इंतज़ार
ये नन्हा सा पौधा,
जो फूट निकला है
धरती की गोद से,
कितना नाज़ुक है ये
कितना सौम्य,कितना पवित्र,
किसी नन्हे बच्चे की तरह
आंखें खोलता,बंद करता
अपने आस पड़ौस दूसरे
पेड़ पौधों को देखता,
फिर महसूस करता कि…
मेरे पत्ते इतने कम क्यों हैं?
मेरी टहनियां इतनी कम क्यों हैं?
मुझपे न फूल हैं न फल,
मैं इतना छोटा क्यों हूँ?
इतनी हसरतें, इतनी ख़्वाहिशें
आँख खुलते ही दिल में!
और मुझे लगता था कि
हम इंसान शायद ऐसे हैं,
बेसब्र, बेकैफ़, बेकरार
मगर, हमारी तरह इनको भी
करना होगा ताउम्र बस,
इंतज़ार, इंतज़ार इंतज़ार।
आरज़ू
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