बेटी है लक्ष्मी का रुप,
मिलतीं है सौभाग्य से,
घर का आंगन खिल जाता है,
उसकी पायल की झन्कार से।
बेटी ही तो मां बनकर,
हमको देती नया जनम,
सम्मान करें हर बेटी का,
यह है हर मानव का धरम,
जनम न दोगे बेटी को तो,
संसार ये रुक जाएगा,
बिन बेटी के, बेटे वालो,
बेटा न हो पाएगा।
Tag: बेटी पर कविता
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बेटी से सौभाग्य
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बेटी घर की रौनक होती है
बेटी घर की रौनक होती है
बाप के दिल की खनक होती है
माँ के अरमानों की महक होती है
फिर भी उसको नकारा जाता है
भेदभाव का पुतला उसे बनाया जाता है
आओ इस रीत को बदलते है
एक बार फिर उसका स्वागत करते है -
माँ
तुम शान थी मेरी ,
तुम मान थी मेरी ,
तुम अभिमान थी मेरी ,
इस दुःख भरी दुनिया में ,खुशियों की पहचान थी मेरी !
जब इस दुनिया में आयी ,पहचान कराया माँ तमने ,
परिवार में बेटो के चाह में पागल ,
पर मैं बेटो से कम नहीं यह स्थान दिलाया तमने !
बचपन से बेटो बेटियों की भेद भाव की सीडी देख बड़ी हुई ,
पर तुम हर सीडी के बिच खड़ी हुई ,
मेरी बेटी बेटो से कम नहीं इस बात पे तुम अड़ी रही !
आज भी याद है माँ स्कूल का वो पहला दिन
कैसे कटे थे हर घड़ी माँ तेरे बिन !
उस कड़कती धूप में , वो बरसती सावन में
माँ तमने मेरा साथ दिया हर उस उत्सव पवन में !
चाँद सितारों से हस्ती खेलती वो गलिया,
कितनी प्यारी थी ना माँ हमारी वो दुनिया !
कैसे गुज़रे वो हसीन से पल ,
आज लगता है बचपन तो था कल !
माँ की बिटिया आज सायानी हो गयी ,
छोड़ अपना घर किसी की बहुरानी हो गयी !
आज समझ आया कैसे कर लेती थी माँ इतना काम ,
घर , आंगन की मालकिन पाती जग का सम्मान !
हर पथ पे साथ दिया माँ तमने मेरा ,
फिर क्यों जा रही छोड़ साथ मेरा !
फिर क्यों आ रही माँ हर बात याद तेरी ,
वो प्यारी मुश्कान तेरी, वो बिटया रानी कहना मेरी!
लगता है उस खुदा की प्यारी हो माँ ,
जिसने इतनी जल्दी बुला लिया तम्हे आसमां !
उस रब से मेरी है ये दुआएँ ,
मेरी माँ की झोली में खुशिया ही सदा बरसाए !
भूल नहीं सकती माँ तेरे करम को जब तक हु ,पूजा करुँगी तेरी चरण को !
ये खुदा एक छोटी सी मेरी है तमन्ना ,
जब ,जब दुनिया में आउ उसकी आखो से ही देखु जमाना !…………..सौंदर्य निधि ……………………
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यादें
बेवजह, बेसबब सी खुशी जाने क्यों थीं?
चुपके से यादें मेरे दिल में समायीं थीं,
अकेले नहीं, काफ़िला संग लाईं थीं,
मेरे साथ दोस्ती निभाने जो आईं थीं।दबे पाँव गुपचुप, न आहट ही की कोई,
कनखियों से देखा, फिर नज़रें मिलाईं थीं।
मेरा काम रोका, हर उलझन को टोका,
मेरे साथ वक्त बिताने जो आईं थीं।भूले हुए किस्से, कुछ टुकड़े, कुछ हिस्से
यहाँ से, वहाँ से बटोर के ले आईं थीं।
हल्की सी मुस्कान को हँसी में बदल गईं
मेरे साथ ठहाके लगाने जो आईं थीं।वो बातों का कारवाँ चला तो थमा नहीं;
गुज़रे कल को आज से मिलाने जो आईं थीं।
बेटी से माँ तक के लम्बे सफ़र में
छोटी छोटी दूरियाँ इन्होंनें मिटाईं थीं। -
बहाना
उसको समझना बड़ा मुश्किल होने लगा,
कोई भी बहाना न उस पर चलने लगा,
छोटी से न जाने कब बड़ी हुई मेरी बेटी,
के अब चिंता में ये बाप हर दम डरने लगा।।
राही (अंजाना) -
मेरी बेटी
मेरी शान है बेटी
अभिमान है बेटीहर मुश्किल में
साथ है बेटी-विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)-
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बेटी
पायल की खनक रुनझुन
सुखद एहसास करती हैआंगन में बेटी जब
छन छन करती आती है-विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)-
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बहु
उस पल को तो आना ही था,
तुझको विदा हो जाना ही था,
ये रीती रिवाजों की ज़ंज़ीर थी,
जिसमे तुझे बन्ध जाना ही था,
बेटी रही तू मेरी जान से प्यारी,
तुझको बहु बन जाना ही था।।
राही (अंजाना) -
अजन्मी बेटी की पुकार
माँ मुझे भी इस दुनिया में ले आओ न
इस जग की लीला मुझे भी दिखलाओ न
खुले आसमान के नीचे मुझको घुमाओ न
अपनी ममतामई गोद में खिलाओ न
पढ़ा लिखा कर मुझे भी अफसर बनाओ न
गर्व से करूंगी नाम रोशन आप सबका माँ
मान और सम्मान सब दिलवाऊँगी माँ
पापा का भी हाथ मैं बटाऊँगी माँ
न मारो मुझको यूं तोड़ कर माँ
मौका तो दो कुछ कर गुजरने का माँ।। -

चाहिए सब कुछ जुबाएँ ना साथ देती ।।
सब कुछ चाहिए जुबाएँ ना साथ देती,
जब आती है रिश्ते शादी की जुबाएँ पर मिठास होती,
देख अच्छे से ऐसी — वैसी बात होती–
चाहिए सब कुछ जुबाएँ ना साथ होती।
बात बन जाती तब होती बात समाधी की तब लम्बी–लम्बी बात होती,
चाहिए सब कुछ जुबाएँ ना साथ होती,
पहले बार मे लेने देने की बात नही होती, दुसरे बार मे फरमाइस होती,
चाहिए सब कुछ जुबाएँ ना साथ देती।।
आ जाता जब दिन नजदीक शादी की पड़ोसी का धर भरा देखकर फरमाइस हजार होती,
सब कुछ चाहिए जुबाएँ ना साथ होती,
फिर होती औकाद की बात,
फिर इस तरह की बात होती अभी ना मिलेगा तब कब मिलेगा ऐसी ऐसी बात होती।
चाहिए सब कुछ जुबाएँ ना साथ होती,
जब कुछ कमी रह जाती तो ऱिश्ते मे खट्टास होती,
चाहिए सब कुछ जुबाएँ ना साथ होती,
