर दुर्बुद्धि अति भारी थी,
दुर्योधन भी ज्ञान शून्य था सुबुद्धि मति मारी थी।

ऐसा न था श्री कृष्ण की शक्ति अजय का ज्ञान नहीं ,
अभिमानी था मुर्ख नहीं कि हरि से था अंजान नहीं।
कंस कहानी ज्ञात उसे भी मामा ने क्या काम किया,
शिशुओं का हन्ता पापी उसने कैसा दुष्काम किया।

जब पापों का संचय होता धर्म खड़ा होकर रोता था,
मामा कंस का जय होता सत्य पुण्य क्षय खोता था।
कृष्ण पक्ष के कृष्ण रात्रि में कृष्ण अति अँधियारे थे ,
तब विधर्मी कंस संहारक गिरिधर वहीं पधारे थे।

जग के तारण हार श्याम को माता कैसे बचाती थी ,
आँखों में काजल का टीका धर आशीष दिलाती थी।
और कान्हा भी लुकके छिपके माखन दही छुपाते थे ,
मिटटी को मुख में रखकर संपूर्ण ब्रह्मांड दिखाते थे।

कभी गोपी के वस्त्र चुराकर मर्यादा के पाठ पढ़ाए,
पांचाली के वस्त्र बढ़ाकर चीर हरण से उसे बचाए।
इस जग को रचने वाले कभी कहलाये थे माखनचोर,
कभी गोवर्धन पर्वत धारी कभी युद्ध तजते रणछोड़।

अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-3

May 19, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

रामायण में जिक्र आता है कि रावण के साथ युद्ध शुरू होने से पहले प्रभु श्रीराम ने उसके पास अपना दूत भेजा ताकि शांति स्थापित हो सके। प्रभु श्री राम ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि उन्हें ज्ञात था कि युद्ध विध्वंश हीं लाता है । वो जान रहे थे कि युद्ध में अनगिनत मानवों , वानरों , राक्षसों की जान जाने वाली थी । इसीलिए रावण के क्रूर और अहंकारी प्रवृत्ति के बारे में जानते हुए भी उन्होंने सर्वप्रथम शांति का प्रयास किया क्योंकि युद्ध हमेशा हीं अंतिम पर्याय होता है। शत्रु पक्ष पे मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए अक्सर एक मजबूत व्यक्तित्व को हीं दूत के रूप में भेजा जाता रहा है। प्रभु श्रीराम ने भी ऐसा हीं किया, दूत के रूप में भेजा भी तो किसको बालि के पुत्र अंगद को। ये वो ही बालि था जिसकी काँख में रावण 6 महीने तक रहा। कहने का तात्पर्य ये है कि शांति का प्रस्ताव लेकर कौन जाता है, ये बड़ा महत्वपूर्ण हो जाता है। प्रस्तुत है दीर्घ कविता “दुर्योधन कब मिट पाया” का तृतीय भाग।

उसके दु:साहस के समक्ष गन्धर्व यक्ष भी मांगे पानी,
मर्यादा सब धूल धूसरित ऐसा था दम्भी अभिमानी ?
संधि वार्ता के प्रति उत्तर में कैसा वो सन्देश दिया ?
दे डाल कृष्ण को कारागृह में उसने ये आदेश किया।

प्रभु राम की पत्नी का जिसने मनमानी हरण किया,
उस अज्ञानी साथ राम ने प्रथम शांति का वरण किया।
ज्ञात उन्हें था अभिमानी को मर्यादा का ज्ञान नहीं,
वध करना था न्याय युक्त बेहतर कोई इससे त्राण नहीं।

फिर भी मर्यादा प्रभु राम ने एक अवसर प्रदान किया,
रण तो होने को ही था पर अंतिम एक निदान दिया।
रावण भी दुर्योधन तुल्य हीं निरा मूर्ख था अभिमानी,
पर मर्यादा पुरुष राम थे निज के प्रज्ञा की हीं मानी।

था विदित राम को कि रण में भाग्य मनुज का सोता है,
नर जो भी लड़ते कटते है अम्बर शोणित भर रोता है।
इसी हेतु तो प्रभु राम ने अंतिम एक प्रयास किया,
सन्धि में था संशय किंतु किंचित एक कयास किया।

दूत बना के भेजा किस को रावण सम जो बलशाली,
वानर श्रेष्ठ वो अंगद जिसका पिता रहा वानर बालि।
महावानर बालि जिसकी क़दमों में रावण रहता था,
अंगद के पलने में जाने नित क्रीड़ा कर फलता था।

उसी बालि के पुत्र दूत बली अंगद को ये काम दिया,
पैर डिगा ना पाया रावण क्या अद्भुत पैगाम दिया।
दूत बली अंगद हो जिसका सोचो राजा क्या होगा,
पैर दूत का हिलता ना रावण रण में फिर क्या होगा?

अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

कोरोना  के  हाथों  हारे ईश्वर से क्या कहे बेचारे?

May 1, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

कोरोना महामारी के हाथों भारत में अनगिनत मौतें हो रही हैं। सत्ता पक्ष कौए की तरह और अधिक सत्ता पाने के लालच में इन भयंकर परिस्थितियों में भी चुनाव पे चुनाव कराती जा रही है तो विपक्ष गिद्ध की तरह मृतकों के संख्या की गिनती करने में हीं लगा हुआ है। इन कौओं और गिद्धों की प्रवृत्ति वाले लोगों के बीच मजदूर और श्रमिक पिसते चले जा रहे है। मजदूर दिवस केवल मनाने के लिए नहीं होता, अपितु मजदूरों की बेहतरी के निमित्त होता है । परन्तु आज के माहौल में ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मजदूर दिवस के अवसर पर इन कौओं और गिद्धों की तरह के अवसरवादी सोच रखने वाली राजनैतिक पार्टियों के बीच बदहाली बढ़ाने के लिए प्रतिस्पर्धा हो रही है। ये सारे अवसरवादी इस सुनहले अवसर को हाथ से जाने नहीं देना चाहते। मजदूर दिवस पर  आम जनता खासकर मज़दूरों और श्रमिकों की बदहाली पर प्रकाश डालती हुई कविता “कोरोना  के  हाथों  हारे ईश्वर से क्या कहे बेचारे?”

गाँव पहले हीं छोड़ चुके सब शहर हुआ बेगाना,
सोया शेर फिर उठ उठ आता कोरोना अनजाना,
पिछली बार हीं पैदल चल कर गर्दन टूट पड़ी सारी,
क्या फिर पैदल जाना होगा क्या फिर होगी लाचारी?

