सर्दी

रज़ाई ओढ़ जब चैन की नींद हम सोते हैं।
ठण्ड की मार सहते, ऐसे भी कुछ होते हैं।।

जिनके न घर-बार, ना ठौर-ठिकाना।
मुश्किल दो वक़्त कि रोटी जुटाना।
दिन तो जैसे – तैसे कट ही जाता है,
रूह काँपती सोच, सर्द रातें बिताना।
गरीबी का अभिशाप ये सर अपने ढोते हैं।
ठण्ड की मार सहते, ऐसे भी कुछ होते हैं।।

भले हम छत का इंतज़ाम न कर सकें।
पर जो कर सकते भलाई से क्यों चूकें।
ठंड से बचने में मदद कर ही सकते हैं,
ताकि इनकी भी ज़िन्दगी सुरक्षित बचे।
कर भला तो, हो भला का बीज बोते हैं।
ठण्ड की मार सहते, ऐसे भी कुछ होते हैं।।

ज़रूरी नहीं, युद्ध हर बार करना पड़े।
आहत होते कई बार जवान बगैर लड़े।
तत्पर वतन की सुरक्षा के लिए हमेशा,
ठण्ड में भी सरहद पर सदा होते खड़े।
खून भी जम जाए पर संयम नहीं खोते हैं।
ठण्ड की मार सहते, ऐसे भी कुछ होते हैं।।

देवेश साखरे ‘देव’


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14 Comments

  1. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - December 11, 2019, 9:06 pm

    Nice

  2. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - December 11, 2019, 9:07 pm

    Nice

  3. Amod Kumar Ray - December 11, 2019, 9:16 pm

    शानदार

  4. Poonam singh - December 12, 2019, 5:13 pm

    Nice

  5. Pragya Shukla - December 14, 2019, 3:07 pm

    Waah

  6. Abhishek kumar - December 14, 2019, 5:56 pm

    सुन्दर रचना

  7. nikhar agarwal - December 15, 2019, 3:18 pm

    Nice

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