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  1. कवि गीता जी की यह कविता बुजुर्ग पीढ़ी पर प्रकाश डालती सुन्दर कविता है। मानव समाज बुजुर्गों के आशीर्वाद के बिना आगे बढ़ने की बात सोचता है तो वह मिथ्या है। शायर दरवेश भारती जी ने लिखा है कि –
    बुजुर्ग ही नहीं था वह एक घना दरख़्त था
    कि जिसके साये में पलकर हम जवान हुए।
    गीता जी की कविता यह संदेश देने में सफल रही है कि हमें अपने बड़े बुजुर्गों को अंगूठा दिखाने की बजाय सम्मान से उनका अंगूठा थामना चाहिए, उनका सम्मान करना चाहिए। बहुत प्रबल भाव पक्ष है।
    “उनका अपना अनोखा सा संसार है,” जैसी पंक्तियाँ अलंकारिक शैली में खूबसूरती से कथ्य को प्रस्तुत कर रही हैं।

  2. इतनी सुन्दर व्याख्या की है सतीश जी मुझे तो समझ ही नहीं आ रहा है कि कैसे धन्यवाद करूं । आपकी समीक्षा को सैल्यूट है सर ।दंडवत प्रणाम ।

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