असम्भव है तुम्हें परिभाषा के
दायरे में बांधना..
तुम हो वो सागर, जिसमें विलीन होता
है व्याकुलता का दरिया..
या निष्प्राण मन के भीतर बसी नीरवता को
चीर के उपजी स्नेहमय अनुगूँज..!!
एक बजंर हृदय के धरातल पर सहसा
फूटता हुआ भावों का सोता..
या फिर एक नज़रिया, जो हर दृष्टिगोचर
में अंतर्निहित वास्तविक सत्य को
उजागर करने का..!!
कविता! तुम पर्याय हो मेरे लिए
‘सार्थकता’ की अनुभूति का..!!
©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’
(21/03/21)
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