खुद को उत्साह में रख

खुद को उत्साह में रख
न हो मन दुखी,
तू बढ़े जा, बढ़े जा
न हो मन दुखी।
यह तो संसार है,
इसमें संघर्ष है,
जो बढ़ेगा
उसी का ही उत्कर्ष है।
तेरे कदमों की आहट
को सुनकर यहां
कोई खुश होगा
कोई रहेगा दुखी।
टांग खिंचती रहेगी
निरंतर तेरी,
पीठ पीछे करेंगे
बुराई तेरी।
जब तलक हाँ में हाँ
तू मिला कर चले,
तब तलक सब करेंगे
बड़ाई तेरी।
जब कभी तू
चुनौती लगेगा उन्हें,
शब्द वाणों से होगी
खिंचाई तेरी।
तू न परवाह कर
जा बढ़े जा बढ़े,
धर्म की राह ले
सत्य पर रह अड़े।
खुद को उत्साह में रख
न हो मन दुखी,
तू बढ़े जा, बढ़े जा
न हो मन दुखी।

Comments

12 responses to “खुद को उत्साह में रख”

  1. Geeta kumari

    प्रेरणदायक रचना

    1. सादर धन्यवाद

  2. बहुत सुन्दर रचना

    1. धन्यवाद जी

  3. Prayag Dharmani

    निरंतर जीवन पथ पर अग्रसर होने की प्रेरणा देती रचना

    1. Satish Pandey

      Thanks ji

    1. Satish Pandey

      Thanks ji

    1. Satish Pandey

      Thanks ji

  4. Devi Kamla

    बहुत खूब

    1. Satish Pandey

      थैंक्स

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