राशन भाषण आश्वासन मन को तो अच्छा लगता है,
छले गए कई बार फिर छलते वादा कच्चा लगता है।
तन टूटा है मन रूठा है पक्ष विपक्ष सब लड़ते है,
जो सत्ता में लाज बचाते प्रतिपक्ष जग हंसते हैं।

प्रतिपक्ष का काम नहीं केवल सत्ता पर चोट करें,
जनता भूखी मरती है कोई कुछ भी तो ओट करें। 
या गिद्ध बनकर बैठे रहना हीं है इनका काम यही,
या उल्लू दृष्टि को है संशय ना हो जाए निदान कहीं?

गिद्धों का मजदूर दिवस है कौए सब मुस्काते हैं,
कितने मरे है बाकी कितने गिनती करते जाते हैं।
लाशों के गिनने से केवल भला किसी का क्या होगा,
गिद्ध काक सम लोटेंगे उल्लू सम कोई खिला होगा।

जनता तो मृत सम जीती है बन्द करो दोषारोपण,
कुछ तो हो उपाय भला कुछ तो कम होअवशोषण।
घर से बेघर है पहले हीं  काल ग्रास के ये प्यारे। 
कोरोना  के  हाथों  हारे ईश्वर से क्या कहे बेचारे?

अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

जरा दिल को थाम के

April 30, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

कोरोना बीमारी की दूसरी लहर ने पूरे देश मे कहर बरपाने के साथ साथ भातीय तंत्र की विफलता को जग जाहिर कर दिया है। चाहे केंद्र सरकार हो या की राज्य सरकारें, सारी की सारी एक दूसरे के उपर दोषरोपण में व्यस्त है। जनता की जान से ज्यादा महत्वपूर्ण चुनाव प्रचार हो गया है। दवाई, टीका, बेड आदि की कमी पूरे देश मे खल रही है। प्रस्तुत है इन्ही कुव्यथाओं पर आक्षेप करती हुई कविता  “जरा दिल को थाम के”।

चुनाव   में  है   करना  प्रचार  जरूरी  ,
ऑक्सीजन की ना बातें ना बेड मंजूरी,
दवा मिले ना मिलता टीका आराम से ,  
बैठे हैं चुप चाप  जरा दिल को थाम के,
आ जाए ना चुपचाप कोरोना धड़ाम से।

खांसी किसी को आती तो ऐसा लगता है ,
यम का है कोई दूत घर पे  आ गरजता है ,
छींक का वो ही असर है  जो भूत नाम से ,  
बैठे हैं चुप चाप  जरा दिल को थाम के,
आ जाए ना चुपचाप कोरोना धड़ाम से।

हाँ हाँ अभी तो उनसे कल बात हुई थी,
इनसे भी तो परसो हीं मुलाकात हुई थी,
सिस्टम की बलि चढ़ गए थे बड़े काम के,
बैठे हैं चुप चाप  जरा दिल को थाम के,
आ जाए ना चुपचाप कोरोना धड़ाम से।

एम्बुलेंस की आवाज है दिन रात चल रही,
शमशान  में  चिताओं  की बाढ़ जल  रही,
सहमा हुआ सा मन है आज  राम नाम से,
बैठे हैं चुप चाप  जरा दिल को थाम के,
आ जाए ना चुपचाप कोरोना धड़ाम से।

भगवान अल्लाह गॉड सारे चुप खड़े हैं ,
बहुरुपिया  कोरोना  बड़े  रूप  धड़े  हैं ,
साईं बाबा रह गए हैं बस हीं नाम  के   ,
बैठे हैं चुप चाप  जरा दिल को थाम के,
आ जाए ना चुपचाप कोरोना धड़ाम से।

अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित 

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-1

April 26, 2021 in English Poetry

जब सत्ता का नशा किसी व्यक्ति छा जाता है तब उसे ऐसा लगने लगता है कि वो सौरमंडल के सूर्य की तरह पूरे विश्व का केंद्र है और पूरी दुनिया उसी के चारो ओर ठीक वैसे हीं चक्कर लगा रही है जैसे कि सौर मंडल के ग्रह जैसे कि पृथ्वी, मांगल, शुक्र, शनि इत्यादि सूर्य का चक्कर लगाते हैं। न केवल  वो  अपने  हर फैसले को सही मानता है अपितु उसे औरों पर थोपने की कोशिश भी करता है। नतीजा ये होता है कि उसे उचित और अनुचित का भान नही होता और अक्सर उससे अनुचित कर्म हीं प्रतिफलित होते हैं।कुछ इसी तरह की मनोवृत्ति का शिकार था दुर्योधन प्रस्तुत है महाभारत के इसी पात्र के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालती हुई कविता “दुर्योधन कब मिट पाया”  का  प्रथम भाग। 

रक्त से लथपथ शैल गात व शोणित सिंचित काया,
कुरुक्षेत्र की धरती  पर लेटा  एक  नर   मुरझाया।
तन  पे  चोट लगी थी उसकी  जंघा टूट पड़ी थी त्यूं ,
जैसे मृदु माटी की मटकी हो कोई फूट पड़ी थी ज्यूं।

भाग्य सबल जब मानव का कैसे करतब दिखलाता है ,
किचित जब दुर्भाग्य प्रबल तब क्या नर को हो जाता है।
कौन जानता था जिसकी आज्ञा से शस्त्र उठाते  थे ,
जब  वो चाहे  भीष्म द्रोण तरकस से वाण चलाते थे ।

सकल क्षेत्र ये भारत का जिसकी क़दमों में रहता था ,
भानुमति का मात्र सहारा  सौ भ्राता संग फलता था ।
जरासंध सहचर जिसका औ कर्ण मित्र हितकारी था ,
शकुनि मामा कूटनीति का चतुर चपल खिलाड़ी था।

जो अंधे पिता धृतराष्ट्र का किंचित एक सहारा था,
माता के उर में बसता नयनों का एक सितारा था।
इधर  उधर  हो जाता था जिसके कहने पर सिंहासन ,
जिसकी आज्ञा से लड़ने को आतुर रहता था दु:शासन।

गज जब भी चलता है वन में शक्ति अक्षय लेकर के तन में,
तब जो पौधे पड़ते  पग में धूल धूसरित होते क्षण में।
अहंकार की चर्बी जब आंखों पे फलित हो जाती है,
तब विवेक मर जाता है औ बुद्धि हरित  हो जाती है।

क्या धर्म है क्या न्याय है सही गलत का ज्ञान नहीं,
जो चाहे वो करता था क्या नीतियुक्त था भान नहीं।
ताकत के मद में पागल था वो दुर्योधन मतवाला,
ज्ञात नहीं था दुर्योधन को वो पीता विष का प्याला।

अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-2

April 26, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

है कि श्रीकृष्ण की अपरिमित शक्ति के सामने दुर्योधन कहीं नही टिकता फिर भी वो श्रीकृष्ण को कारागृह में डालने की बात सोच सका । ये घटना दुर्योधन के अति दु:साहसी चरित्र को परिलक्षित करती है । कविता के द्वितीय भाग में दुर्योधन के इसी दु:साहसी प्रवृति का चित्रण है। प्रस्तुत है कविता “दुर्योधन कब मिट पाया” का द्वितीय भाग।

