ये रास्तें है कैसे हमसफ़र नही मिलते,
छूट गए जो पीछे उम्र भर नही मिलते!
सूख चूके है उनके दीदार के इंतजार में,
हरे-भरे अब ऐसे शजर नही मिलते!
तार-तार होते रिश्तों पर खड़ी दीवार हो गई,
मोहब्बत हो जहां अब ऐसे घर नही मिलते!
एक दूजे की मुसीबत में काम आए कोई,
दरिया दिल लोग अब मगर नही मिलते!
मिल जाये ठिकाना इस उखड़ती सांस को,
न गांव मिलते है अब और शहर नही मिलते!
वक्त की भीड़ में न जाने रातें कहाँ खो गई,
चैन की नींद मीले ऐसे पहर नही मिलते !
दिखावे की चाह ने आखिर वृद्घालय ढूंढ ली,
तभी तो “नील”बुजुर्ग महलों पर नही मिलते!
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स्वरचित-राजेन्द्र मेश्राम “नील”
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