कर्म पथ पर चल अडिग

राह में बाधाएं तेरे
आयें तो तब भी न रुक
शक्ति की मूरत है तू
छोड़ दे ये मन के दुख।
कर्म पथ पर चल अडिग
हो सत्य तेरे हाथ में
राह सच की चलते चल
ईश्वर है तेरे साथ में।
चलते हैं जो स्वस्थ मन से
कर्मपथ पर चाव से
उनको नहीं चिंता कि
कोई प्रेम दे या घाव दे।
खुद के दम पर चलते चल
पीछे नहीं आगे नजर रख
मन में दुख आने न दे
बस बढ़ाते रह तू पग।

Comments

12 responses to “कर्म पथ पर चल अडिग”

    1. Satish Pandey

      Thank you

  1. Geeta kumari

    बहुत ही सुन्दर कविता है सतीश जी। बहुत ही प्रेरणा देती हुई रचना।
    “शक्ति की मूरत है तू, छोड़ दे ये मन के दुख ,कर्म पथ पर चल अडिग ”
    वाह सर … दुःखी मन तो क्या दुखी आत्मा तक को सुकून मिल जाए
    इतनी सशक्त कविता रचने के लिए आपको मेरी शुकामनाएं सर
    लेखनी की मजबूती को प्रणाम।

    1. Satish Pandey

      कविता के भाव के साथ सामंजस्य बिठाने और इतनी सुन्दर समीक्षा हेतु सादर धन्यवाद गीता जी, सादर अभिवादन

  2. बहुत बढ़िया लेखन

    1. Satish Pandey

      Thank you

  3. वाह बहुत खूब

    1. Satish Pandey

      सादर धन्यवाद जी

    1. सादर धन्यवाद सर

  4. Piyush Joshi

    उम्दा

    1. Satish Pandey

      Thank you

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