कविता कहाँ मैं आजकल
बस उलझनें ही लिख रहा हूँ,
सामने हूँ आईने के
कुछ अलग ही दिख रहा हूँ।
भूल कर पहचान खुद की
मुग्ध हूँ अपने ही मन में,
उड़ रहा आकाश में
मुश्किल जमीं में टिक रहा हूँ।
कुछ अलग ही दिख रहा हूँ
Comments
12 responses to “कुछ अलग ही दिख रहा हूँ”
-

बहुत ही गजब
-
धन्यवाद
-
-

Bahut badhiya
-
Thanks
-
-

बहुत अच्छी कविता
-
Thanks
-
-
Atisu
-
Thanks
-
-

बेहतरीन
-
सादर धन्यवाद
-
-
कश्मकश है कवि जीवन में..
-
Thank you
-
Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.