नालंदा की आपबीती दुहराता हूँ |
August 27, 2016 in हिन्दी-उर्दू कविता
मैं काल हूँ, नालंदा की आपबीती दुहराता हूँ |
ये जो धरती है यहाँ की, महाविहारा कहलाती थी |
अब भी मैं ये सोच रहा हूँ, क्यों भाई थी ‘बुद्ध’ को ये धरती,
जिसने इसका अलग नामकरण का विचार किया |
ये धरती बड़े- बड़े वंशों का उद्धार किया |
पर पता नहीं क्या बात ‘कुमारगुप्त’ के मन में आयी थी |
राजनीती रहस्य तो नहीं हो सकता , जो उसने नींव डाली थी,
एक छोटे से ज्ञान की ज्योति में इतना तेल डाला था,
लौह बढ़ रहे थे, पुरे विश्व को उजागर करने के लिए,
तभी एक दुस्साहसी का पलटने लगी काया,
चला तोड़ने श्री भद्र के अहसान की माया,
बख्तियार चला मशाल हाथ में लिए,
बुझाने उस विशाल ज्ञान के दिये |
काश मैं उल्टा चलकर, उसके काया पलटने का इंतजार कर लिया होता |
इस धरती का हर बच्चा, इसके छाया में पल- बढ़ रहा होता |
मैं बदलता हूँ, हर रीत बदलती है,
फिर से एक महापुरुष की आँखें, मरमरी जमीं पे जमी |
कलाम नाम था उनका, जिनके पुनः नींव से, वह फिर से थमी |
उठो, जागो और जोड़ो कुछ ईंट उसमे, कहीं सुख न जाये नींव की नमी |