था ज्ञात कृष्ण को समक्ष महिषी कोई बीन बजाता है,
विषधर को गरल त्याग का जब कोई पाठ पढ़ाता है।
तब जड़ बुद्धि   मूढ़ महिषी  कैसा कृत्य रचाती है, 
पगुराना सैरिभी को प्रियकर वैसा दृश्य दिखाती है।

विषधर का मद कालकूट में विष परिहार करेगा क्या?
अभिमानी का मान दर्प में निज का दम्भ तजेगा क्या?
भीषण रण जब होने को था अंतिम एक प्रयास किया,
सदबुद्धि जड़मति को आये शायद पर विश्वास किया।

उस क्षण जो भी नीतितुल्य था गिरिधर ने वो काम किया,
निज बाहों से जो था सम्भव वो सबकुछ इन्तेजाम किया।
ये बात सत्य है अटल तथ्य दुष्काम फलित जब होता है,
नर का ना उसपे जोर चले दुर्भाग्य त्वरित  तब होता है।

पर अकाल से कब डर कर हलधर निज धर्म भुला देता,
शुष्क पाषाण बंजर मिट्टी में श्रम कर शस्य खिला देता।
कृष्ण संधि   की बात लिए  जा पहुंचे थे हस्तिनापुर,
शांति फलित करने को तत्पर प्रेम प्यार के वो आतुर।

पर मृदु प्रेम की बातों को दुर्योधन समझा कमजोरी,
वो अभिमानी समझ लिया कोई तो होगी मज़बूरी।
वन के नियमों का आदि वो शांति धर्म को जाने कैसे?
जो पशुवत जीवन जीता वो  प्रेम  मर्म पहचाने कैसे?

दुर्योधन  सामर्थ्य प्रबल  प्राबल्य शक्ति  का  व्यापारी,
उसकी नजरों में शक्तिपुंज ही मात्र राज्य का अधिकारी।
दुर्योधन की दुर्बुद्धि ने कभी ऐसा भी अभिमान किया,
साक्षात नारायण हर लेगा सोचा  ऐसा  दुष्काम किया।

अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

करार

April 11, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

किसी की जीत या किसी की हार का बाजार शोक नहीं मनाता। एक व्यापारी का पतन दूसरे व्यापारी के उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है। सत्यनिष्ठा, ईमानदारी, प्रेम इत्यादि की बातें व्यापार में खोटे सिक्के की तरह हैं, जो मूल्यवान दिखाई तो पड़ती है , परन्तु होती हैं मूल्यहीन । अक्सर बेईमानी , धूर्त्तता, रिश्वतखोरी, दलाली और झूठ की राह पर चलने वाले बाजार में तरक्की का पाठ पढ़ाते हुए मिल जाएंगे। बाजार में मुनाफा से बढ़कर कोई मित्र नहीं और नुकसान से बुरा कोई शत्रु नहीं। हालाँकि बाजार के मूल्यों पर आधारित जीवन वालों का पतन भी बाजार के नियमों के अनुसार हीं होता है। ये ठीक वैसा हीं है जैसे कि जंगल के नियम के अनुसार जीवन व्यतित करनेवाले राजा बालि का अंत भी जंगल के कानून के अनुसार हीं हुआ। बाजार के व्यवहार अनुसार जीवन जीने वालों को इसके दुष्परिणामों के प्रति सचेत करती हुई व्ययंगात्मक कविता।

करार
बिखर रहा है कोई ये जान लो तो ठीक ,
यही तो वक़्त चोट दो औजार के साथ।
वक्त का क्या मौका ये आए न आए,
कि ढह चला है किला दरार के साथ।

छिपी हुई बारीकियां नेपथ्य में ले सीख ,
कि झूठ हीं फैलाना सत्याचार के साथ ।
औकात पे नजर रहे जज्बात बेअसर रहे ,
शतरंजी चाल बाजियाँ करार के साथ।

दास्ताने क़ुसूर भी बता के क्या मिलेगा,
गुनाह छिप हैं जातें अखबार के साथ।
नसीहत-ए-बाजार में आँसू बेजार हैं ,
कि दाम हर दुआ की बीमार के साथ।

चुप सी हीं होती हैं चीखती खामोशियाँ,
ये शोर का सलीका कारोबार के साथ।
ईमान के भी मशवरें हैं लेते हज्जाल से,
मजबूरियाँ भी कैसी लाचार के साथ।

झूठ के दलाल करे सच को हलाल हैं,
पूछो न क्या हुआ है खुद्दार के साथ।
तररकी का ज्ञान बांटे चोर खुल्ले आम,
कि चल रही है रोजी गद्दार के साथ।

दाग जो हैं पैसे से होते बेदाग आज ,
बिक रही है आबरू चीत्कार के साथ।
सच्ची जुबाँ की भी बोल क्या मोल क्या?
गिरवी न चाहे क्या क्या उधार के साथ।

आन में भी क्या है कि शान में भी क्या है,
ना जीत से है मतलब ना हार के साथ।
फायदा नुकसान की हीं बात जानता है,
यही कायदा कानून है करार के साथ।

सीख लो बारीकियाँ ये कायदा ये फायदा,
हँसकर भी क्या मिलेगा व्यापार के साथ।
बाज़ार में हो घर पे जमीर रख के आना,
खोटे है सिक्के सारे कारोबार के साथ।

नफे की खुमारी में तुम जो मदहोश आज,
कि छू रहो हो आसमां व्यापार के साथ ।
कोठरी-ए-काजल सफेदी क्या मांगना?
सोचो न क्या क्या होगा खरीददार के साथ।

काटते हो इससे कट जाओगे भी एक दिन,
देख धार बड़ी तेज इस हथियार से साथ।
मक्कार है बाजार ये ना माँ का ना बाप का ,
डूबोगे तब हंसेगा धिक्कार के साथ ।
अजय अमिताभ सुमन

पश्चाताप

April 3, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

अक्सर मंदिर के पुजारी व्यक्ति को जीवन के आसक्ति के प्रति पश्चताप का भाव रख कर ईश्वर से क्षमा प्रार्थी होने की सलाह देते हैं। इनके अनुसार यदि वासना के प्रति निरासक्त होकर ईश्वर से क्षमा याचना की जाए तो मरणोपरांत ऊर्ध्व गति प्राप्त होती है।  व्यक्ति डरकर दबी जुबान से क्षमा मांग तो लेता है परन्तु उसे अपनी अनगिनत  वासनाओं के अतृप्त रहने  का अफसोस होता है। वो पश्चाताप जो केवल जुबाँ से किया गया हो  क्या एक आत्मा के अध्यात्मिक उन्नति में सहायक हो सकता हैं?

