बेटी पर कविता

नारी…..

नारी…..

ईश्वर की अनूठी रचना हूँ मै हाँ ! नारी हूँ मैं ……… कभी जन्मी कभी अजन्मी हूँ मैं , कभी ख़ुशी कभी मातम हूँ मैं . कभी छाँव कभी धूप हूँ मैं, कभी एक में अनेक रूप हूँ मैं. कभी बेटी बन महकती हूँ मैं, कभी बहन बन चहकती हूँ मैं . कभी साजन की मीत हूँ मैं , कभी मितवा की प्रीत हूँ मैं . कभी ममता की मूरत हूँ मैं , कभी अहिल्या,सीता की सूरत हूँ मैं . कभी मोम सी कोमल पिंघलती हूँ मैं, कभी चट्टान सी... »

Prasoon Joshi’s Powerful Poem For The Daughters

Prasoon Joshi’s Powerful Poem For The Daughters

शर्म आ रही है ना उस समाज को जिसने उसके जन्म पर खुल के जश्न नहीं मनाया शर्म आ रही है ना उस पिता को उसके होने पर जिसने एक दिया कम जलाया शर्म आ रही है ना उन रस्मों को उन रिवाजों को उन बेड़ियों को उन दरवाज़ों को शर्म आ रही है ना उन बुज़ुर्गों को जिन्होंने उसके अस्तित्व को सिर्फ़ अंधेरों से जोड़ा शर्म आ रही है ना उन दुपट्टों को उन लिबासों को जिन्होंने उसे अंदर से तोड़ा शर्म आ रही है ना स्कूलों को दफ़्त... »

बेटी बचाओ – बेटी पढाओ

उसके सिर्फ दो बेटियाँ थी दोनों सरकारी स्कूल मैं पढती थी अबकी उन्हें सिर्फ बेटा ही चाहिए था लेकिन फिर से बेटी हो गई अभी आधा घंटा ही जी पाई थी अल्लाह को प्यारी हो गई घर में खुशी का माहौल था जैसे कुछ हुआ हीं नहीं था दोनों बेटियाँ मां से पूछ रही थी माँ दादी ने गुड़िया को क्यों मारा क्या वे हमें भी मार डालेंगी दोनों बहनें सहम – सहम कर जीने लगी और ऊँची – ऊँची डिग्रियां लेकर बड़ी हो गई आज वो ... »

फरमाइश

फरमाइश

मांगे जब भी तब उस बेटी की हर हरमाइश् पूरी हो, ऐ खुदा काबिल बना दे, हर बाप को इतना के उसकी कभी जेब ना ढीली हो, उठा दे उन्गली बेटी जिस तरफ ज़माने में, हो पूरी हर ख्वाइश उसकीपर कभी बाप की नज़र ना नीची हो॥ Raahi (अंजाना) »

आज़ाद हिंद

आज़ाद हिंद

सम्पूर्ण ब्रहमण्ड भीतर विराजत  ! अनेक खंड , चंद्रमा तरेगन  !! सूर्य व अनेक उपागम् , ! किंतु मुख्य नॅव खण्डो  !!   मे पृथ्वी भूखंड ! अति मुख्य रही सदा   !! यहा पर , सप्त द्वीप ! जॅहा पर , उन समस्त !!   द्वीप मे प्रमुख रहा  ! भारत का द्वीप सदा !! यहाँ पर , भारत को ! नमाकन कर सोने की !!   चिड़िया ,हिंदोस्ताँ व भारत ! की उपाधि दे डाली !! भारत मेरा प्रतिभाशाली रहा ! पृथ्वी के आरंभ से  !!... »

बेटी को घर में आने दो

इस कलि को मुस्कुराने दो कोख से धरती की गोद में आने दो बिखेर देगी चारोंतरफ खुशियाँ खुल के तो इसे मुस्कुराने दो। बेटी को घरस में आने दो।>2 रोपित करो इसे अपने आँगन में इसकी नज़र-२ तेरा नजरिया बनेगी इसकी धड़कन-२ तेरी दुआ बनेगी इसकी साँस-२ तेरी महक बनेगी इसकी बात-२ तेरी चहक बनेगी इसकी कदम-२ तेरे चिन्ह बनेंगे इसके हाथ-२ तेरी पहचान बनेंगे इसे अपने आकार में ढल जाने दो। बेटी को…………... »

विदाई गीत

*एक विदाई गीत* हरे हरे कांच की चूड़ी पहन के, दुल्हन पी के संग चली है । पलकों में भर कर के आंसू, बेटी पिता से गले मिली है । फूट – फूट के बिलख रही वो, फूट – फूट के बिलख रही वो, बाबुल क्यों ये सजा मिली है, छोड़ चली क्यों घर आंगन कू, बचपन की जहाँ याद बसी है, बाबुल रोय समझाय रह्यो है बेटी ! जग की रीत यही है, राखियो ख्याल तू लाडो मेरी, माँ – बाबुल तेरे सबहि वही है नजर घुमा भइया को देखा भ... »