क्या फायदा ऐसे चुप्पी का खोल कर बोल दो ना मेरा बेटा बिना तौले बेच नही सकते,
हर चीज तुम्हे मिल जाएगा तुझे खुल के बोल दो ना जो बेटी दे सकती वो अपना वस्ती भी बेचकर तुम्हारे बेटे को खरीद सकता।
चाहिए सब कुछ जुबाएँ ना साथ होती।।
ज्योति
मो न० 9123155481 -
मृत्योपरांत स्मरण
शीर्षक – मृत्योपरांत स्मरण
(एक बेटी के भाव अपने पिता की मृत्यु पर )जिसने हाथ पकड़कर चलना सिखाया
आज साथ छोड़ कर जा रहा है वो…गिरकर सम्भलना सिखाया जिसने
आज फिर उठने से कतरा रहा है वोजिसने हर एक को बनाया
आज टूटे जा रहा है वोठहरना सिखाया जिसने
आज चले जा रहा है वोपढ़ लेता हैं जो मन की बात को
आज ज़ुबा से लफ्ज़ बयां ना कर पा रहा हैं वोजिसने चेहरे से ना झलकने दिया गम कभी
आज आँसुओ की बारिश में भिगा रहा है वोमन के कल्पित भावों को सुनहरा कहा जिसने
इसे भरम बता रहा है वोजिसने हिफाज़त की हैं मेरी रखवाला बनकर
आज किस रब के हवाले
मुझे छोड़कर जा रहा हैं वो ।राजनंदिनी रावत
ब्यावर,राजस्थान -
केवल बेटी ही नही, वेटे भी घर छोड़ जाते।
केवल बेटी ही नही,
बेटे भी घर जाते।
दो जुम के रोटी के लिए अपना घर– परिवार छोड़ जाते।
जो आज तक पला बाप के हाथ के छाये मे,
आज वो दुसरे शहर मे भुखे पेट सो जाते,
जब पत्नी पुछती कब आओगे लौटकर अपने शहर मे,
तो कुछ बहाना बनाकर उसे समझा देते।
केवल बेटी ही नही बेटे भी घर छोड़ जाते।
जो दिन रात करते थे ,मनमानी आज वो आँसु पी कर सो जाते ।
दो जुम की रोटी के लिए अपनो का साथ छोड़ जाते,
केवल बेटी ही नही बेटे भी घर छोड़ जाते।
जो मेज पर खाना खाते ,महलो पर सोया करते,
आज वो जमीन पर ही सो जाते,
केवल बेटी ही नही—–
जो नखरा हजार करते खाने मे,
आज वो आधे पेट खा कर सो जाते।
जो कभी अपने रूम मे किसी को सोने नही देते—
आज वो दुसरे शहर मे एक ही रूम मे,एक ही बिस्तर पर दो चार सो जाते।
केवल बेटी ही नही बेटे भी घर छोड़ जाते,
दो जुम की रोटी के लिए अपना घर परिवार छोड़ जाते।ज्योति
मो न० 9123155481 -
बेटी
आँखों ही आँखों में जाने कब बड़ी हो जाती है
बिन कुछ कहे सब कुछ समझ जाती है
जो करती थी कल तक चीज़ों के लिए ज़िद
आज वो अपनी इच्छाओं को दबा जाती है
अब कुछ भी न कहना पड़ता है उससे
सब कुछ वो झट से कर जाती है
एक गिलास पानी का भी न उठाने वाली
आज पूरे घर को भोजन पकाती है
कभी भी कहीं भी बैग उठा कर चल देने वाली
आज वो अपना हर कदम सोंच समझ कर बाहर निकालती है।। -

ताल्लुक संस्कृति से अपना वो खुल के दिखाती है,
ताल्लुक संस्कृति से अपना वो खुल के दिखाती है,
बेटी इस घर की जब गुड़िया को भी दुप्पट्टा उढ़ाती है।।
राही (अंजाना)
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जवाब…
जवाब…
बस देती ही रही हूं जवाब…घर जाने से लेकर
घर आने का जवाब…खाने से लेकर
खाना बनाने का जवाब…बस देती ही रही हूं जवाब…
चित्र से लेकर
चरित्र का जवाब…
सीता से लेकर द्रौपदी तक
बस देती ही रही हूं जवाब…समर्पण में दर्पण देखने का समय ना मिला मुझे
मगर देती रही मैं सबको जवाब…कभी उद्दंड
कभी स्वार्थी
कभी चरित्र हीन बताया…थोड़ा अपने लिये जी
क्या लिया
अपनों को भी रास ना आया…बेटी से पत्नी
पत्नी से बहू
बहू से माँ बन गयी…नहीं खत्म हूवे सवाल
बस देती ही रही मैं जवाब…आरंभ से लेकर अंत तक
बस देती ही रही मैं जवाब… -
भारत के रक्षक
इतिहास है आज भी जिस पर मौन,
वह है आखिर कौन, वह है आखिर कौन?
जो लड़ता रहा हर समय किसी के लिए,
और मरता रहा किसी के लिए|
रहता है वो सबसे दूर,
देश के प्यार में है वो मजबूर|
दो देशों की ‘नेतागिरी’,
जिसमे है अब सेना ‘गिरी’|
जिसकी माँ करती उसके लिए हमेशा इंतज़ार|
बेटी कहती है बार बार,लगता है हो गये साल हज़ार आपका करे दीदार|
न जाने क्यों बटा है ये जहां,
जिसमे ली है लोगों ने पनाह|
हर देश की है अपनी सरहद,
पर एक माँ की ममता की कैसी हद?
कहते हैं अगर करोगे कोई रहमत,
तो मिलेगी दुनिया की हर खुशामत,
तो क्या रहमत किसी की जान बचाना नहीं होता?
या देश का सम्मान बचाना नहीं होता?
अगर होता है तो ऐ खुदा,
क्यूँ हो जाते हैं वो जुदा?
जो करते है अपनी जान कुर्बान,
बचाने इस देश का सम्मान|
माना खुदा रहमत से मिलता है स्वर्ग,
पर कौन ख़त्म करेगा एक माँ की आँखों का दर्द|
मिल जाता है उन्हें हर बड़ा सम्मान,
पर खो जाता है एक बेटी की ज़िन्दगी से बाप का नाम|
फिर भी जाते है सिपाही,भले ही दे दें अपनी जान|
इसीलिए तो कहते है अपना भारत महान| -
भारत के रक्षक
इतिहास है आज भी जिस पर मौन,
वह है आखिर कौन, वह है आखिर कौन?
जो लड़ता रहा हर समय किसी के लिए,
और मरता रहा किसी के लिए|
रहता है वो सबसे दूर,
देश के प्यार में है वो मजबूर|
दो देशों की ‘नेतागिरी’,
जिसमे है अब सेना ‘गिरी’|
जिसकी माँ करती उसके लिए हमेशा इंतज़ार|
बेटी कहती है बार बार,लगता है हो गये साल हज़ार आपका करे दीदार|
न जाने क्यों बटा है ये जहां,
जिसमे ली है लोगों ने पनाह|
हर देश की है अपनी सरहद,
पर एक माँ की ममता की कैसी हद?
कहते हैं अगर करोगे कोई रहमत,
तो मिलेगी दुनिया की हर खुशामत,
तो क्या रहमत किसी की जान बचाना नहीं होता?
या देश का सम्मान बचाना नहीं होता?
अगर होता है तो ऐ खुदा,
क्यूँ हो जाते हैं वो जुदा?