तुम कहते हो करूँ पश्चताप,
कि जीवन के प्रति रहा आकर्षित ,
अनगिनत वासनाओं से आसक्ति की ,

मन के पीछे भागा , कभी तन के पीछे भागा ,
कभी कम की चिंता तो कभी धन की भक्ति की। 

करूँ पश्चाताप कि शक्ति के पीछे रहा आसक्त  ,
कभी अनिरा से दूरी , कभी  मदिरा की मज़बूरी  ,
कभी लोभ कभी भोग तो कभी मोह का वियोग ,
पर योग के प्रति विषय-रोध के प्रति रहा निरासक्त?

और मैं सोचता हूँ  पश्चाताप तो करूँ पर किसका ?
उन ईक्छाओं की जो कभी तृप्त  ना हो  सकी?
वो  चाहतें  जो मन में तो थी पर तन में खिल ना सकी?

हाँ हाँ इसका भी अफ़सोस  है मुझे ,
कि मिल ना सका मुझे वो अतुलित धन ,
वो आपार संपदा जिन्हें रचना था मुझे , करना था सृजन। 

और और भी वो बहुत सारी शक्तियां, वो असीम ताकत ,
जिन्हें हासिल करनी थी , जिनका करना था अर्जन। 

मगर अफ़सोस ये कहाँ आकर फंस गया?
कि सुनना था अपने तन की। 
मोक्ष की की बात तो तू अपने पास हीं रख ,
करने दे मुझे मेरे मन की। 

अजय अमिताभ सुमन

मिस्टर लेट लतीफ

March 27, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

हरेक ऑफिस में कुछ सहकर्मी मिल हीं जाएंगे जो समय पर आ नहीं सकते। इन्हें आप चाहे लाख समझाईये पर इनके पास कोई ना कोई बहाना हमेशा हीं मिल हीं जाएगा। यदि कोई बताने का प्रयास करे भी तो क्या, इनके कानों पर जूं नहीं रेंगती। लेट लतीफी इनके जीवन का अभिन्न हिस्सा होता है। तिस पर तुर्रा ये कि ये आपको हीं पाठ पढ़ाने लगते हैं । ऐसे हीं महानुभावों के चरण कमलों में आदरपूर्वक सादर नमन है ये कविता , मिस्टर लेट लतीफ़ ।

तुम आते हीं रहो देर से हम रोज हीं बतातें है,
चलो चलो हम अपनी अपनी आदतें दुहराते हैं।
लेट लतीफी तुझे प्रियकर नहीं समय पर आते हो,
मैं राही हूँ सही समय का नाहक हीं खिसियाते हो।

तुम कहते हो नित दिन नित दिन ये क्या ज्ञान बताता हूँ?
नही समय पर तुम आते हो कह क्यों शोर मचाता हूँ?
जाओ जिससे कहना सुनना चाहो बात बता देना,
इसपे कोई असर नही होगा ये ज्ञात करा देना।

सबको ज्ञात करा देना  कि ये ऐसा हीं वैसा है,
काम सभी तो कर हीं देता फिर क्यों हँसते कैसा है?
क्या खुजली होती रहती क्यों अंगुल करते रहते हो?
क्या सृष्टि  के सर्व नियंता तुम हीं दुनिया रचते हो?

भाई मेरे मेरे मित्र मुझको ना समझो आफत है,
तेरी आदत लेट से आना कहना मेरी आदत है।
देखो इन मुर्गो को ये तो नित दिन बाँग लगाएंगे,
जब लालिमा क्षितिज पार होगी ये टाँग अड़ाएंगे।

मुर्गे की इस आदत में कोई कसर नहीं बाकी होगा,
फ़िक्र नहीं कि तुझपे कोई असर नहीं बाकी होगा।
तुम गर मुर्दा तो मैं मुर्गा अपनी रस्म  निभाते है,
मुर्दों पे कोई असर नहीं फिर भी आवाज लगाते है।

मुर्गों का काम उठाना है वो प्रति दिन बांग लगाएंगे,
मुर्दों पे कोई असर नहीं होगा जिंदे  जग जाएंगे।
जिसका जो स्वभाव निरंतर वो हीं तो निभाते हैं,
चलो चलो हम अपनी अपनी आदतें दुहरातें हैं।

अजय अमिताभ सुमन

अंतर्द्वन्द्व

March 19, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

जीवन यापन के लिए बहुधा व्यक्ति को वो सब कुछ करना पड़ता है , जिसे उसकी आत्मा सही नहीं समझती, सही नहीं मानती । फिर भी भौतिक प्रगति की दौड़ में स्वयं के विरुद्ध अनैतिक कार्य करते हुए आर्थिक प्रगति प्राप्त करने हेतु अनेक प्रयत्न करता है और भौतिक समृद्धि प्राप्त भी कर लेता है , परन्तु उसकी आत्मा अशांत हो जाती है। इसका परिणाम स्वयं का स्वयम से विरोध , निज से निज का द्वंद्व।  विरोध यदि बाहर से हो तो व्यक्ति लड़ भी ले , परन्तु व्यक्ति का सामना उसकी आत्मा और अंतर्मन से हो तो कैसे शांति स्थापित हो ? मानव के मन और चेतना के अंतर्विरोध को रेखांकित करती हुई रचना ।  

दृढ़ निश्चयी अनिरुद्ध अड़ा है ना कोई  विरुद्ध खड़ा है।   
जग की नज़रों में काबिल पर चेतन अंतर रूद्ध डरा है।
घन तम गहन नियुद्ध पड़ा है चित्त किंचित अवरुद्ध बड़ा है।
अभिलाषा के श्यामल बादल  काटे क्या अनुरुद्ध पड़ा है।
स्वयं जाल ही निर्मित करता और स्वयं ही क्रुद्ध खड़ा है।
अजब द्वंद्व है दुविधा तेरी  मन चितवन निरुद्ध बड़ा है।
तबतक जगतक दौड़ लगाते जबतक मन सन्निरुद्ध पड़ा है।
किस कीमत पे जग हासिल है चेतन मन अबुद्ध अधरा है।
अरि दल होता किंचित हरते निज निज से उपरुद्ध अड़ा है।
किस शिकार का भक्षण श्रेयकर तू तूझसे प्रतिरुद्ध पड़ा है।
निज निश्चय पर संशय अतिशय मन से मन संरुद्ध लड़ा है।
मन चेतन संयोजन क्या  जब खुद से तेरा युद्ध पड़ा है।

अजय अमिताभ सुमन

आदमी का आदमी होना बड़ा दुश्वार है

February 13, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

सत्य का पालन करना श्रेयकर है। घमंडी होना, गुस्सा करना, दूसरे को नीचा दिखाना , ईर्ष्या करना आदि को निंदनीय माना  गया है। जबकि चापलूसी करना , आत्मप्रशंसा में मुग्ध रहना आदि को घृणित कहा जाता है। लेकिन जीवन में इन आदर्शों का पालन कितने लोग कर पाते हैं? कितने लोग ईमानदार, शांत, मृदुभाषी और विनम्र रह पाते हैं।  कितने लोग इंसान रह पाते हैं? बड़ा मुश्किल होता है , आदमी का आदमी बने रहना।