बिटिया

दुनिया का भी दस्तूर है जुदा, तू ही बता ये क्या है खुदा? लक्ष्मी-सरस्वती, हैं चाह सभी की, क्यों दुआ कहीं ना इक बेटी की ? सब चाहे सुन्दर जीवन संगिनी, फिर क्यों बेटी से मुह फेरे , लक्ष्मी रूपी बिटिया को छोड़, धन-धान्य को क्यों दुनिया हेरे | क्या बेटे ही हैं जो केवल, दुनिया में परचम लहरा पाते , ना होती बेटी जो इस जग में, तो लल्ला फिर तुम कहाँ से आते? वीरता की कथा में क्यों अक्सर, बेटों की कहानी कही जात... »

बेटी का हर रुप सुहाना

बेटी का हर रुप सुहाना

बेटी का हर रुप सुहाना, प्यार भरे हृदय का, ना कोई ठिकाना, ना कोई ठिकाना।। ममता का आँचल ओढे, हर रुप में पाया, नया तराना, नया तराना।। जीवन की हर कठिनाई को, हसते-हसते सह जाना, सीखा है ना जाने कहाँ से उसने, अपमान के हर खूँट को, मुस्कुराकर पीते जाना, मुस्कुराकर पीते जाना।। क्यों न हो फिर तकलीफ भंयकर, सीखा नहीं कभी टूटकर हारना, जमाने की जंजीरों में जकड़े हुये, सीखा है सिर्फ उसने, आगे-आगे बढ़ते जाना, आगे-... »

बचपन का खेल

Shakun Saxena उछाल उछाल कर पापा मुझे दिल्ली दिखाते थे, हंस हंस कर पापा को मैं खूब रिझाती थी, भरोसे का अटूट रिश्ता था हमारा, छूट कर हाथो से मैं फिर हाथो में आ जाती थी, आज पापा मुझको हाथों में उठा नहीं पाते, उछाल कर मुझको वो दिल्ली दिखा नहीं पाते, उछलकर देखती हूँ मैं खुद पर मुझे कोई दिल्ली नहीं दिखता, होटो पर हंसी का अब कोई गुव्वारा नहीं फूटता, सोंचती हूँ पापा मुझे कैसे उड़ाते थे, कैसे मेरी आँखों को ... »

|| दहेजी दानव ||

बेटा अपना अफसर है.. दफ्तर में बैठा करता है.. जी बंगला गाड़ी सबकुछ है.. पैसे भी ऐठा करता है.. पर क्या है दरअसल ऐसा है.. पैसे भी खूब लगाए हैं.. हाँ जी.. अच्छा कॉलेज सहित.. कोचिंग भी खूब कराए हैं.. प्लस थोड़ा एक्स्ट्रा खर्चा है.. हम पूरा बिल ले आए हैं.. टोटल करना तो भाग्यवान.. देखो तो कितना बनता है.. जी लगभग पच्चीस होता है.. बाकी तो माँ की ममता है.. जी एक अकेला लड़का है.. उसका कुछ एक्स्ट्रा जोड़ूँ क्या..... »

मुक्तक-मनहरण घनाक्षरी

मुक्तक छंद – वार्णिक (मनहरण घनाक्षरी) सामांत-आई पदांत- है ८८८७-१६-१५ पहले जो पढने में गदहे कहलाते थे उनकी भी दिखती आज नही परछाई है ! नवयुग के बच्चे देते एक भी जवाब नही पता नही चलता कैसी करते पढाई है !! लाज और लिहाज सब दूर हो गये सभी बाप के ही सामने में करते ढीठाई है ! कहत मतिहीन कवि डांट जो पिलाई तो बेटी ने भाग घर से नाक कटवाई है || पढते भी कैसे जब शासन प्रशासन ने बिना पढै पास करै बीणा उठाई ... »

परी

मिट्टी से गढ़ी है,  नन्ही सी परी है,  ना माँ की दुलारी, ना बाबा की प्यारी, ये सङकें ही घर है इसका , यहीं सारा जग है जिसका । ना गुङिया,मोटर गाङी,  ना बर्तन,कप-प्लेट,ना रेलगाङी,   कोई खिलौना नही खेलने को, नही कोई झूला झूलने को, बस है भूख और गरीबी, कोई और नही,बस यही दोनों इसके करीबी। ऊपर खुला आसमान,  नीचे गर्मी और थकान,  कभी सर्दी की रातों की ठिठुरन, कभी बरसात में बचता,बचाता भीगता बदन, सूरज,चंदा इसके... »