जो करते है अपनी जान कुर्बान,
बचाने इस देश का सम्मान|
माना खुदा रहमत से मिलता है स्वर्ग,
पर कौन ख़त्म करेगा एक माँ की आँखों का दर्द|
मिल जाता है उन्हें हर बड़ा सम्मान,
पर खो जाता है एक बेटी की ज़िन्दगी से बाप का नाम|
फिर भी जाते है सिपाही,भले ही दे दें अपनी जान|
इसीलिए तो कहते है अपना भारत महान| -
जब मैं तुम्हे लिखने चली
जमाने में रहे पर जमाने को खबर न थी
ढिंढोरे की तुम्हारी आदत न थी
अच्छे कामों का लेखा तुम्हारा व्यर्थ ही रह गया
हमसे साथ तुम्हारा अनकहा सा कह गया
जीतना ही सिखाया हारने की मन में न लाने दी
तो क्यों एक पल भी जीने की मन में न आने दी
हिम्मत बांधी सबको और खुद ही खो दी
दूर कर ली खुदा ने हमसे माँ कि गोदी
दिल था तुम्हारा या फूलों का गहना
अब जुदाई को तुमसे सदा ही सहना
रोता रहा दिल आँखों ने साथ न दिया
फैसले के खुदा ने घर सूना कर दिया
बड़ा अनमोल है यह रिश्ता तुम संग गहराया यह रिश्ता
जब पलकें पलकों से मिली दिल ने तेरी तस्वीर दिखाई
आँखे खोली जब हर जगह माँ तू ही नजर आई
किस्मत की लकिरों ने इक पल मुझे मिटा दिया
पर इसने जीवन में संभलना सिखा दिया
नयन नीर की अविरल धारा बह निकली
आज जब माँ मैं तुम्हे लिखने चली।।
सर से जो तेरा साया उठा माँ रोने से न बच पाई
साथ छोड़ दिया हम सबका तूने दे कर के तन्हाई
जब याद आई तेरी माँ दिल मेरा रोने लगा
शरीर मेरा आत्मा से साथ खोने लगा
याद में तेरी माँ जीना जीना ही क्या
बिन माँ के जो पला वो बचपना ही क्या
ढाँढस बाँधी सबने सहायता के हाथ बढादिए
बिन माँ के बचपने में हम बदनसीब ही जिये
एक रोज तुने कहा था के साथ कभी न छोड़ेगी
पर पता ना था के तू इतना जल्दी वादा तोड़ेगी
आँखो से मोतीयों की माला बह निकली
आज जब माँ मैं तुम्हे लिखने चली।।
सोचा न था इस कद्र जीवन बदलेगा
हमारे साथ खुदा इस कदर खेल खेलेगा
आशा की किरण हमारी न जाने कहाँ खो गई
दिया जलाकर तू न जाने कहाँ चली गई
तेरी तस्वीर देखूं जब भी मैं इक पल तू सामने आ जाती है
तेरी मुझसे कही एक एक बात फिर याद आती है
तेरी पायल की आवाज कानों में गूंजने लग जाती
जब मैं तेरे गहनों को हूं हाथ लगाती
हॉस्पिटल से माँ को है कब लाना
मुश्किल था माँ ये किटु को समझाना
कोशिश रहती कि किटू को तेरी याद न आए
पर बेटी के दिल से माँ को कोई कैसे निकाल पाए
कुलदीपक की चाह में चिराग ही बुझ गया
सपना साथ रहने का तुम्हारे अधूरा ही रह गया
अश्कों की धारा फिर बह निकली
आज जब माँ मैं तुम्हे लिखने चली।।
BY-
मानसी राठौड़ D/O रविन्द्र सिंह -
Ghazal
मुहँ लटकाए आख़िर तू क्यो बैठा है
इस दुनिया में जो कुछ भी है पैसा हैदुख देता है घर में बेटी का होना
चोर -उचक्का हो लड़का पर अच्छा हैकुछ भी हो औरत की दुश्मन है औरत
सच तो सच है बेशक थोड़ा कड़वा हैसबकी हसरत अच्छे घर जाए बेटी
लड़का कितना महगां हो पर चलता हैशादी क्या है सौदा है जी चीज़ो का
खर्च करेगा ज्यादा वो ही बिकता हैलुटने वालो को लूटे तो क्या शिकवा
आज लकी मै भी लूटूँ तो कैसा है -
Ghazal
मुहँ लटकाए आख़िर तू क्यो बैठा है
इस दुनिया में जो कुछ भी है पैसा हैदुख देता है घर में बेटी का होना
चोर -उचक्का हो लड़का पर अच्छा हैकुछ भी हो औरत की दुश्मन है औरत
सच तो सच है बेशक थोड़ा कड़वा हैसबकी हसरत अच्छे घर जाए बेटी
लड़का कितना महगां हो पर चलता हैशादी क्या है सौदा है जी चीज़ो का
खर्च करेगा ज्यादा वो ही बिकता हैलुटने वालो को लूटे तो क्या शिकवा
आज लकी मै भी लूटूँ तो कैसा है -
A pray for india
जब तक है जीवन तब तक इस की सेवा ही आधार रहे
विष्णु का अतुल पुराण रहे नरसिंह के रक्षक वार रहे
हे प्राणनाथ! हे त्रयंबकम! शिव शंभू के शिव सार रहे
हम रहे कभी ना रहे मगर इसकी प्रभुता का पार रहे
शेखर के वह उद्गार रहे अब्दुल हमीद सम ज्वार रहे
हे पवनपुत्र! हे मारुति! भारत ही बारंबार रहे
अब्दुल गफ्फार का शांति मार्ग बूढ़े जफर की तलवार रहे
अब्दुल कलाम के प्राण बसे हिंदू मुस्लिम समभार रहे
कण कण मिट्टी में वसुंधरा बिस्मिल अशफाक सा प्यार रहे
हे जीवनदाता ! प्राणपति! जीवन का अनुपम सार रहे
हे परमपिता !पालनकर्ता !भारत की जय जयकार रहे
ना जाति-धर्म के दंगे हो तुष्टि का ना आधार रहे
हर नारी हो माता बेटी बहना का अनुपम प्यार रहे
लक्ष्मी दुर्गा अनुसुइया सम हर नारी का पदभार रहे
सद्काम और सद्वृत्ति सहित मानव में मधुरिम भाव रहे
मानव का मानव से मानव के जैसा ही व्यवहार रहे
हे आदि शक्ति ! हे नंदलाल ! भारत की जय जयकार रहे
भ्रष्टाचारी पापाचारी व्यभिचारी का दुर्भाव रहे
व्यापम चारा 2G जैसा ना कोई काला काम रहे
भारत हो संस्कार समता का व कायम ईमान रहे
हर प्रीत प्रात कृष्णा जैसी रावण सा ज्ञान अपार रहे
मर्यादापुरुषोत्तम करुणानिधान सा हर नर का व्यव्हार रहे
हे ब्रहमचारिणी ! जगदम्बा ! भारत की जय जयकार रहे
हम बनें सृष्टि के गुरुवर फिर हमसे शोभित संसार रहे
भारत हो ताकत परमाणु अग्नि पृथ्वी आकाश रहे
अब्दुल कलाम सा हर बालक परमाणु शक्ति विस्तार करे
हम विजय रहे हम जफर बने अर्जुन जैसा धंनुधार रहे
हे नीलकंठ !हे महाकाल ! भारत की जय जयकार रहे
——- विकास चौधरी ‘सजल’
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तुझे शर्म नहीं आई
नमस्कार दोस्तों आप सब देख रहे हैं आज कल बच्चियों के साथ कुछ बहेशी दरिन्दे जो कर रहे हैं दो शब्द आज लिखने पर मजबूर हो गया
ऐसे कुकर्म करते जरा भी शर्म क्या तुझे नहीं आई।
उसे देख तुझे अपनी बेटी याद क्या तुझे नहीं आई।।
“” “” ”चिखती चिल्लाती तो कभी दर्द से कराहती भी होगी।
उस मासूम पर जरा सा भी रहेम क्या तुझे नहीं आई।।
” “” “”वो तुझे चाचा भईया या पिता समझ कर आई होगी ।
उसकी आंखों में ये रिश्ते भी नजर क्या तुझे नहीं आई।।
“” “” “”किस कदर घुट घुट कर तोड़ा होगा दम उसने अपना।
हवस बुझाते हुए इन्सानियत याद क्या तुझे नहीं आई।।
“” “” “”ऐसे कूकर्म करते जरा भी शर्म क्या तुझे नहीं आई।।।
” रहस्य ” देवरिया
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क्या था क़सूर मेरा??????
क्या था क़सूर मेरा?????
(पीड़ित बेटी आसिफ़ा के सवाल)1.गहन गिरवन सघन वन में
बहुत खुश अपने ही मन मे
मूक पशु पक्षी के संग में
था बसा परिवार मेरा…..
पूछना में चाहती हु क्या था क़सूर मेरा ?????
2.बेटी बन में घर तुम्हारे आ गयी थी
खुशियां बन परिवार जन पर छा गयी थी
दो समय का भोज था और कुछ थे अपने
थी भली वह झोपड़ी न थे महल सपने
था ये हंसता खेलता संसार मेरा ……
पूछना में चाहती हु क्या था क़सूर मेरा ?????
3.पापा की में शान थी और प्राण माँ का
उनके अधरों की हंसी अभिमान माँ का
कौन है अपने पराए न जानती में
सबका पाया प्यार सबको मानती में
फिर कौन थे जो कर गए ये हाल मेरा
पूछना में चाहती हु क्या था क़सूर मेरा ?????