रोज उठकर सबेरे पेट के जुगाड़ में, 
क्या न क्या करता रहा है आदमी बाजार में।
सच का दमन पकड़ के घर से निकलता है जो,
झूठ की परिभाषाओं से गश खा जाता है वो।

औरों की बातें है झूठी औरों की बातों में खोट,
और मिलने पे सड़क पे छोड़े ना दस का भी नोट।
तो डोलते हुए जगत में डोलता इंसान है,
डिग रहा है आदमी कि डिग रहा ईमान हैं।

झूठ के बाज़ार में हैं  खुद हीं ललचाए हुए,
रूह में चाहत बड़ी है आग लहकाए हुए।
तो तन बदन में आग लेके चल रहा है आदमी,
आरजू की ख़ाक में भी जल रहा है आदमी।

टूटती हैं हसरतें जब रुठतें जब ख्वाब हैं,
आदमी में कुछ बचा जो  लुटती अज़ाब हैं।
इन दिक्कतों मुसीबतों में आदमी बन चाख हैं,
तिस पे ऐसी वैसी कैसी आदतें गुस्ताख़ है।

उलझनों में खुद उलझती ऐसी वैसी आदतें,
आदतों पे खुद हैं रोती कैसी कैसी आदतें।
जाने कैसी आदतों से अक्सर हीं लाचार है,
आदमी का आदमी होना बड़ा दुश्वार है।

अजय अमिताभ सुमन

मंजिल का अवसान नहीं

January 30, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

एक व्यक्ति के जीवन में उसकी ईक्क्षानुसार घटनाएँ प्रतिफलित नहीं होती , बल्कि घटनाओं को  प्रतिफलित करने के लिए प्रयास करने पड़ते हैं। समयानुसार झुकना पड़ता है । परिस्थिति के अनुसार  ढ़लना पड़ता है । उपाय के रास्ते अक्सर दृष्टिकोण के परिवर्तित होने पर दृष्टिगोचित होने लगते हैं। बस स्वयं को हर तरह के उपाय के लिए खुला रखना पड़ता है। प्रकृति का यही रहस्य है , अवसान के बाद उदय और श्रम के बाद विश्राम। 

इस सृष्टि में हर व्यक्ति को, आजादी अभिव्यक्ति की,
व्यक्ति का निजस्वार्थ फलित हो,नही चाह ये सृष्टि की।
जिस नदिया की नौका जाके,नदिया के हीं धार बहे ,
उस नौका को किधर फ़िक्र कि,कोई ना पतवार रहे?
लहरों से लड़ने भिड़ने में , उस नौका का सम्मान नहीं,
विजय मार्ग के टल जाने से, मंजिल का अवसान नहीं।

जिन्हें चाह है इस जीवन में,स्वर्णिम भोर उजाले  की,
उन  राहों पे स्वागत करते,घटा टोप अन्धियारे भी।
इन घटाटोप अंधियारों का,संज्ञान अति आवश्यक है,
गर तम से मन में घन व्याप्त हो,सारे श्रम निरर्थक है।
आड़ी तिरछी सी गलियों में, लुकछिप रहना त्राण नहीं,
भय के मन में फल जाने से ,भला लुप्त निज ज्ञान कहीं?

इस जीवन में आये हो तो,अरिदल के भी वाण चलेंगे,
जिह्वा से अग्नि  की वर्षा , वाणि  से अपमान फलेंगे।
आंखों में चिंगारी तो क्या, मन मे उनके विष गरल हो,
उनके जैसा ना बन जाना,भाव जगे वो देख सरल हो।
वक्त पड़े तो झुक  जाने में, खोता  क्या सम्मान कहीं?
निज-ह्रदय प्रेम से रहे आप्त,इससे बेहतर उत्थान नहीं।

अजय अमिताभ सुमन

प्रमाण

January 24, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

अनुभव  के अतिरिक्त कोई आधार नहीं ,
परमेश्वर   का   पथ   कोई  व्यापार  नहीं।
प्रभु में हीं जीवन कोई संज्ञान  क्या लेगा?
सागर में हीं मीन भला  प्रमाण क्या  देगा?

खग   जाने   कैसे  कोई आकाश  भला?
दीपक   जाने  क्या  है  ये  प्रकाश भला?
जहाँ  स्वांस   है  प्राणों  का  संचार  वहीं,
जहाँ  प्राण  है  जीवन  का आधार  वहीं।

ईश्वर   का   क्या  दोष  भला   प्रमाण में?
अभिमान सजा के तुम हीं हो अज्ञान में।
परमेश्वर   ना  छद्म   तथ्य  तेरे  हीं  प्राणी,
भ्रम का   है  आचार  पथ्य  तेरे अज्ञानी ।

कभी  कानों से सुनकर  ज्ञात नहीं  ईश्वर ,
कितना भी  पढ़  लो  प्राप्त ना  परमेश्वर।
कह कर प्रेम  की बात भला  बताए कैसे?
हुआ  नहीं  हो  ईश्क उसे समझाए कैसे?

परमेश्वर  में      तू    तुझी   में    परमेश्वर ,
पर  तू  हीं  ना  तत्तपर  नहीं कोई अवसर।
दिल  में  है  ना    प्रीत   कोई उदगार  कहीं,
अनुभव  के अतिरिक्त  कोई  आधार नहीं।

अजय अमिताभ सुमन

जात आदमी के

January 18, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

आसाँ   नहीं   समझना  हर  बात आदमी के,
कि  हँसने  पे  हो  जाते वारदात आदमी  के।
सीने   में  जल रहे है  अगन  दफ़न  दफ़न से ,
बुझे   हैं  ना   कफ़न  से अलात आदमी   के?