बेटी की अभिलाषा

आज भी मै बेटी हूँ तुम्हारी, बन पाई पर ना तुम्हारी दुलारी, हरदम तुम लोगों ने जाना पराई, कर दी जल्दी मेरी विदाई। जैसे थी तुम सब पर बोझ, मुझे भेजने का इंतज़ार था रोज़, मुझे नही था जाना और कहीं, रहना था तुम्हारे ही साथ यहीं। पर मेरी किसी ने एक ना मानी, कर ली तुम सबने अपनी मनमानी, भेज दिया मुझे देस पराया, क्या सच में तुमने ही था मुझको जाया? जा पहुँची मैं अनजाने घर, लेकर एक छुपा हुआ डर, कौन मुझे अपनायेग... »

पराई

हाँ हूँ मै पराई   लो कह दिया मैंने   खुद को ही पराई….       सबने जी दुखाया,   कहके मुझे पराया,   बाबा की बेटी बन,   बनके भाई की बहन,   निभाए मन से सारे बंधन,   फिर भी मुट्ठी भर अन्न   पीछे फेंक माँ के आँगन,   चुकाने पड़े  सारे क़र्ज़,   निभाए सारे जितने थे फ़र्ज़,   कर दी मेरी विदाई,   कह कह कर मुझे पराई……       आई पिया के देस,   बदला ठौर, बदला भेस,   तन मन सब वारा,   अपनाये नए  संस्क... »

खाकी – खद्दर पहने हुये , इंसान बिकने लगे

खाकी – खद्दर पहने हुये , इंसान बिकने लगे कोडियों में यहाँ लोगो के,ईमान बिकने लगे ।। कही मुर्दे तो,कही आज शमशान बिकने लगे, चदरों पे खुदा,पत्थरो में भगवान बिकने लगे ।। सब की सब इन सियासी लोगो की चाले है, कहीं पे हिन्दू तो ,कही मुस्लमान बिकने लगे ।। चिमनियों का धुँआ,अब आवाज लगाता नहीं, घर से मुफलिस के , अब सामान बिकने लगे ।। तितलियाँ सर पटक रोने लगी,उजड़े चमन पे कागजी फूलो के लिए , गुलदान बिकने ... »

आँगन में जो फुदक रही थी

आँगन में जो फुदक रही थी एक छोटी सी चिड़िया! दौड़ी उसे पकड़ने उसके पीछे छोटी बिटिया!! बोली मैंने आज पढ़ा है तू है दुर्लभ प्राणी! तुझे संजोना है हम सब को देकर दाना पानी !! गौरैया ने तनिक ठहर धीरे से पंख हिलाये भाव करुण से उस पक्षी की आँखो में आ छाये! बोली बिटिया तू तो जाने क्या तेरा दायित्व लेकिन तू ये समझ तेरा भी ख़तरे में अस्तित्व! कैसे तुमसे कहूँ तुझे है इतना नहीं पता मेरा संकट अगर प्रदूषण तेरा त... »

माँ मेरी

तुम्हारे हाथ का हर एक छाला, चुभा जाता है इस दिल में एक भाला, हर एक रेखा जो तुम्हारी पेशानी पर है, एक दास्तां बयां कर जाती किसी परेशानी की है, बता जाती है वो दर्द को,जो सहे तुमने, हमें लाने इस हसीन जहां में अपने। उंगलियाँ पकङ चलना सिखाया, मामा,दादा,बोल बोल देखो खूब बुलवाया, खाना खाना, नाचना गाना सब सीखे तुमसे, तंग किया,फिरकी की मानिंद घुमाया,फिर भी ना खीजीं हमसे, हर रोज़ नयी तैयारी थी, हम ही तो तुम... »

न्याय बीमार पड़ी है, कानून की आँख में पानी है

न्याय बीमार पड़ी है, कानून की आँख में पानी है

अत्याचार दिन ब दिन बढ़ रहे हैं भारत की बेटी पर। रो-रो कर चढ़ रही बिचारी एक-एक करके वेदी पर ।। भिलाई से लेकर दिल्ली तक प्रतिदिन नई कहानी है। किसने पाप किया है ये, किसकी ये मनमानी है।। गली-गली, बस्ती-बस्ती में निर्भया बलिदानी है। न्याय बीमार पड़ी है अब, कानून की आँख में पानी है।। स्कुल-कालेज, आफिस, घर,  सभी जगह पर खतरा है। मानवता तो अब मर रही है सड़को पर सन्नाटा पसरा है।। कभी-कभी मर्दाना पुलिस औरतों... »

desh

ब्रह्मा-ऋषि-मुनि-चरक का तो ये देश हो सकता नहीं ,, क्यूँ बताते हो डॉक्टर पेट में बेटी है बेटा  नहीं ..!! »

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