4.ऐ मेरे ईश्वर बता तू तब कहाँ था
तेरे घर तुझको पुकारा तू तब कहाँ था
लेके तेरा नाम मैंने दम है तौड़ा
द्रोपदी थी तेरी मुझसे मुँह क़्यों मोड़ा
क्या कोई नाता न था प्रभु मुझसे तेरा
पूछना में चाहती हु क्या था क़सूर मेरा ??????
पंकज सेन
8236925300 -
क्या था क़सूर मेरा??????
क्या था क़सूर मेरा?????
(पीड़ित बेटी आसिफ़ा के सवाल)1.गहन गिरवन सघन वन में
बहुत खुश अपने ही मन मे
मूक पशु पक्षी के संग में
था बसा परिवार मेरा…..
पूछना में चाहती हु क्या था क़सूर मेरा ?????
2.बेटी बन में घर तुम्हारे आ गयी थी
खुशियां बन परिवार जन पर छा गयी थी
दो समय का भोज था और कुछ थे अपने
थी भली वह झोपड़ी न थे महल सपने
था ये हंसता खेलता संसार मेरा ……
पूछना में चाहती हु क्या था क़सूर मेरा ?????
3.पापा की में शान थी और प्राण माँ का
उनके अधरों की हंसी अभिमान माँ का
कौन है अपने पराए न जानती में
सबका पाया प्यार सबको मानती में
फिर कौन थे जो कर गए ये हाल मेरा
पूछना में चाहती हु क्या था क़सूर मेरा ?????
4.ऐ मेरे ईश्वर बता तू तब कहाँ था
तेरे घर तुझको पुकारा तू तब कहाँ था
लेके तेरा नाम मैंने दम है तौड़ा
द्रोपदी थी तेरी मुझसे मुँह क़्यों मोड़ा
क्या कोई नाता न था प्रभु मुझसे तेरा
पूछना में चाहती हु क्या था क़सूर मेरा ??????
पंकज सेन
8236925300 -
उसकी आबरु को यहाँ छीन लिया जाता हैं
उसकी आबरु को यहाँ छीन लिया जाता हैं,
जिस देश मे”बेटी बचाओ,बेटी पढ़ाओ” का नारा दिया जाता हैं,
हर छोटे मसले पर यहाँ
बड़े फैसले होते हैं,बस अहम बात को दबा दिया जाता हैं,
रौंद देते हो मासूमियत को पैरों तेले,
तुम्हारे अंदर का इंसान क्या मर जाता हैं,
जब आती हैं बात इंसाफ़ की,
मेरे देश का कानून किधर जाता हैं,सीता हो,
द्रोपदी हो,
या हो निर्भया, आसिफाक्यों,हर लड़ाई में
स्त्री के अस्तित्व को नोच दिया जाता हैं,रहते हैं सिर्फ़ भक्षक यहाँ,
जिस धरती को देवताओं की जन्मभूमि कहा जाता हैं ।
– राजनंदिनी रावत,राजस्थान(ब्यावर)
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बांधकर बेड़ियों से कोमल पैरों को खींच कर
बांधकर बेड़ियों से कोमल पैरों को खींच कर,
घर की चौखट के बाहर वो कभी जाने नहीं देते,हिम्मत जो जुटाती है बेटी कोई पढ़ने को,
तो उसके कदमों को आगे कभी वो जाने नहीं देते,कितने संकुचित मन होते हैं वो,
जो झूठी रस्मों से बाहिर कभी आने नहीं देते।।
राही (अंजाना) -
वक्त
आज मैंने वक़्त को महफील में बुलाया….
बहस तब छिड़ी जब वक़्त ही वक़्त पर ना आया…
सबने आरोप लगाये लोग आगबबूला हुए…
और वक़्त बेचारा नज़रे फिराए बैठा रहा…
गरीब ने कहा मेरा वक़्त बुरा था सबने परेशान किया तुमने साथ क्यों नहीं दिया…
बाप बोला मेरा बेटी ICU में थी उसे थोड़ा वक़्त और क्यों ना दिया…
जवां बेटा बोला मैं अफसर बनने ही वाला था तुमने मेरी माँ को थोड़ा वक़्त और क्यों ना दिया…
सब वक़्त से सवाल जवाब कर कर रहे थे…
की ए वक़्त तू साथ क्यों नहीं देता कहाँ रहता है…?
वक़्त सबकुछ सुनकर धीमे से बोला आप सबकी बातें सही है यारों पर क्या करूँ….
“”वक़्त ही नहीं मिलता…”” ।।।✍- दिग्विजय❤
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अटल अविचल धर पग बढ़ नारी
अटल अविचल धर पग बढ़ नारी
जीवन मे नव इतिहास गढ़ नारी
नारी है तू यह सोच न कमतर
कम॔ कर तू अभिनव हटकर
तुझसे बंधा है सुख परिवार का
सव॔ सुख दे सदा तू श्रेयस्कर
आत्मबल से लक्ष्य पकड़ नारी
अटल अविचल धर पग बढ नारी
उलझन तनाव डिप्रेशन अवसाद
जिंदगी की महज परीक्षा है
उत्तीर्ण हो सदा सजग बनकर
यही सम्पूर्ण नारी शिक्षा है
धीरज से मंजिल राह पकड़ नारी
अटल अविचल धर पग बढ नारी
जननी माता बहन बेटी तू ही
पत्नी प्रेयसी तेरा रूप अनेक
बिन तेरे सुना है सव॔ जहान
निज अंदर यह भाव तू देख
कम॔ से मर्यादा शिक्षा जकड़ नारी
अटल अविचल धर पग बढ नारी ????✍✍✍✍✍
श्याम दास महंत
घरघोडा (रायगढ )
दिनांक 8-3-2018 (?) -
नारी
शिव की शक्ति बनकर तूने हर एक क्षण साथ निभाया नारी,
पिता- पती के घर को तूने हर एक क्षण महकाया नारी,
हर एक युग में अपने अस्तित्व का तूने एहसास कराया नारी,
प्रश्न उठे भरपूर मगर हर जन को तूने निरुत्तर कर दिखाया नारी,
ममता के आँचल में मानुष को तूने प्रेम सिखाया नारी,
आँख उठी जो तुझपर तूने काली रूप दिखाया नारी,
बेटा-बेटी के बीच पनपते फर्क को तूने मिटाया नारी,
कन्धे से कन्धा मिलाकर तूने जग में सम्मान फिर पाया नारी।।
राही (अंजाना) -
तेरी शान से ही तो हर पल मेरी शान है
महिला दिवस पर प्रत्येक महिला को समर्पित ये छोटा सा लेख।।
तेरी शान से ही तो हर पल मेरी शान है,
जहाँ-जहाँ तू कदम रखे वहाँ मेरा सम्मान है,
निःस्वार्थ भाव से सेवा करके
तू माँ होने का बख़ूबी अर्थ समझाती है,
तो बेटी के रूप में ईश्वर का अस्तित्व दिखलाती है,
जब तू ब्याह कर नए घर में आती है,
तब मानो उस घर की तक़दीर ही बदल जाती है,तिरंगा को ऊँचा करके तू देश को गर्व कराती है,
विपदा से निपटने के लिए तू ज्वाला सी बनकर डटी रही,
चाँद को तूने जीत लिया, मेहनत में हर पल तू लगी रहीतेरे दिन-रात मेहनत की दुनिया पूरी सानी है,
एक महिला के रूप में सृष्टि तुझको जानी है
तेरे इस रुतबे को मैं हर पल सलाम करता हूँ
महिला दिवस क्या मैं हर दिन तुझको प्रणाम करता हूँ।।-मनीष
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हिंदी दिवस की शुभकामनाएं
हमारी आन, मान, शान “हिंदी”
………………………………………भावनाओं का सागर हो दिल में,
तो एक कश्ती उतरती है,
विचारों की बाहों में बाहें गूँथ कर,
लहरों सी सुंदर पंक्तियाँ बुनती है,
ये साहसी काम बस,
हमारी प्यारी भाषा ‘हिंदी’ करती है,
………….
भाषा के गागर से उछल उछल कर निकलते शब्द,
मान, मर्यादा, अपनत्व, प्रेम के फूल खिलाते हैं,
इन्हीं फूलों की खुशबू से,
हमारे देश में रिश्ते महकते हैं,
………………..
