कविता -शिक्षा प्रेमी
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हे शिक्षा प्रेमी
क्या बात कही तुमने
सच्चाई संग प्रहार किया
उतर गए कई नकाब,
बेच रहे शिक्षा को,
शहरों में खोलकर दुकान,
फीस पर फीस,
निकली जनता की खीस,
बस्ते के बोझ तले दबता बच्चा,
अच्छे नंबर के चक्कर में,
बच्चा कोचिंग करता-
कोचिंग के फीस से
मां-बाप की निकली खीस,
आलू मटर टमाटर बेचे
बेची घर की खेती भी,
फीस न पूरा होती तो यारों
बीबी बेचे मंगलसूत
नोटिस भेजे बैंक भी
कर्ज लिए हो हमसे भी,
वक्त खत्म पैसा दे दो
वरना खेती गिरवी रख दो
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**✍ऋषि कुमार ‘प्रभाकर’—
कविता-शिक्षा प्रेमी
Comments
4 responses to “कविता-शिक्षा प्रेमी”
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बहुत खूब ऋषि जी
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वाह बहुत खूब
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यथार्थ परक रचना
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आपकी कविता में सत्यता है
तथा लेखनी में जादू है
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