मैं मजदूर हूँ

विलासता से कोसों दूर हूँ।
हाँ, मैं मजदूर हूँ।

उँची अट्टालिकाएँ आलिशान।
भवन या फिर सड़क निर्माण।
संसार की समस्त भव्य कृतियाँ,
असम्भव बिन मेरे श्रम योगदान।
फिर भी टपकते छप्पर के तले,
रहने को मैं मजबूर हूँ।
हाँ, मैं मजदूर हूँ।

वस्त्र, दवाईयाँ या फिर वाहन।
संसार की अनन्य उत्पादन।
असम्भव बिन मेरे परिश्रम,
कारखानों की धूरी का घूर्णन।
तपती धूप में पैदल नंगे पाँव,
चलने को मैं मजबूर हूँ।
हाँ, मैं मजदूर हूँ।

कर्ण भेदती करुण क्रंदन।
आतुर तीव्र हृदय स्पंदन।
सुंदर वस्त्र, सजे खिलौने,
निहारती बच्चों के नयन।
बाल हठाग्रह पूर्ण करने में,
असमर्थ हूँ, मैं मजबूर हूँ।
हाँ, मैं मजदूर हूँ।

छप्पन भोग तो मुझे ज्ञात नहीं।
दो समय भी रोटी पर्याप्त नहीं।
संसार की क्षुधा मैं तृप्त करता,
किंतु मेरी व्यथा समाप्त नहीं।
शांत करने क्षुधा की अग्नि,
जल पीने को मैं मजबूर हूँ।
हाँ, मैं मजदूर हूँ।

जहाँ-तहाँ फैला कूड़े का अंबार।
जिसे देख करते घृणित व्यवहार।
अस्पृश्य गंदगी अपने हाथों से ,
मैं स्वच्छ करता हूँ सारा संसार।
फिर भी गंदी बस्ती में,
रहने को मैं मजबूर हूँ।
हाँ, मैं मजदूर हूँ।

सदियों से हम शोषित, उपेक्षित वर्ग हैं।
वैसे कई योजनाएँ, नाम हमारे दर्ज़ है।
ज्ञात नहीं लाभ उसका किनको मिला,
साहूकारों का सर पर हमारे कर्ज है।
अंतहीन ॠण से उॠण होने हेतु,
बाध्य हूँ, मैं मजबूर हूँ।
हाँ, मैं मजदूर हूँ।

देवेश साखरे ‘देव’

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