हर एहसास के लिए अलग शब्द है,
उन्माद की हर उमंग दिखाने ढेरों शस्त्र हैं,
शब्द ही शब्द हैं पर्यायवाची,
अनेकों अनेक विलोम हैं,
…………………..
संस्कारों के भारी भरकम बोझे,
इस भाषा के छोटे छोटे कटोरों में पलते हैं,
इतिहास के तमाम खट्टे, मीठे, कसैले फल,
इस भाषा रूपी वृक्ष से निकलते हैं,
……….
हिन्दुत्व के गौरव को सिंचित करती,
पुरातात्विक संस्कृत भाषा से उपजी,
सहस्त्र सहायक हाथों वाली ये बेटी
हमारे देश की आत्मा में बसती है,
…………………..
भोली, सहज, सीधी सी ये नायिका,
गंभीर विद्वता का प्रमाण देती है,
मेरे देश की ही तरह,
साम्प्रदायिकता का विरोध करती,
न जाने कितनी और भाषाओं के शब्द,
अपने साथ बहाती चलती है,
“मेरे देश की भाषा दिल बड़ा रखती है”
………………………………………
कहीं दुश्मनों को ललकारती,
रण वीरों के बोलों से उफनती,
कभी मीठे बोलों से लदी,
ममता की लोरी में लरजती,
………………………………..
सभ्यता के माथे पर संस्कारों की बिंदी,
मेरे देश की भाषा “हिंदी”,
मेरे देश की भाषा “हिंदी”……..
..मनीषा नेमा.. -
Naya saal
नये साल की पवन बेला पर पहुचे तुम्हे बधाई..
देश प्रेम है धर्म हमारा,हम सब हैं भाई भाई ..मान और सम्मान बढे,जीवन हो श्रेष्ठ शिखर पर..
मानवता हो कर्म हमारा,हर जाती धर्म से बढ़कर..
भेद भाव और छुआ छूत का नाम ना हो वसुधा पर ..
हिन्दू मुसलिम सब साथ रहे, देश बढे उन्नति के पथ पर ..
आपस में हम गले मिले है रूत मिलने की आई ..देश के कोने कोने में नारी को अब सम्मान मिले ..
हर बाला लक्ष्मी बाई हो, हर बेटी को शिक्षा ग्यान मिले.
हर जाति धर्म हर मानव को नित नुतन संयम ग्यान मिले ..
देश के हर वीर सिपाही को, सत से ज्यादा सम्मान मिले..हर बला हो राधा जैसी, हर बच्चा हो कृष्ण कन्हाई ..
Surendra kumar
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मैं बेटी हूँ
मैं बेटी हूँ…..
मैं गुड़िया मिट्टी की हूँ।
खामोश सदा मैं रहती हूँ।
मैं बेटी हूँ…..मैं धरती माँ की बेटी हूँ।
निःश्वास साँस मैं ढोती हूँ।
मैं बेटी हूँ……..
मैं गुड़िया मिट्टी की हूँ।
खामोश सदा मैं रहती हूँ।
मैं बेटी हूँ…..मैं धरती माँ की बेटी हूँ।
निःश्वास साँस मैं ढोती हूँ।
मैं बेटी हूँ……. -
माँ
‘ माँ ’
माँ को खोकर हुआ माँ की ममता का एहसास,
पाना चाहा था माँ को और प्रतिबिम्बों में,
पर कहीं नहीं मिला माँ का दुलारता हाथ,
वो लोरियाँ, वो प्यार भरी थपकियाँ,
वो उलाहने, वो डाँटना फिर पुचकारना |बेटी को पाकर माँ और ज्यादा याद आती है,
उसकी एक-एक बातें बचपन को दोहराती हैं,
मेरी भीगी पलकों को देख उसका परेशान होना,
क्या कहूँ उससे एक माँ को है एक माँ की तलाश |-सन्ध्या गोलछा
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बेटी बचाओ,बेटी पढ़ाओ
जिम्मेंदारी को जब उसने महसूस किया तो,
ऑटो रिक्शा भी चलाने लगती हैं वो !
पढ़ लिख के सक्षम होकर के वो अब,
अंतरिक्ष में वायुयान उड़ाने लगती हैं वो !!कितने उदाहरण देखेंगे आप अब क्योकि,
हर क्षेत्र में सकती आजमाने लगी हैं वो !
पति की शहादत पे अर्थी को कांधा दे,
सुना हैं शमशान तक जाने लगी हैं वो !!समस्त बाधाओं को वो हरती क्यों हैं,
कुछ बोलने से पहले वो डरती क्यों हैं !
प्रश्न ये ज्वलनशील है सबके सामने ये,
जन्म लेने से पहले कोख में मरती क्यों हैं !! -
बेटी की चाहत
अँधेरे कमरे से बाहर अब मैं निकलना चाहती हूँ,
माँ की नज़रों में रहकर अब मैं बढ़ना चाहती हूँ,
धुंधली न रह जाए ये जिन्दगी मेरी, यही वजह है के मैं अब पढ़ना चाहती हूँ,
खड़ी हैं भेदभावों की दीवारें यहाँ अपनों के ही मध्य,
मैं मिटा कर मतभेद सबसे जुड़ना चाहती हूँ,
दबा रहे हैं जो आज मेरी देह की आवाज को,
अब धड़कन ऐ रूह भी मैं उनको सुनाना चाहती हूँ॥
राही (अंजाना) -
बेटी हूँ हां बेटी हूँ
बचपन से ही सहती हूँ,
मैं सहमी सहमी रहती हूँ,
छुटपन में कन्या बन कर संग माँ के मैं रहती हूँ,
पढ़ लिखकर मैं कन्धा बन परिवार सम्भाले रखती हूँ,
फिर छोड़ घोंसला अगले पल मैं पति घर में जा बसती हूँ,
पत्नी रूप में भी मैं हर बन्धन में बन्ध कर रहती हूँ,
खुद के ही पेट से फिर माँ बनकर मैं (बेटी) जन्म अनोखा लेती हूँ,
पढ़ जाऊ तो नाम सफल और जीवन सरल कर देती हूँ॥
बचपन से ही सहती हूँ,
मैं सहमी सहमी रहती हूँ,
मैं बेटी हूँ मैं बेटी हूँ मैं हर रंग में ढलकर रहती हूँ॥
राही (अंजाना) -

मैं बेटी हूँ
मैं बेटी हूँ
फिर भी मैं अकेली हूँ
मैं सबकुछ नहीं कर सकती
क्योंकि मैं बंधन में बंधी हूँ
किसी को मैं पसंद नहीं तो
कोख में ही मार दी जाती हूँ
गर में किसी को पसंद हूँ तो
मैं उसको नहीं पाती हूँ
रब ने मुझे बनाया
दुनियां को यह दिखाया
मेरे बिन संसार अधूरा है
ये जानते हुए भी
दुनियां ने मुझे नकारा है
जिस घर में मैं आई
खुशियों की सौग़ात लाई
बापू की ऊँगली पकड़ के
दुनियां की राह पाई
माँ ने मुझे सिखाया
जीवन का पाठ पढ़ाया
जब घर से मैं विदा होइ
बचपन की खुशियाँ खोई
किसी ने मुझे दुलारा
किसी ने मुझे दुत्कारा
जीवन में मैंने पाया
संसार है निराला
कहीं क़दम बढ़ा के चली
तो, कहीं बन्दिनी बन के रोइ
किया नाम मैंने रोशन
बंधनों के बीच रह कर
कहीं मुझे नहीं चाहा तो
खाती रही मैं ठोकर
फिर भी मैं बेटी हूँ
मैं वो हूँ