ईमां   नहीं   है जग   पे  ना खुद पे  है  भरोसा,
रुके  कहाँ   रुके  हैं  सवालात   आदमी  के?
दिन   में   हैं    बेचैनी  और रातों को  उलझन,
संभले    नहीं     संभलते   हयात  आदमी के।

दो   गज    जमीं      तक   के छोड़े ना अवसर,
ख्वाहिशें    बहुत     हैं  दिन  रात  आदमी  के।
बना  रहा था  कुछ भी जो काम कुछ  न आते,    
जब मौत आती मुश्किल  हालात आदमी  के।

खुदा   भी   इससे  हारा  इसे चाहिए जग सारा,
अजीब   सी  है फितरत  खयालात आदमी के।
वक्त   बदलने   पे   वक़्त  भी  तो    बदलता  है,
पर  एक   नहीं   बदलता  ये  जात  आदमी के।

अजय अमिताभ सुमन

सबकुछ ये सरकार खा गई

January 9, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

राशन   भाषण  का  आश्वासन  देकर कर  बेगार  खा गई।
रोजी रोटी लक्कड़ झक्कड़ खप्पड़ सब सरकार खा गई।
 
देश   हमारा   है    खतरे   में,   कह    जंजीर    लगाती   है।
बचे   हुए   थे  अब तक जितने, हौले से अधिकार खा गई।

खो खो  के घर  बार जब अपना , जनता  जोर  लगाती है।
सब्ज बाग से  सपने देकर , सबके  घर  परिवार  खा गई।

सब्ज  बाग  के  सपने    की   भी,  बात  नहीं  पूछो   भैया।
कहती  बारिश बहुत हुई है, सेतु, सड़क, किवाड़  खा  गई।

खबर उसी की शहर उसी के दवा उसी की  जहर उसी  के,
जफ़र उसी की असर बसर भी करके सब लाचार खा गई।

कौन  झूठ से  लेवे   पंगा , हक    वाले   सब   मुश्किल में।
सच में झोल बहुत हैं प्यारे ,नुक्कड़ और बाजार खा गई।

देखो  धुल  बहुत शासन   में , हड्डी लक्कड़  भी ना छोड़े।
फाईलों   में  दीमक  छाई  सब  के सब  मक्कार खा गई। 

जाए थाने  कौन सी साहब, जनता रपट लिखाए तो क्या?
सच की कीमत बहुत बड़ी है, सच खबर अखबार खा गई।

हाकिम जो कुछ भी कहता है,तूम तो पूँछ हिलाओ भाई,
हश्र  हुआ क्या खुद्दारों का ,कैसे  सब  सरकार  खा  गई।

रोजी  रोटी  लक्कड़  झक्कड़ खप्पड़ सब सरकार खा गई।
सचमुच सब सरकार खा गईं,सचमुच सब सरकार खा गईं।

अजय अमिताभ सुमन

2021

January 1, 2021 in हिन्दी-उर्दू कविता

अंधकार  का  जो साया था, 
तिमिर घनेरा जो छाया था,
निज निलयों में बंद पड़े  थे,
रोशन दीपक  मंद पड़े थे।

निज  श्वांस   पे पहरा  जारी,  
अंदर   हीं   रहना  लाचारी ,
साल  विगत था अत्याचारी,
दुख के हीं तो थे अधिकारी।

निराशा के बादल फल कर,
रखते  सबको घर के अंदर,
जाने  कौन लोक  से  आए,
घन घोर घटा अंधियारे साए।

कहते   राह  जरुरी  चलना ,
पर नर  हौले  हौले  चलना ,
वृथा नहीं हो जाए वसुधा ,
अवनि पे हीं तुझको फलना।

जीवन की नूतन परिभाषा ,
जग जीवन की नूतन भाषा ,
नर में जग में पूर्ण समन्वय ,
पूर्ण जगत हो ये अभिलाषा।    

नए  साल  का नए  जोश से,
स्वागत करता नए होश से,
हौले  मानव  बदल  रहा है,
विश्व  हमारा संभल  रहा है।

अजय अमिताभ सुमन

अभिलाष

December 27, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

अभिलाष

जीवन  के   मधु प्यास  हमारे,
छिपे किधर  प्रभु  पास हमारे?
सब कहते तुम व्याप्त मही हो,
पर मुझको क्यों प्राप्त नहीं हो?

नाना शोध करता रहता  हूँ,
फिर भी  विस्मय  में रहता हूँ,
इस जीवन को तुम धरते हो,
इस सृष्टि  को  तुम रचते हो।

कहते कण कण में बसते हो,
फिर क्यों मन बुद्धि हरते हो ?
सक्त हुआ मन निरासक्त पे,
अक्त रहे हर वक्त भक्त  पे ।

मन के प्यास के कारण तुम हो,
क्यों अज्ञात अकारण तुम हो?
न  तन  मन में त्रास बढाओ,
मेघ तुम्हीं हो प्यास बुझाओ।

इस चित्त के विश्वास  हमारे,
दूर   बड़े   हो   पास  हमारे।
जीवन   के  मधु  प्यास मारे,
किधर छिपे प्रभु पास हमारे?

अजय अमिताभ सुमन

गेहूँ के दाने

December 25, 2020 in हिन्दी-उर्दू कविता

गेहूँ       के   दाने    क्या   होते,
हल   हलधर  के परिचय देते,
देते    परिचय  रक्त   बहा  है ,
क्या हलधर का वक्त रहा है।

मौसम   कितना  सख्त रहा है ,
और हलधर कब पस्त रहा है,
स्वेदों के  कितने मोती बिखरे,
धार    कुदालों   के  हैं निखरे।

खेतों    ने  कई   वार  सहें  हैं,
छप्पड़  कितनी  बार ढ़हें  हैं,
धुंध   थपेड़ों   से   लड़   जाते ,
ढ़ह ढ़ह कर पर ये गढ़ जाते।

हार   नहीं   जीवन  से  माने ,
रार   यहीं   मरण   से   ठाने,
नहीं अपेक्षण भिक्षण का है,
हर डग पग पे रण हीं माँगे।

हलधर  दाने   सब  लड़ते हैं,
मौसम  पे  डटकर अढ़ते हैं,
जीर्ण  देह दाने भी क्षीण पर,
मिट्टी   में   जीवन   गढ़तें हैं।

बिखर  धरा पर जब उग  जाते ,
दाने     दुःख    सारे     हर जाते,
जब    दानों    से   उगते   मोती,
हलधर   के  सीने   की ज्योति।

शुष्क होठ की प्यास  बुझाते ,
हलधर    में    विश्वास  जगाते,
मरु   भूमि   के  तरुवर  जैसे,
गेहूँ       के     दाने    हैं   होते।

अजय अमिताभ सुमन

कैसे कहूँ है बेहतर , ये हिंदुस्तान हमारा

June 12, 2019 in हिन्दी-उर्दू कविता

कह रहे हो तुम ये ,
मैं भी करूँ ईशारा,
सारे जहां से अच्छा ,
हिन्दुस्तां हमारा।

ये ठीक भी बहुत है,
एथलिट सारे जागे ,
क्रिकेट में जीतते हैं,
हर गेम में है आगे।

अंतरिक्ष में उपग्रह
प्रति मान फल रहें है,
अरिदल पे नित दिन हीं
वाण चल रहें हैं,

विद्यालयों में बच्चे
मिड मील भी पा रहें है,
साइकिल भी मिलती है
सब गुनगुना रहे हैं।

हाँ ठीक कह रहे हो,
कि फौजें हमारी,
बेशक जीतती हैं,
हैं दुश्मनों पे भारी।

अब नेट मिल रहा है,
बड़ा सस्ता बाजार में,
फ्री है वाई-फाई ,
फ्री-सिम भी व्यवहार में।

पर होने से नेट भी
गरीबी मिटती कहीं?
बीमारों से समाने फ्री
सिम टिकती नहीं।

खेत में सूखा है और
तेज बहुत धूप है,
गाँव में मुसीबत अभी,
रोटी है , भूख है।

सरकारी हॉस्पिटलों में,
दौड़ के हीं ऐसे,
आधे तो मर रहें हैं,
इनको बचाए कैसे?

