कुदरत ने सिखलाया है

हर जीव को जीने का हक़ है,
जीवों ने डाली है अर्जी
कुदरत ने अपील सुनी है,
अब ना चले बस, मानव की मर्ज़ी
क्षुधा मिटाने की खातिर,
निर्दोषों को है मारा,
कैसा है शैतान वो मानव,
जीवों ने लगाया है नारा
क्षुधा मिटाने की खातिर
कुदरत ने फल, फूल बनाए हैं
फिर जीवों को क्यूं मारा जाए
वो भी तो कुदरत से आए हैं
कुदरत ने मानव को दिखलाया है,
“जियो और जीने दो “, सिखलाया है
ये शुद्ध हवा ये गंगाजल,
मिलते ही रहेंगे हमें प्रतिपल
ये संदेशा आया है,
सबको ही जीने का हक़ है
ये कुदरत ने सिखलाया है ।
✍️ गीता कुमारी।

Comments

13 responses to “कुदरत ने सिखलाया है”

  1. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    , बहुत ही शानदार प्रस्तुति

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत शुक्रिया 🙏

  2. Priya Choudhary

    बहुत सुंदर रचना

    1. Geeta kumari

      धन्यवाद प्रिया जी🙏

  3. Satish Pandey

    तत्सम और तद्भव शब्दावली का आवश्यकतानुसार सुंदर समन्वय किया गया है, प्रकृति पर सभी जीवों का सामान हक प्रतिपादित करते हुए सुन्दर कविता प्रस्तुत की गयी है.

    1. Geeta kumari

      इतनी सुंदर समीक्षा के लिए बहुत बहुत आभार एवं धन्यवाद 🙏

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद 🙏

    1. Geeta kumari

      Thanks allot kamla Ji 🙏

  4. Piyush Joshi

    Very nice

    1. Geeta kumari

      Thanks allot Piyush ji 🙏

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