जो हर अवरोध में
कहां मैं नहीं हूँ।— सीमा राठी
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बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ
माँ,मैं तेरे हर सपने को सच करके दिखाउंगी
तेरे हर मुसीबत मे तेरे, मैं भी काम आउंगी
रोशन कर दूंगी मैं तेरा नाम इस दुनिया मे
मुझे भी आने दे माँ, इस दुनिया मेमाँ,मैं तुझे कभी नहीं सताऊँगी
तेरे होंठों पर हमेशा मुस्कराहट खिलाऊंगी
कर दूंगी मैं भी कुछ ऐसा काम इस दुनिया मे
मुझे भी आने दे माँ, इस दुनिया मेमाँ,मैं तेरी ज़िन्दगी जीने की वजह बन जाऊंगी
तेरे बुढ़ापे मे, मैं तेरी लाठी कहलाउंगी
सब देखते रह जाएंगे तेरी इस बेटी को इस दुनिया मे
मुझे भी आने दे माँ, इस दुनिया मेमाँ,मैं तेरा घर के कामो मे भी हाथ बटाउंगी
तेरे हर सुख-दुःख मे तेरा साथ निभाऊंगी
मिसाल बन जाऊंगी मैं इस दुनिया मे
मुझे भी आने दे माँ, इस दुनिया मेमाँ, मैं हर कक्षा मे अव्वल आउंगी
तेरा और बाबा का सर शान से उठाउंगी
सब शाबासी देंगे तेरी बेटी को इस दुनिया मैं
मुझे भी आने दे माँ, इस दुनिया मेमाँ, मैं तेरे ही शरीर का एक हिस्सा हू
तेरी अंतरात्मा का ही एक किस्सा हू
न कर विदाई मेरी मुझे मार कर इस दुनिया मे
मुझे भी आने दे माँ, इस दुनिया मे“देव कुमार”
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बेटी की आवाज
माँ की कोख में ही दबा देते हो,
मुझको रोने से पहले चुपा देते हो,
आँख खुलने से पहले सुला देता हो,
मुझको दुनियां की नज़र से छुपा देते हो,
रख भी देती हूँ गर मैं कदम धरती पर,
मुझको दिल में न तुम जगह देता हो,
आगे बढ़ने की जब भी मै देखूं डगर,
मेरे पैरों में बेडी लगा देते हो,
पढ़ लिख कर खड़ी हो न जाऊं कहीं,
मुझको पढ़ाने से जी तुम चुरा लेते हो,
क्यों दोनों हाथों में मुझको उठाते नहीं,
आँखों से अपनी मुझको बहा देते हो॥
राही (अन्जाना) -
मुझको बचाओ मुझको पढ़ाओ
कन्या बचाओ
खुद कन्या कहती है-मुझको बचाओ तुम मुझको बचाओ,
सपना नहीं अब हकीकत बनाओ,
बेटा और बेटी का फर्क मिटाओ,
बेटी बचाओ अब बेटी पढ़ाओ,
बेटे के प्रति प्यार और बेटी को समझें भार,
ऐसे लोगों की गलत सोंच भगाओ,
मुझको बचाओ तुम मुझको बचाओ,
रखने से पहले कदम ना मेरे निशाँ मिटाओ,
आने दो मुझको तुम सीने से लगाओ,
फैंको ना मुझको कचरे के देर में,
मारो ना मुझको तुम ममता की कोख में,
घर के अपने तुम लक्ष्मी बनाओ,
मुझको बचाओ तुम मुझको बचाओ,
कन्धे से कन्धा मिलाकर चलूंगी,
कभी तुमको नज़र मैं झुकाने ना दूंगी,
हाथों में मुझको तुम अपने उठाओ,
मुझको बचाओ तुम मुझको बचाओ,
दुनियां के रंग तुम मुझको दिखाओ,
मैं गर्व् से तुम्हारे सर को उठा दूंगी,
एक बार तो मुझमें तुम विश्वार जगाओ,
मुझको बचाओ तुम मुझको पढ़ाओ॥
राही (अंजाना) -
सोच, नए साल की.!.!
क्या इस साल भी लड़ना है तुमको
धर्म और जाति के नाम परक्या इस साल भी लुटने देनी है
लड़की की इज़्जत नीलाम परक्या इस साल भी सोचा है तुमने
फिर से घोटाले करने कीक्या नहीं छोड़नी आदत वो गंदी
दूसरों की कामयाबी से जलने कीक्या इस साल भी तुमने सोचा है
मां बाप को अपने ठुकराने काक्या इस साल भी तुमने सोचा है
घर की बहुओं को जलाने काक्या इस साल भी तुमको करनी है
बेटी की हत्या गर्भ मेंक्या अब और भी तुमको कहना है
कुछ मुझसे इस संदर्भ मेंक्या इस साल नहीं ठुकराना है
तुम्हें यह अपने स्वार्थ कोक्या खुद को बड़ा समझना है
और नीचा उस परमार्थ कोक्यों इस साल नहीं सोचा तुमने
कोई नया लक्ष्य बनाने काक्यों इस साल नहीं सोचा तुमने
धरती माता को बचाने कायदि इस साल यही है सोचा तुमने
जलते दीपक को बुझाने कायदि यही प्रतिज्ञा करनी है तुमको
माझी(दूसरो) की कश्ती डुबाने कातो कोई नहीं है हक यह यारों
नए साल का जश्न मनाने का
नए साल का जश्न मनाने का.!.!.!.!नववर्ष की शुभकामनाएं.!.!.!.!.!.!.!.!.!
रोहन चौहान……….. -
अ–परिभाषित सच !
॥ बेटी के लिए एक कविता ॥“अ—परिभाषित सच !”डरते—सहमते—सकुचातेमायके से ससुराल तक कीअबाध—अनिवार्य यात्रा करते हुएमैंने; गांठ बांधी पल्लू सेसाथ में; ढेरों आशंकाएं ………….कई; सीख—सलाइयतें ……………हिचकियों के बीच; हिचकोले लेतामेरा अबोध मन—-आँसूओं से भीगाअपरिचित दायरों में कसमसाता रहा“ कोई अपना तलाशता रहा “‘अपने—पराए की भेद—रेखा में’बिंधा—बिंधा छटपटाता रहा .बिदाई की बैचेनी से बचकरगृह—प्रवेश की बेला में‘नमी की नदी’ से उबरकर‘उमंग के आकाश’ मेंपुरवाई—सी आ बसी : मैं .“ ओ; माँ !”………..’मम्मी जी’ हो गईं“ अरे; पापा !”……….साकार हुए ‘पिताजी’और; अनचीन्हा पति, “अजी ! ऐ; जी !! ओ; जी” !!!‘पीछे छोड़े’ घर की ‘अपार वेदना’‘आगे’ जुड़ रहे घर की ‘असीम उत्कंठा’इन दोनों के मध्य—–प्रतिबध्दकिसी सेतु—बंध सी स्तब्धकाँपती—डोलती—थरथरातीमैं !नितांत अकेली—अजनबी—अनिर्दिष्टकभी साड़ी की सलवटें संवारतीकभी पल्लू को करीने से सहेजतीक़दम—दर—क़दम नाप कर रखतीहर भंगिमा—हर निगाह परखतीऔर; अपने—आप को तौलतीसारा दिन; जाने क्या—क्या सोचतीरात—भर सपनों में शूल रोपती .काश ! कि; किसी ने समझाया होतामाँ की आशंकाएं, ‘मोह का चरम’ थीं‘मम्मीजी’ भी, “माँ सी ही“ नरम थींएक ही दहलीज़ में, ‘अधिकार’ और ‘कर्तव्य’ कीदो धाराएँ; समानान्तर—सदिष्ट बहने लगीं‘नमी और नियति’ की कथाएँ कहने लगीं .