उदास खिलौना : बाल कबिता

मेरी गुड़िया रानी आखिर
क्यों बैठी है गुमसुम होकर।
हो उदास ये पूछ रहे हैं
तेरे खिलौने कुछ कुछ रोकर।।
कुछ खाओ और मुझे खिलाओ
‘चंदा मामा….’ गा-गाकर।
तुम गाओ मैं नाचूँ संग- संग
डम -डम ड्रम बजाकर ।।
वश मुन्नी तू इतना कर दे।
चल मुझ में चाभी भर दे।।
देख उदासी तेरा ‘विनयचंद ‘
रहा उदास खिलौना होकर।
मेरी गुड़िया रानी आखिर
क्यों बैठी है गुमसुम होकर।।

Comments

7 responses to “उदास खिलौना : बाल कबिता”

  1. Geeta kumari

    छोटी सी गुड़िया रानी पर बहुत सुंदर कविता

    1. बहुत बहुत शुक्रिया बहिन

  2. Satish Pandey

    कवि शास्त्री जी की बेहतरीन रचना। कवि ने प्यारी गुड़िया से जुड़ी बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति की है। कविता में कोमलता है, स्नेह की व्यापकता है औऱ बहुत मधुरता है। वाह
    चंदा मामा….’ गा-गाकर।
    तुम गाओ मैं नाचूँ संग- संग
    डम -डम ड्रम बजाकर ।।
    वश मुन्नी तू इतना कर दे।

    1. बहुत बहुत धन्यवाद पाण्डेयजी इतनी सुंदर समीक्षा हेतु

  3. मासूम गुड़िया की नटखट हरकतों पर बहुत सुंदर रचना

    1. धन्यवाद प्रभु

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