बढ़ रही है कीमत और
बढ़ रहे बीमार हैं,
बीमार करें छुट्टी तो
कट रही पगार हैं।

राशन हुआ है महंगा,
कंट्रोल घट रहा है,
बिजली हुई न सस्ती,
पेट्रोल चढ़ रहा है।

ट्यूशन फी है हाई,
उसको चुकाए कैसे?
इतनी सी नौकरी में,
रहिमन पढ़ाए कैसे?

दहेज़ के अगन में ,
महिलाएं मिट रही है ,
बाज़ार में सजी हैं ,
अबलाएँ बिक रहीं हैं।

क्या यही लिखा है ,
मेरे देश के करम में,
सिसकती रहे बेटी ,
शैतानों के हरम में ?

मैं वो ही तो चाहूँ ,
तेरे दिल ने जो पुकारा,
सारे जहाँ से अच्छा ,
हिन्दुस्तां हमारा।

पर अभी भी बेटी का
बाप है बेचारा ,
कैसे कहूँ है बेहतर ,
है देश ये हमारा?

अजय अमिताभ सुमन:
सर्वाधिकार सुरक्षित

खुद के सहारे बनो तुम

June 10, 2019 in हिन्दी-उर्दू कविता

मौजो से भिड़े हो ,
पतवारें बनो तुम,
खुद हीं अब खुद के,
सहारे बनो तुम।

किनारों पे चलना है ,
आसां बहुत पर,
गिर के सम्भलना है,
आसां बहुत पर,
डूबे हो दरिया जो,
मुश्किल हो बचना,
तो खुद हीं बाहों के,
सहारे बनो तुम,
मौजो से भिड़े हो ,
पतवारें बनो तुम।

जो चंदा बनोगे तो,
तारे भी होंगे,
औरों से चमकोगे,
सितारें भी होंगे,
सूरज सा दिन का जो,
राजा बन चाहो,
तो दिनकर के जैसे,
अंगारे बनो तुम,
मौजो से भिड़े हो,
पतवारें बनो तुम।

दिवस के राही,
रातों का क्या करना,
दिन के उजाले में,
तुमको है चढ़ना,
सूरजमुखी जैसी,
ख़्वाहिश जो तेरी
ऊल्लू सदृष ना,
अन्धियारे बनो तुम,
मौजो से भिड़े हो,
पतवारें बनो तुम।

अभिनय से कुछ भी,
ना हासिल है होता,
अनुनय से भी कोई,
काबिल क्या होता?
अरिदल को संधि में,
शक्ति तब दिखती,
जब संबल हाथों के,
तीक्ष्ण धारें बनों तुम,
मौजो से भिड़े हो,
पतवारें बनो तुम।

विपदा हो कैसी भी,
वो नर ना हारा,
जिसका निज बाहू हो,
किंचित सहारा ।
श्रम से हीं तो आखिर,
दुर्दिन भी हारा,
जो आलस को काटे,
तलवारें बनो तुम ।
मौजो से भिड़े हो ,
पतवारें बनो तुम।

खुद हीं अब खुद के,
सहारे बनो तुम,
मौजो से भिड़े हो,
पतवारें बनो तुम।

अजय अमिताभ सुमन:
सर्वाधिकार सुरक्षित

राष्ट्र का नेता कैसा हो?

April 29, 2019 in हिन्दी-उर्दू कविता

राष्ट्र का नेता कैसा हो?
जो रहें लिप्त घोटालों में,
जिनके चित बसे सवालों में,
जिह्वा नित रसे बवालों में,
दंगा झगड़ों का क्रेता हो?
क्या राष्ट्र का नेता ऐसा हो?

राष्ट्र का नेता कैसा हो?
जन गण का जिसको ध्यान नहीं,
दुख दीनों का संज्ञान नहीं,
निज थाती का अभिज्ञान नहीं,
अज्ञान हृदय में सेता हो,
क्या राष्ट्र का नेता ऐसा हो?

राष्ट्र का नेता कैसा हो?
जो अनसुनी करे फरियादें ,
करता रहे बस खाली वादें ,
हो नियत नेक ना इरादे ,
कि फ़कत मात्र अभिनेता हो,
क्या राष्ट्र का नेता ऐसा हो?

राष्ट्र का नेता कैसा हो?
निज परिवार की हीं सोचे,
जन के तन मन धन को नोंचे,
रचते रहे नित नए धोखे,
क्या कलियुग हो, क्या त्रेता हो,
क्या राष्ट्र का नेता ऐसा हो?

राष्ट्र का नेता कैसा हो?
जो अरिदल का सम्मान करें,
हो राष्ट्र भक्त अपमान करे,
औ जाति धर्म विषपान करे,
जन को विघटित कर देता हो,
क्या राष्ट्र का नेता ऐसा हो?

राष्ट्र का नेता कैसा हो?
चाहे कोई हो मज़बूरी,
जनता से बनी रहे दूरी,
वादें कभी भी ना हों पूरी,
पर वोट नोट से लेता हो,
क्या राष्ट्र का नेता ऐसा हो?

राष्ट्र का नेता कैसा हो?
ऐसों से देश बनेगा क्या?
ऐसों से देश बचेगा क्या?
कोई अब और कहेगा क्या?
जो राष्ट्र मर्म विक्रेता हो,
क्या राष्ट्र का नेता ऐसा हो?

अजय अमिताभ सुमन
सर्वाधिकार सुरक्षित

व्यापार

March 22, 2019 in हिन्दी-उर्दू कविता

दिल की जो बातें थीं सुनता था पहले,
सच ही में सच था जो कहता था पहले।
करने अब सच से खिलवाड़ आ गया,
लगता है उसको व्यापार आ गया।

कमाई की खातिर दबाता है सब को ,
गिरा कर औरों को उठता है खुद को।
कि जेहन में उसके जुगाड़ आ गया,
लगता है उसको व्यापार आ गया।

मुनाफे की बातें ही बातें जरूरी।
दिन में जरूरी , रातों को जरूरी।
देख वायदों में उसके करार आ गया,
लगता है उसको व्यापार आ गया।

मूल्यों सिद्धांतों की बातें हैं करता,
मूल्यों सिद्धांतों की बातों से डरता,
कथनी करनी में तकरार आ गया,
लगता है उसको व्यापार आ गया।

नहीं कोई ऐसा छला जिसेको जग में,
शामिल दिखावा हर डग, पग, रग में।
जब करने अपनों पे प्रहार आ गया,
लगता है उसको व्यापार आ गया।

पैसे की चिंता हीं उसको भगाती,
दिन में बेचैनी , रातों को जगाती।
दौलत पे हीं उसको प्यार आ गया,
लगता है उसको व्यापार आ गया।

अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

पुलवामा

March 14, 2019 in हिन्दी-उर्दू कविता

लकड़बग्घे से नहीं अपेक्षित प्रेम प्यार की भीख,
किसी मीन से कब लेते हो तुम अम्बर की सीख?
लाल मिर्च खाये तोता फिर भी जपता हरिनाम,
काँव-काँव हीं बोले कौआ कितना खाले आम।

डंक मारना हीं बिच्छू का होता निज स्वभाब,
विषदंत से हीं विषधर का होता कोई प्रभाव।
कहाँ कभी गीदड़ के सर तुम कभी चढ़ाते हार?
और नहीं तुम कर सकते हो कभी गिद्ध से प्यार?