नारी : नदी की तरह; ‘नियामक’ होती है !मायके के ‘सरोवर’ से; उन्मुक्त झरने सी निकलती हैससुराल की दहलीज़ तक आते—आतेसम्बन्धों के समतल मैदान में‘मंथर मगर; निश्चित गति से’किनारों की परिधि से सामंजस्य रखते हुएअनुभव के महासागर में विलय—पूर्वकर्तव्य—पथ की अनगिन विरल धाराओं मेंस्व——विकेंद्रीकृत हो करसबकी ‘प्यास’ बुझाती ………………….सबको ‘आप्यायित’ करती …………….अंतत:; अपनी ‘समग्र मिठास’ लेकर‘जीवन—सागर’ के बाहुपाश में तिरोहित हो जाती है .देखिए; न !आखिरकार; भटक ही गई : मैं !अल्हड्पन से अनुभव की महायात्रा के मध्यऐसे ही कई पहलू बदले : मैंने !!‘पहाड़ों’ को तोड़ा —– ‘चट्टानों’ को मरोड़ा‘वनों’ को ‘संश्लेषित’ किया —- ‘खेतों’ को ‘सींचा’“ बहुत कुछ संचित किया —— जाने कितना ऊलींचा ”फ़िर भी; कभी खाली नहीं रहीअनुत्तरित रही —– सवाली नहीं रही .शनै: शनै: जाना मैंने !परिवेश की पदचाप को पहचाना मैंने !!समय और सफ़र, स्वयं के ‘विस्तार’ के सापेक्ष हैंसम्बन्धों की गरिमा ही सच है, ‘अनुभव और रफ़्तार’ निरपेक्ष हैं .माँ का मन — मन की ममता और ममता की महत्ता‘पहली संभावित किलकारी’ के साथ ही, सराबोर कर गई : मुझेस्वयं को ‘हार कर’, सबको ‘जीत’ लिया : मैंनेआशंकाओं और दुरभिसंधियों से परेप्रेमजनित विश्वास से, जीना सीख लिया : मैंने .आज !मेरे चेहरे परअपनी सफ़ल शौर्य—गाथा की कान्ति है !!मेरे दोनों किनारे ढहे नहीं, सम्हाले हुए हैं : मुझेमेरे जीवन में संतोष है —– मन में शांति है .पता है, मुझे !‘चंद आधुनिक’ कहेंगे; जुरूरसिर चढ़कर बोलेगा, उनका सुरूरकि; मैंने, अपने आप को ‘मारकर’ —- ‘जीवन’ पाया है !या; कि, खुद को ‘हार कर’ —– ‘सारा कुछ’ निभाया है !!सोचने दीजिये !…………… ये; उनकी, अपनी भ्रांति है ……………..क्योंकि; नारी का जीवन, ‘अनशन’ नहीं —- ‘समग्र क्रांति’ है .अब; आप ही कहिए, जरा !सफ़ल जीवन की परिभाषा, और कैसे तय होती है; भला ?#anupamtripathi #anupamtripathiK**********_____________********** -
नन्ही चिड़िया है बेटी
नन्ही चिड़िया है बेटी
आँगन के बीच चहकने दो
कली कमल की है बेटी
बगिया के बीच महकने दो
मीठी सी मुस्कान है बेटी
हर्षित पुलकित होने दो
इसको भी जीने का हक है
जग में आ जाने दो ।~ कमलेश कौशिक
गुरुग्राम 106 -
देशभक्ति का भाषण तब तक देशभक्ति को गाली है
एक शहीद सैनिक दिल्ली से क्या कहना चाहता होगा इसी विषय पर मेरी एक कल्पना देखें-
सुलग उठी है फ़िर से झेलम हर कतरा अंगारा है,
हिमगिरी के दामन में फ़िर से मेरे खून की धारा है,
चीख रही है फ़िर से घाटी गोद में मेरा सिर रखकर,
पूछ रही है सबसे आखिर कौन मेरा हत्यारा है,
मेरे घर में कैसे दुश्मन सीमा लांघ के आया था,
छोटी सी झोली में बाईस मौतें टांग के लाया था,
क्या मेरा सीना उसके दुस्साहस का आभूषण था,
या मेरे ही घर में रहने वाला कोई विभीषण था,
मैं जब ये प्रश्न उठाता हूं तो उत्तर से डर जाता हूं,
ये दिल्ली चुप रह जाती है मैं चीख-चीख मर जाता हूं llमेरी मौतों पर अक्सर ये ढोंग रचाया जाता है,
कि मक्कारी वाली आंखों से शोक मनाया जाता है,
दिल्ली की नामर्दी मुझको शर्मिंदा कर देती है,
मेरी मौतों पर सरकारें बस निंदा कर देती हैं,
मैं इस जिल्लत का बोझ उठाये ध्रुवतारा हो जाता हूं,
ये दिल्ली चुप रह जाती है मैं चीख-चीख मर जाता हूं lदुश्मन से गर लड़ना है तो पहले घर स्वच्छंद करो,
आस्तीन में बैठे हैं जो उन सांपों से द्वंद करो,
सैनिक को भी शत्रु-मित्र का शंका होने लगता है,
जहां विभीषण होते हैं घर लंका होने लगता है,
मतलब कुछ पाना है गर इन लहु अभिसिंचित द्वंदों का,
तो ऐ दिल्ली हथियार उठाओ, वध कर दो जयचंदों का,
मैं दुश्मन की बारूद नहीं छल वारों से भर जाता हूं,
दिल्ली तू चुप ही रहती है इसिलिये मर जाता हूं lमेरी मां की ममता मेरे साथ दफ़न हो जाती है,
बूढे बाप की धुंधली आंखें श्वेत कफन हो जाती हैं,
जल जाती हैं भाई-बहनों, बेटी की सारी खुशियां,
मेरी विधवा जीते जी ही मृतक बदन हो जाती है,
मेरा घर मर जाता है जब कंधों पर घर जाता हूं,
दिल्ली तू चुप ही रहती है इसिलिये मर जाता हूं lदिल्ली वालों आंखें खोलो सेना का सम्मान करो,
चार गीदड़ों के हमले में बाईस सिंहों को मत कुर्बान करो,
मेरी गज़ल दिशा देती है, बहर बताती है तुमको,
कि विरह वेदना बंद करो अब युद्ध गीत का गान करो,
जब भारत माता की खातिर मरता हूं तो तर जाता हूं,
पर ऐ दिल्ली तू चुप रहती है इसिलिये मर जाता हूं lये क्यूं हर हमले पर तुमने बातचीत की ठानी है,
अरे लातों के भूतों ने आखिर कब बातों की मानी है,
लेकिन तुम भी कुत्ते की ही दुम हो, आदत छोड़ नहीं सकते,
यही वजह है की सीमा पर दुश्मन की मनमानी है,
मैं हाथों में हथियार लिये भी लाश बिछाकर जाता हूं,
दिल्ली तू चुप ही रहती है इसिलिये मर जाता हूं lदिल्ली गर देना है तुझको मरहम मेरे दर्दों को,
तो सेना से कह दो कि मारे चुन-चुन दहशतगर्दों को,
प्रेमशास्त्र को पीछे रखकर सीमा लांघ चले जाओ,
और अभी औकात बता दो इन हिजड़े नामर्दों को ll -
अब डर सा लगता है
“अब डर सा लगता है सुबह-सुबह अखबार पकड़ने से”
“न जाने कौन देश की बेटी, देश का जवान या देश का स्वाभीमान , लूट लिया हो ” !
