कहीं खामोश लम्हा है,कहीं ये शोर कैसा है,
कहीं पर शाम मातम की,ये सुख का भोर कैसा है!
कहीं मासूम जलते है ,पिघलते मोम के जैसे,
सियासत का कहीं झगड़ा,बढ़ा हर ओर कैसा है!
कहीं दुत्कार, नफरत है,कहीं विषदार ईर्ष्या है,
दिखावे का कहीं देखों,धुँआ घनघोर कैसा है!
कहीं जज्बात जलता है,हमारा शुष्क पत्तों सा,
कहीं रोना कहीं हंसना,दिखाना चोर कैसा है!
बड़ा अफसोस है मुझको,ये ताकत खो रहे है हम,
बना है खून अब पानी, ये खुद पर जोर कैसा है !
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रचना-राजेन्द्र मेश्राम “नील”
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