आँचल

आँचल में अपने छुपाकर वो,
दुनियाँ की बुराइयों से बचाती है
सारे जहान की खुशियाँ
अपने दामन में लिपटाकर
हमपर लुटाती है
वही आँचल लाज़ बचाता है,
और उसी से पसीना सुखाती है
स्त्री की आबरू का सुन्दर
श्रिगार बनता है आँचल,
जब स्त्री माथे की बेंदी छुपाती है

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