कविता : जीवन की सच्चाई ,एक कटु सत्य

दुनियां में किसकी मौत और किसकी जिन्दगी
है जिन्दगी ही मौत और मौत जिन्दगी
जीवन मिला तो तय है ,मरना भी पड़ेगा
हम सबको एक राह ,गुजरना ही पड़ेगा ||
जीवन तो खाना -वदोश है
संभव इसका नहीं होश है
झांक ले उस पार भी
नहीं कोई रोक टोक है
अच्छाई और बुराई का भी
उस पार द्वन्द है
नेकी और सच्चाई
अगले जन्म का मापदण्ड है
निश्चय ही यह पंचमहल
कल खाली करना पड़ेगा
हम सबको एक राह ,गुजरना ही पड़ेगा ||
अमीर हो या गरीब हो या हो कोई सतवन्त
यदि जन्म सबका आदि है तो मौत है सबका अन्त
पता नहीं किस दिन ढह जाये ,यह माटी का ढेरा
किसे पता कब उखड़ चलेगा ,यह चलताऊ डेरा
सब कुछ देर के मेहमान है ,इक दिन जाना पड़ेगा
राम नाम सत्य है ,अन्त में वर्वस रटना पड़ेगा
हम सबको एक राह ,गुजरना ही पड़ेगा ||
‘प्रभात ‘ जीवन है उड़ती चिड़िया ,उसे फंसा न सकोगे
जाल पर ही जाल तुम ऐसे बुनते रहोगे
पाप की गठरी तुम्हारी हो सके हल्की
दोष औरों के सिर तुम मढ़ते रहोगे
अभी भी वक्त है बन्धु
पाठ जीवन के ठीक से पढ़ लो
वरना अभी और चौरासी घाट भटकते रहोगे ||

Comments

4 responses to “कविता : जीवन की सच्चाई ,एक कटु सत्य”

  1. Geeta kumari

    यथार्थ परक पंक्तियां

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