अर्धनारीश्वर…

मैं पैदा हुआ तो था कुछ अजीब
फूटा हुआ था मेरा नसीब
शंकर-पार्वती का मिश्रित रूप हूँ मैं
चुप रहो अर्धनारीश्वर हूँ मैं
बचपन से ही मेरे साथ
भेदभाव होता था
शीशे को देखकर मुस्कुराता था
माँ की लिपस्टिक से
मुझे कुछ अलग ही लगाव था
चूड़ी, पायल से मुझे अत्यधिक
प्रेम था
एक दिन बिठा दिया गया मुझे
ऐसे बाजार में
जहाँ रोज मेरी इज्जत
चंद पैसों के लिए लूटी जाती थी
जहाँ से गुजरता था
लोगों की हँसी छूट जाती थी
ताली बजाऊं या चूड़ी
पर तुम सबसे अच्छा हूँ
चुप रहो स्त्री-पुरुष का
गुणगान करने वालों
मैं तुम्हारी दूषित सोंच से
काफी अच्छा हूँ
अपनी बेटी जैसी लड़की
की इज्जत लूट लेते हो
सीना तान कर चलते हो
मर्द कहाए फिरते हो
बस अब बहुत हो चुका
हमको आगे बढ़ना है
तुम सबकी विकलांग सोंच से
हम किन्नरों को अब लड़ना है..

Comments

10 responses to “अर्धनारीश्वर…”

  1. This comment is currently unavailable

  2. बहुत ही संवेदनशील रचना

    1. धन्यवाद दी

  3. बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति
    यथार्थ चित्रण

    1. धन्यवाद सुमन जी

  4. वाह बहुत खूब सुन्दर अभिव्यक्ति

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