जयचंदों की मिट्टी में हीं छुपा हुआ है घात,
और काम शकुनियों का करना होता प्रति घात।
फिर अरिदल को तुम क्यों देने चले प्रेम आशीष?
जहाँ जहाँ शिशुपाल छिपे हैं तुम काट दो शीश।

अजय अमिताभ सुमन:अजय अमिताभ सुमन

कविता बहती है

February 13, 2019 in हिन्दी-उर्दू कविता

कविता बहती है

कविता तो केवल व्यथा नहीं,
निष्ठुर, दारुण कोई कथा नहीं,
या कवि शामिल थोड़ा इसमें,
या तू भी थोड़ा, वृथा नहीं।
सच है कवि बहता कविता में,
बहती ज्यों धारा सरिता में,
पर जल पर नाव भी बहती है,
कविता तेरी भी चलती है।

कविता कवि की ही ना होती,
कवि की भावों पे ना चलती,
थोड़ा समाज भी चलता है,
दुख दीनों का भी फलता है।
जिसमें कोरी हीं गाथा हो,
स्वप्निल कोरी हीं आशा हो,
जिसको सच का भान नहीं,
वो कोरे शब्द हैं प्राण नहीं।

केवल करने से तुक बंदी,
चेहरे पे रखने से बिंदी,
कविता की मुरत ना फलती,
सुरत मन मुरत ना लगती।
जिसको तुम कहते हो कविता,
बेशक वो होती है सरिता,
इसको बेशक कवि गढ़ता है,
पर श्रोता भी तो बहता है।

बिना श्रोता के आन नहीं,
कवि कवि नहीं, संज्ञान नहीं,
जैसे कवि बहुत जरूरी है,
बिन श्रोता के ये अधूरी है।
कवि के प्राणों पे चलती है,
कविता श्रोता से फलती है,
कवि इनको शीश नवाता है,
कविता के भाग्य विधाता है।
कविता के जो निर्माता है,
कविता के ये निर्माता है।

अजय अमिताभ सुमन:
सर्वाधिकार सुरक्षित

दिल का पथिक

January 18, 2019 in ग़ज़ल

हालात जमाने की कुछ वक्त की नजाकत,
कैसे कैसे बहाने भूलों के वास्ते।
अपनों के वास्ते कभी सपनो के वास्ते,
बदलते रहे अपने उसूलों के रास्ते।
कि देख के जुनून हम वतनों की आज,
जो चमन को उजाड़े फूलों के वास्ते।
करते थे कल तक जो बातें अमन की,
निकल पड़े है सारे शूलों के रास्ते।
खाक छानता हूँ मैं अजनबी सा शहर में,
क्या मिला खुदा तेरी धूलों के वास्ते।
दिल का पथिक है अकेला”अमिताभ” आज,
नाहक हीं चल पड़ा है रसूलों के रास्ते।

अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

जय हो , जय हो नितीश तुम्हारी जय हो .

January 10, 2018 in हिन्दी-उर्दू कविता

जय हो , जय हो,
नितीश तुम्हारी जय हो।

जय हो एक नवल बिहार की ,
सुनियोजित विचार की,
और सशक्त सरकार की,
कि तेरा भाग्य उदय हो,
तेरी जय हो।

जाति पाँति पोषण के साधन
कहाँ होते ?
धर्मं आदि से पेट नहीं
भरा करते।

जाति पाँति की बात करेंगे जो,
मुँह की खायेंगें।
काम करेंगे वही यहाँ,
टिक पाएंगे।

स्वक्षता और विकास,
संकल्प सही तुम्हारा है।
शिक्षा और सुशासन चहुँ ओर ,
तुम्हारा नारा है।

हर गाँव नगर घर और डगर डगर,
हर रात दिन वर्ष और हर पहर।
नितीश तुम्हारा यही सही है एक विचार,
हो उर्जा का समुचित सुनियोजित संचार।

रात घनेरी बीती,
सबेरा आया है,
जन-गण मन में व्याप्त
नितीश का साया है।

गौतमबुद्ध की धरा
इस पावन संसार में,
लौट आया सम्मान
शब्द बिहार में।

हर गली गली में जोश
उल्लास अब आया है,
मदमस्त बाहुबली थे जो
मलीन अब काया है।

बच्चे जो भटके हुए थे
नशे और शराब से,
बच्चियाँ सहमी हुई जो
दहेज के आधात से।

तुम्हारे संकल्प का हीं
नीतीश ये परिणाम है,
नशामुक्त प्रदेश है अब
आशायुक्त हर शाम है।

प्रथा ये दहेज की भी
कब तक टिक पाएगी,
नीतीश तुम्हारा प्रण अडिग हैै
एक दिन ये मिट जाएगी।

विश्वास मुझे है ए नीतिश
भारत को सबक सिखाओगे,
विकास मंत्र है जनतंत्र की
तुम ये पाठ पढ़ाओगे।

है बात दिले “अमिताभ”
काश ये हो पाता,
भारत को भी एक नितीश
अगर मिल पाता।

फिर जाति पाँति करने वाले
मिट जायेंगे .
धर्मं आदि के जोंक कहाँ
टिक पाएंगे।

फिर भारत का परचम
चहुँ ओर लहराएगा,
आर्यावर्त का नाम
धरा पे छाएगा।

भारत को भी अब
इस नितीश की है तलाश,
सुधर नेता ही इस देश की
अन्तिम आश।

कुत्सित राजनीतिज्ञों का
“अमिताभ” क्षय हो,
भारत तेरी शक्ति बढे
आसिमित अक्षय हो।

ए राष्ट्र के प्रणेता
ए सुशासन कुमार,
कर रहे हम अभिनंदन
हो स्वीकार।

नितीश तुमको कोटि कोटि नमन
तुम अजय हो,
तेरी जय हो, तेरी जय हो,
नीतीश तुम्हारी जय हो।

अजय अमिताभ सुमन
सर्वाधिकार सुरक्षित

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