~शाबीर
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मेरी मौतों पर सरकारें
मेरी कलम नहीं उलझी है माशूका के बालों में,
मेरे लफ्ज नहीं अटके हैं राजनीति की जालों में,
मैने अपने अंदर सौ-सौ जलते सूरज पाले हैं,
और सभी अंगारे अपने लफ्जों में भर डाले हैं,
मैने कांटे चुन डाले फूलों का रास्ता छोड़ दिया,
जकड़ रहा था जो मुझको उस नागपाश को तोड़ दिया,
अब मैं जख्मी भारत के अंगों को गले लगाता हूं,
कवि हूं लेकिन मैं शोलों की भाषा में चिल्लाता हूं l
एक शहीद सैनिक दिल्ली से क्या कहना चाहता होगा इसी विषय पर मेरी एक कल्पना देखें-
सुलग उठी है फ़िर से झेलम हर कतरा अंगारा है,
हिमगिरी के दामन में फ़िर से मेरे खून की धारा है,
चीख रही है फ़िर से घाटी गोद में मेरा सिर रखकर,
पूछ रही है सबसे आखिर कौन मेरा हत्यारा है,
मेरे घर में कैसे दुश्मन सीमा लांघ के आया था,
छोटी सी झोली में बाईस मौतें टांग के लाया था,
क्या मेरा सीना उसके दुस्साहस का आभूषण था,
या मेरे ही घर में रहने वाला कोई विभीषण था,
मैं जब ये प्रश्न उठाता हूं तो उत्तर से डर जाता हूं,
ये दिल्ली चुप रह जाती है मैं चीख-चीख मर जाता हूं ll
मेरी मौतों पर अक्सर ये ढोंग रचाया जाता है,
कि मक्कारी वाली आंखों से शोक मनाया जाता है,
दिल्ली की नामर्दी मुझको शर्मिंदा कर देती है,
मेरी मौतों पर सरकारें बस निंदा कर देती हैं,
मैं इस जिल्लत का बोझ उठाये ध्रुवतारा हो जाता हूं,
ये दिल्ली चुप रह जाती है मैं चीख-चीख मर जाता हूं l
दुश्मन से गर लड़ना है तो पहले घर स्वच्छंद करो,
आस्तीन में बैठे हैं जो उन सांपों से द्वंद करो,
सैनिक को भी शत्रु-मित्र का शंका होने लगता है,
जहां विभीषण होते हैं घर लंका होने लगता है,
मतलब कुछ पाना है गर इन लहु अभिसिंचित द्वंदों का,
तो ऐ दिल्ली हथियार उठाओ, वध कर दो जयचंदों का,
मैं दुश्मन की बारूद नहीं छल वारों से भर जाता हूं,
दिल्ली तू चुप ही रहती है इसिलिये मर जाता हूं l
मेरी मां की ममता मेरे साथ दफ़न हो जाती है,
बूढे बाप की धुंधली आंखें श्वेत कफन हो जाती हैं,
जल जाती हैं भाई-बहनों, बेटी की सारी खुशियां,
मेरी विधवा जीते जी ही मृतक बदन हो जाती है,
मेरा घर मर जाता है जब कंधों पर घर जाता हूं,
दिल्ली तू चुप ही रहती है इसिलिये मर जाता हूं l
दिल्ली वालों आंखें खोलो सेना का सम्मान करो,
चार गीदड़ों के हमले में बाईस सिंहों को मत कुर्बान करो,
मेरी गज़ल दिशा देती है, बहर बताती है तुमको,
कि विरह वेदना बंद करो अब युद्ध गीत का गान करो,
जब भारत माता की खातिर मरता हूं तो तर जाता हूं,
पर ऐ दिल्ली तू चुप रहती है इसिलिये मर जाता हूं l
ये क्यूं हर हमले पर तुमने बस बातचीत की ठानी है,
अरे लातों के भूतों ने आखिर कब बातों की मानी है,
लेकिन तुम भी कुत्ते की ही दुम हो, आदत छोड़ नहीं सकते,
यही वजह है की सीमा पर दुश्मन की मनमानी है,
मैं हाथों में हथियार लिये भी लाश बिछाकर जाता हूं,
दिल्ली तू चुप ही रहती है इसिलिये मर जाता हूं l
दिल्ली गर देना है तुझको मरहम मेरे दर्दों को,
तो सेना से कह दो कि मारो चुन-चुन दहशतगर्दों को,
प्रेमशास्त्र को पीछे रखकर सीमा लांघ चले जाओ,
और अभी औकात बता दो इन हिजड़े नामर्दों को ll
All rights reserved
-Er Anand Sagar Pandey
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रो देता है मन मेरा भी!!
दुखी हो जाता है मन मेरा भी
जब जब दुखी तुझे मैं पाता हूँ
क्या बोलूँ मैं दर्द मेरा
टूट सा पूरा जाता हूँ
कभी सुनकर खबर शहीदों की आत्मा मेरी भी रोती है
एक माँ को बार-बार टूटता देख तकलीफ मुझे भी होती है
हर पल धर्म पर लड़ते लोग
समझ मुझे न आते हैं
भाईचारे की भावना को ये सब शर्मशार कर जाते हैं
माँ बेटी की इज्जत करना हमारी संस्कृति ही हमे सिखलाती है
फिर भे रो देता है मन मेरा
जब निर्भया जैसी घटना की, खबर कान में आती है
हँसते खेलते बच्चों को देख, मन खुशियों से भर जाता है
फिर भी रो देता है मन मेरा
जब सड़क किनारे बच्चा कोई भूख़ा नज़र में आता है
मेरी और तुम्हारी कोशिश से ही
सब कुछ बदल सा जाएगा
ये रोता मन हम सब का
फिर से कभी न रो पाएगा
सरहद पर खुशियां होगी
भूखा फिर न कोई रह पाएगा
भय के बदल छट जाएंगे और
फिर ये देश एक हो जाएगा
– मनीष उपाध्याय
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जिस तरह से एक शिकारी जाल फैलाता है और उसके जाल में शिकार खुद व खुद आकर फंस जाता है, उसी तरह कलयुग के कई नौजवान देश की नारियो, (बहन, बेटियो) की जिन्दगी को नरक के सामान दुःख दायी बर्बाद करने में लगे है और नारी को प्रेम जाल में फसाकर उसका उपयोग करके छोड़ देते है। जब तक नारी इस बात को समझती है, बहुत देर हो जाती है, और कही मुँह दिखाने के काबिल तक नही रहती, आत्म हत्या जैसा कदम उठा लेती है। हर महिला को अपनी जिन्दगी में एक मर्यादा रखना आवश्यक है उसे अपनी हद को लांघकर कभी कोई गलत कदम नही उठाना चाहिये, ताकि बाद में पछताना पड़े और पारिवारिक लोगो को उसकी बजह से शर्मिंदगी हो। उसके पिता जीते जी मर जाए। ये बात हर बेटी को याद रखना चाहिये किसी के प्रेम में पढ़कर अपना तन,मन किसी को सौंप देना और अपने जन्मदाता को छोड़कर भाग कर प्रेम विवाह जैसे कदम उठाना हितकर नही है। इसके बहुत से उदहारण यही आसपास देखने को मिल जायेंगे। पुरुषो की मानसिकता को पता नही क्या हो गया है। खुद पर नियंत्रण नही है समय से पूर्व ही सब कुछ पाने की लालसा उन्हें गलत राह पर चलने और बुरी संगति इंसान के मस्तिष्क को पूर्णतः प्रदूषित कर देती है। उसकी सोच समझ नष्ठ हो जाती है और नीचता की सारी हदे पार कर बैठता है। इंटरनेट, टेलीविजन और अश्लील सामग्रियों ने मानव मन को बहुत दूषित किया है। छोटे- छोटे बच्चों की बाते सुने तो आप हैरान रह जायेंगे कि इतना सब ये कहाँ से सीख रहे है। जमाना पतन की और जा रहा है फिर भी कहते है देश का विकास हो रहा है। स्वदेशी थोड़ा ही है हमारे देश में देश हमारा धीरे-धीरे विदेशी हो रहा है। अन्य देशो की तरह बलात्कार, गुंडा गर्दी, छेड़छाड़ की घटनाये आम हो गई है, सुबह का अखबार उठाकर देखे तो कही न कही इस तरह की खबर से इंसान शर्मसार हो ही जायेगा। महिला को अपनी मर्यादा का सदैव ख्याल रखना चाहिये और प्रेम जाल से बचने का यत्न करना चाहिये। नारी को अपनी सुरक्षा के लिये खुद को कठोर, निर्भिक बनाना चाहिये और समय आने पर चंडी का रूप भी धरना पड़े तो पीछे नही हटना चाहिये। नारी शक्ति के आगे देव और महादेव भी शीश झुकाते है पुरुषो को भी इनका सम्मान करना होगा। तब ही इस तरह की घटनाओ को रोका जा सकता है अच्छे विचारो का आदान-प्रदान कर समाज और देश को स्वच्छ बनाया जा सकता है। जिससे मानव मात्र का कल्याण होगा और फिर किसी बहन की इज्जत पर दाग नही लगेगा और वो निर्भिक होकर सर उठाकर जी सकेगी।
✍?शिवेश अग्रवाल ”नन्हाकवि”
खिरकिया ,दिनाँक- 11/09/2016
