Azhar
वो खिड़की के जानिब अगर देखते है
June 28, 2025 in ग़ज़ल
वो खिड़की के जानिब अगर देखते है
हर एक बार मुझको मगर देखते है
जो कूचे से निकला हूँ कल परसो मै
वो दीदार को हर पहर देखते हैं
गरीबी में क्या है सिवा आरज़ू के
वो समझेंगे कैसे जो घर देखते है
निगाहें हैं उस पर, यक़ीं एक दिन के
मिलेगा तो कुछ उसका दर देखते है
इधर वो कभी या उधर देखते है
ज़माने में हरसू कहर देखते हैं
कभी उसके जानिब वो दीदार करते
कभी मुझको भी इक नज़र देखते हैं
तू कब तक रहेगा सितारों के बिच
तेरे आने की हम डगर देखते हैं
क़त्ल करने का उनका इरादा है क्या
न जाने वो क्यों इस क़दर देखते है
दिल को मुट्ठी, में मत रखना
June 28, 2025 in ग़ज़ल
जो उस के, महल में जाते हैं
उसे देख के, फिसल जाते हैं
हवा का रुख, जो बदलता है
सियासतदाँ, बदल जाते हैं
जो ठोकर, खाते रहते हैं
वही आख़िर, संभल जाते हैं
दिल को मुट्ठी, में मत रखना
ये हाथों से, निकल जाते हैं
माँ की दुआ है, साथ अगर
तो हादसे भी, टल जाते हैं
जिस तरह मुझ पे तोहमत लगा रही है वो
June 28, 2025 in ग़ज़ल
जिस तरह मुझ पे तोहमत लगा रही है वो
शायद मेरे किरदार से वाक़िफ़ नहीं है वो
झूठों के इस बाज़ार में मुंसिफ भी बैठ कर
मुझ से कहा के मैं ग़लत, और सही है वो
मैं ने बग़ावत कर दी है चाँद के लिए
उस को जाके बता दो जहाँ कहीं है वो
जल्वा गर है चाँद का तो मैं भी कम नहीं
कल या परसों सुना था के ये कह रही है वो
जिस ने सर-ए-बाज़ार मुझे ख़म कर दिया
जो ताज पहने बैठा है, हाँ यही है वो
उस के साथ चलने, का मसअला नहीं
June 28, 2025 in ग़ज़ल
उस के साथ चलने, का मसअला नहीं
ये बात और है के, अब हौसला नहीं
कुछ बात तो होगी, के उसने दगा दिया
उससे मुझे कोई, शिकवा गिला नहीं
सदियों गुज़र गए, कोशिशों के बावजूद
दामन में लगा दाग, अबतक धुला नहीं
ख़ाक छानता रहा, दिन रात मै मगर
आस्तीं का साँप, अब तलक मिला नहीं
मुंह फेर लिया उसने, इस क़दर अज़हर
फूल जो मुरझा गए, अबतक खिला नहीं
जिसको देख, डर गया कोई
June 28, 2025 in ग़ज़ल
जिसको देख, डर गया कोई
उससे इश्क, कर गया कोई
वो ग़मज़दा, हो के बैठे थे
उसका ग़म भी, हर गया कोई
लोग जिससे, किनारा करते थे
आज उसपे, मर गया कोई
शुक्र कीजे के, हिज्र के बाद
लौटकर के, घर गया कोई
आज मै में, डूब करके भी
अपने पैरो, पर गया कोई
मुस्कुरा के दिखाने, से क्या फ़ायदा
June 28, 2025 in ग़ज़ल
मुस्कुरा के दिखाने, से क्या फ़ायदा
दर्द ए दिल को छुपाने, से क्या फ़ायदा
उसने नज़रों से, नज़रों पे जो वार की
अब यूं नज़रे चुराने, से क्या फ़ायदा
तुमने ठुकरा दिया था, मुझे एक दिन
चाँद अब घर बुलाने, से क्या फायदा
ज़ख्म देकर मुझे, तुमने घायल किया
दिल से अब दिल मिलाने, से क्या फ़ायदा
इश्क ने कम किया जो, जहर का असर
अब ये पीने पिलाने, से क्या फ़ायदा
वक़्त का था तकाज़ा, मै उसका हुआ
दिल में अब तेरे आने, से क्या फ़ायदा
दिन ब दिन वक़्त यूं ही, निकलता गया
अब यूं नाख़ून चबाने से, क्या फ़ायदा
उसका आमद, इस पार है क्या
June 28, 2025 in ग़ज़ल
उसका आमद, इस पार है क्या,
क्या मेरा, इन्तेजार है क्या?
हर पल वो, रंग बदलता है,
गिरगिट का, रिश्तेदार है क्या
दिल ने दिल से, हामी भर दी,
क्या अब उसका, इनकार है क्या?
वो हिज्र के दिन, तो बीत गए
क्या अब भी वो, बीमार है क्या?
हर बार चमन, में कांटे मिले,
इस बार ये, पहली बार है क्या?
वो कलम से, वार करता है,
क्या सच में, पत्रकार है क्या?
सच बोलो तो, कांटे मिलते है,
ये बुझदिल की, सरकार है क्या?
तेरा उससे, इनकार है क्यों,
क्या वो इतना, बेकार है क्या?
हर मोड़ पे, झूठे मिलते है,
ये झूठों का, बाज़ार है क्या?
वो आजकल, क्यों है ख़ामोश,
क्या कोई अंदर, वार है क्या?
Kal raat chandani thi, mousam mein nami thi
June 20, 2016 in हिन्दी-उर्दू कविता
Kal raat chandani thi, mousam mein nami thi
halki si woh barsaat or barf jami thi
Per raas na aya, aster woh nazara
Mai tha, meri tanhaayi, bas teri kami thi
Ek koh e gham liye betha hoon
June 20, 2016 in हिन्दी-उर्दू कविता
Ek koh e gham liye betha hoon
Log kahte hain piye betha hoon
Koo e Jana me hui he jab se shikast
Tab se hothon ko siye betha hoon
Ghar me taare hazaar laaya hoon
June 20, 2016 in हिन्दी-उर्दू कविता
Ghar me taare hazaar laaya hoon
Chaand chhat pe utaar laaya hoon
Bohot roka samandar ne mujhe
Phir bhi kashti ko paar laaya hoon
Yeh zamana mujhe jeene nahi deta
June 20, 2016 in हिन्दी-उर्दू कविता
Yeh zamana mujhe jeene nahi deta
Or yeh mekhana mujhe marne nahi deta
ley ke koi khabar nhi aata
June 20, 2016 in हिन्दी-उर्दू कविता
ley ke koi khabar nhi aata
Ab to qaasid idhar nhi aata
Lot aany ka waadah karte hyn,
Par koi lot kr nhi aata
Kab se palkein bichay betha hoon,
Chand kyonkar nazar nahi aata
Apni hasti mita deta azhar,
Tuu agar Waqt per nahi aata
Mere naseeb me baqi zara gumaan bhi nahin.
June 20, 2016 in हिन्दी-उर्दू कविता
Mere naseeb me baqi zara gumaan bhi nahin.
Agar zameen nahi to mera aasmaan bhi nahin.